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रजिस्टर्ड टेरर ऑफिस (आरटीओ) भ्रष्टाचार का अड्डा जहां पत्रकार पर हमला भी ‘मैनेज’

जिम्मेदारों की खामोशी, पुलिस की सुस्ती भी सवालों के घेरे में खुलासा फर्स्ट, इंदौर। शहर के बदनाम रजिस्टर्ड टेरर ऑफिस (आरटीओ) की दीवारों के भीतर सालों से पल रहा भ्रष्टाचार शुक्रवार को एक बार फिर सरेआम ब

Khulasa First

संवाददाता

29 नवंबर 2025, 8:32 पूर्वाह्न
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रजिस्टर्ड टेरर ऑफिस (आरटीओ) भ्रष्टाचार का अड्डा जहां पत्रकार पर हमला भी ‘मैनेज’

जिम्मेदारों की खामोशी, पुलिस की सुस्ती भी सवालों के घेरे में

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के बदनाम रजिस्टर्ड टेरर ऑफिस (आरटीओ) की दीवारों के भीतर सालों से पल रहा भ्रष्टाचार शुक्रवार को एक बार फिर सरेआम बेनकाब हो गया। करोड़ों की उगाही, दफ्तरी दलालों की दादागीरी और ऊपर तक फैले संरक्षण की वजह से इस ऑफिस को शहर से बाहर बस इसीलिए स्थापित किया गया था, ताकि किसी भी घोटाले की भनक भोपाल या मीडिया तक देर से पहुंचे और पूरा मामला आसानी से ‘सेट’ किया जा सक, लेकिन पत्रकार पर हुए हमले ने पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक दलों की भूमिका पर करारा सवाल खड़ा कर दिया है। इन्हें मीडिया सिर्फ अपने काम वक्त ही चाहिए? क्योंकि जब पत्रकार पर हमला होता है, तो सभी विभाग चुप्पी साध लेते हैं।

पुलिस की सुस्ती ऐसी कि बर्फ भी गर्म लगे
मामले को लेकर खुलासा फर्स्ट के प्रधान संपादक अंकुर जायसवाल आरटीओ अधिकारी प्रदीप शर्मा से चर्चा करते हुए।

शुक्रवार दोपहर न्यूज-24 के ब्यूरो चीफ हेमंत शर्मा और उनके साथी कैमरामैन राजा खान पर आरटीओ के बाबू और सक्रिय दलालों ने घात लगाकर हमला किया, जमकर मारपीट की और शर्मा की हत्या तक की कोशिश की। हैरानी यह कि इतने गंभीर हमले के बाद भी एफआरवी तो दूर, किसी पुलिस अधिकारी ने मौके पर पहुंचना जरूरी नहीं समझा। पुलिस की सुस्ती ऐसी थी कि बर्फ भी इसके आगे गर्म लगे। जैसे पुलिस की भूमिका सिर्फ पत्रकारों को समझाने तक सिमट गई हो। बाकी पर हाथ डालने की हिम्मत न अधिकारियों में दिखी, न उनके सिस्टम में।

अंकित नहीं, यह है कलंकित
इंदौर आरटीओ परिसर में शुक्रवार को जो हुआ, उसने साफ कर दिया कि सरकारी कुर्सियों पर बैठे कुछ बाबू खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। पूरे विवाद में सरकारी कर्मचारी बाबू अंकित चिंतामण की हरकतें यह साबित करने के लिए काफी थीं कि उसकी शक्ल से लेकर चाल-ढाल तक में खुली गुंडागर्दी झलकती है।

शुक्रवार को वह गाड़ियों का ट्रायल ले रहे थे, तभी एक न्यूज रिपोर्टर अपने साथी कैमरामैन के साथ कुछ दिन पहले दिखाई गई खबर की पड़ताल और लाइव कवरेज के लिए आरटीओ में पहुंचे। जैसे ही कैमरे में दलालों की करतूत और मौके पर मौजूद नगर सैनिक का बचाव करते हुए उनके काले खेल कैद होने लगे, वैसे ही अचानक आरटीओ द्वारा पाले गए गुंडे पत्रकार हेमंत शर्मा और राजा खान पर टूट पड़े और जानलेवा हमला कर दिया।

सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि पूरी वारदात के दौरान आरटीओ प्रदीप शर्मा अपने कैबिन से बाहर निकले तो सिर्फ इतना कहने कि उन्हें परिसर में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी नहीं। गुंडे पत्रकारों पर हमला कर रहे थे, कैमरा तोड़ रहे थे और आरटीओ साहब हाथ बांधे खड़े तमाशा देखते रहे। घटना के बाद उन्होंने अपने स्टाफ के साथ मिलकर उन गुंडों को सुरक्षित परिसर से बाहर निकलवा दिया।

सवाल उठता है कि जो अधिकारी अपने ही कार्यालय की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता, उसे इंदौर जैसा बड़ा और संवेदनशील पद आखिर कैसे सौंप दिया गया? क्या चंद सिक्कों की खनक प्रदीप शर्मा के लिए कानून व्यवस्था से भी ऊंची हो गई है? क्या राजनीतिक संरक्षण या कानून के रखवालों की चुपचाप दी गई ढाल इन अधिकारियों और उनके गुंडों को खुले में अपराध करने का साहस देती है?

शुक्रवार की घटना के बाद भी इन आरटीओ बाबुओं ने अपनी दबंगई नहीं छोड़ी। वे थाने पहुंचकर ऐसे पेश आए, मानों कानून को जेब में लेकर घूमते हों। दूसरी ओर गरीबों के मामलों में कानून का हाल यह है कि आजाद नगर की एक घटना में कुछ सिक्कों के बदले बिके एसीपी दोनों पक्षों पर कायमी करने को तैयार बैठे थे।

यह वही एसीपी रवींद्र बिलवाल हैं, जिन पर जुलाई में मृतक उमेंद्र सिंह के मामले में झूठा केस बनाने और जबरन 20 लाख रुपए वसूली के गंभीर आरोप लगे थे। लेकिन इस शहर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि खबरों की भीड़ और सनसनी की आंधी में ऐसे मामले धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में धकेल दिए जाते हैं।

दोषी खुलेआम घूमते हैं, अधिकारी बच जाते हैं और न्याय व्यवस्था सवालों के कटघरे में खड़ी रह जाती है। इंदौर के आरटीओ दफ्तर में शुक्रवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक घटना नहीं, यह इस सिस्टम की सड़ांध का खुला सबूत है।

आरटीओ परिसर में सक्रिय दलालों का जंगलराज
आरटीओ के भीतर वर्षों से सक्रिय दलालों को संरक्षण इतना मजबूत है कि वे खुलेआम गुंडागर्दी करते हैं। जिनके नाम सामने आए- हेमंत (बाली), आशीष होलकर, विजय गौड़, लक्ष्मण गीते, संदीप, आशीष, नितिन, बबलू, विनोद, शंकर (निवासी कुलकर्णी भट्टा), मोनू और शंकर प्रजापति। इनमें कई पुराने नाम हैं, जिनकी पकड़ सिस्टम में गहरी है।

बताया जा रहा है कि शंकर प्रजापति पूर्व बाबू गोपाल प्रजापति का भाई है, जो पहले भी विवादों में रह चुका है। आरटीओ का यह काला चेहरा साबित करता है कि भ्रष्टाचार को सिर्फ दीवारों से बाहर नहीं, बल्कि पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से भी सुरक्षा मिलती है। पत्रकार पर हमले के बाद जिस तरह विभाग चुप रहे, उससे साफ हो गया कि यहां सच दिखाने वाले को ही निशाना बनाया जाता है… और गुनाहगारों को सिस्टम ढाल बनकर बचाता है।

आरटीओ कार्यालय में हुई घटना में पदस्थ बाबू अंकित चिंतामण और होमगार्ड सैनिक नरेंद्र ने गुंडे बुला लिए थे। 20 से अधिक बदमाश हेमंत और राजा को पकड़कर दूर ले गए और हमला किया। पुलिस ने अंकित चिंतामण, नरेंद्र चौहान सहित विनोद, गजेंद्र, नितिन, शंकर प्रजापत, पवन और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया है। गिरोह में एवजी के रूप में काम कर रहे युवक आपराधिक प्रवृत्ति के हैं और गैंगस्टर सतीश भाऊ से जुड़े हैं। आरटीओ कार्यालय में अंकित का दबदबा है।

गजब का रिस्पांस टाइम- 112 की गाड़ी का
मध्य प्रदेश पुलिस ने करोड़ों रुपए फूंककर जिस डायल-112 को प्रदेश में लांच किया था, उसकी तारीफ में अधिकारियों ने जो दावे किए थे, वे शुक्रवार को ध्वस्त हो गए। हमले की सूचना मिलने के बाद 112 को मौके तक पहुंचने में पूरे 1 घंटे का समय लगा, जबकि दावा 15-20 मिनट का था।

टीआई देवेंद्र मरकाम तो पल्ला झाड़ते दिखे, न मौके पर पहुंचना, न कार्रवाई… बस यह कह देना कि वे सुबह 4 बजे तक चेकिंग में लगे थे। वहीं एसीपी रवींद्र बिलावल लगभग पूरे दिन अपने कैबिन में बैठकर सिर्फ आश्वासन देते रहे। 7 घंटे तक न मीडिया को जवाब, न कार्रवाई की दिशा, मानों पहली बार ऐसा प्रकरण देख रहे हों और कानून की हर धारा भूल बैठे हों।

दोपहर से शाम तक पुलिस तेजाजी नगर थाने में पत्रकारों को बैठाए रही, लेकिन प्रकरण दर्ज करने और धाराएं लगाने में ऐसा वक्त लगाया मानों आरटीओ दबाव डाल रहा हो। आखिरकार रात होते-होते पुलिस ने खानापूर्ति वाली एफआईआर दर्ज करके मामले को निपटाया।

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