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फिर गरमाया जमीन घोटालों का मुद्दा: मंदिरों के जीर्णोद्धार पर विधानसभा में सवाल

KHULASA FIRST

संवाददाता

13 फ़रवरी 2026, 10:39 पूर्वाह्न
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फिर गरमाया जमीन घोटालों का मुद्दा

धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग से मांगी गई जिलेवार जानकारी

इंदौर में 1015 शासन संधारित मंदिर, पर कई मंदिरों की जमीन पर अवैध कब्जों के गंभीर आरोप

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश में मंदिरों के जीर्णोद्धार और सरकारी देवस्थानों की भूमि की स्थिति को लेकर मामला एक बार फिर विधानसभा में गूंजा है। धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग से जुड़े प्रश्न के माध्यम से शासन संधारित मंदिरों की संख्या, जीर्णोद्धार पर स्वीकृत राशि और विशेष योजनाओं के क्रियान्वयन की जानकारी मांगी गई है।

इससे पहले ‘खुलासा फर्स्ट’ द्वारा सरकारी मंदिरों और देवस्थान की जमीनों की बिक्री एवं अवैध कॉलोनियों के निर्माण का मुद्दे का खुलासा किया गया था, जिसके बाद यह विषय राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा में है।

विधानसभा में मांगी गई जानकारी
मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय में धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग से संबंधित अतारांकित प्रश्न क्रमांक 873 प्रस्तुत किया गया। प्रश्न का उत्तर भेजने की अंतिम तिथि 11/02/2026 निर्धारित की गई थी, जबकि सदन में उत्तर देने की तिथि 19/02/2026 तय है। यह प्रश्न वर्ग-3 के अंतर्गत भैरो सिंह बापू द्वारा पूछा गया। प्रश्न में निम्न बिंदुओं पर जानकारी चाही गई—

(क) धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के अंतर्गत मध्यप्रदेश में कुल कितने शासन संधारित मंदिर हैं? जिलेवार एवं तहसीलवार संख्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराई जाए। वर्ष 2023 से प्रश्न दिनांक तक कितने मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु राशि स्वीकृत की गई, आदेश की प्रति प्रदान की जाए।

(ख) क्या मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु एसपीए योजना एवं वास्तुकला विद्यालय भोपाल का योगदान लिया जा रहा है? यदि हाँ, तो कितने मंदिरों की डिजाइन एवं अन्य कार्य एसपीए द्वारा पूर्ण कराए जा रहे हैं? मंदिरों के नाम सहित जानकारी दी जाए।

(ग) सुसनेर विधानसभा क्षेत्र, जिला आगर-मालवा अंतर्गत मध्यप्रदेश-राजस्थान सीमा पर स्थित प्रसिद्ध पिपलिया खेड़ा बालाजी मंदिर के जीर्णोद्धार एवं विकास के संबंध में शासन द्वारा क्या कार्यवाही की गई? जिला कलेक्टर द्वारा कब-कब प्रस्ताव विभाग को भेजा गया और विभाग द्वारा स्वीकृति कब तक प्रदान की जाएगी?

विभाग का उत्तर: कई बिंदुओं पर ‘निरंक’ जानकारी
प्रश्नांश (क) के तारतम्य में विभाग ने बताया कि जिला इंदौर में शासन संधारित मंदिरों की संख्या 1015 है। साथ ही तहसील डॉ. अंबेडकर नगर (महू) तथा सांवेर के अंतर्गत वर्ष 2023 से प्रश्न दिनांक तक मंदिरों के जीर्णोद्धार हेतु स्वीकृत राशि के आदेश की प्रति संलग्न होने की जानकारी दी गई। हालांकि प्रश्नांश (ख), (ग) और (घ) के संबंध में विभाग द्वारा मांगी गई जानकारी को ‘निरंक’ बताया गया है।

जमीन घोटाले के आरोप: प्रशासनिक विफलता का संगठित मॉडल?
देवस्थान की सैकड़ों वर्ष पुरानी भूमि, तालाबों और मंदिरों की जमीन पर अवैध कॉलोनियां, हजारों फर्जी रजिस्ट्रियां, करोड़ों-हजारों करोड़ के राजस्व नुकसान और वर्षों से लंबित शिकायतें—ये सभी संकेत करते हैं कि मामला केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का संगठित मॉडल बनता जा रहा है।

सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तथ्य का यह खुलासा हुआ है कि कलेक्टर के नाम दर्ज सरकारी जमीनें भी सुरक्षित नहीं रहीं। सैकड़ों अवैध कॉलोनियां काट दी गईं, भूखंडों की खुलेआम खरीदी-बिक्री हुई और आज भी यह सिलसिला जारी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब भूमाफिया सक्रिय हैं, तब प्रशासन की भूमिका क्या है और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

राजनीतिक संरक्षण और ‘व्हाइट कॉलर’ भूमाफिया
इंदौर में हाल के दिनों में कई ऐसे नाम का खुलासा हुआ हैं, जिन पर करोड़ों से अरबों रुपए की धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं। आरोप है कि ये तथाकथित ‘व्हाइट कॉलर’ भूमाफिया राजनीतिक संरक्षण के चलते बेखौफ सक्रिय हैं।

कानूनी धाराएं प्रभावहीन प्रतीत हो रही हैं और आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं। आम धारणा बनती जा रही है कि यदि अधिकारियों और नेताओं की सहमति हो तो सरकारी जमीन पर कब्जा करना आसान हो गया है।

675 साल पुरानी देवस्थान भूमि पर कब्जे के आरोप: होलकर स्टेट के दस्तावेजों के अनुसार श्री महादेव मंदिर देवस्थल के नाम लगभग 35 एकड़ भूमि दर्ज थी, जो संभवतः इससे अधिक भी हो सकती है। यह भूमि पेशवा काल में पूजा-पाठ के लिए दान स्वरूप दी गई थी।

खसरा नंबर 1458 से 1468 तक देवस्थान की इनामी भूमि के रूप में दर्ज थे। आरोप है कि नजूल विभाग के अधिकारियों और कॉलोनाइज़र की सांठगांठ से खसरों में हेरफेर कर निजी नाम दर्ज कराए गए और अवैध कॉलोनियां विकसित कर दीं। मामले में हाईकोर्ट, राज्यपाल और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की है।

यह भी आरोप है आकाश गृह निर्माण सहकारी संस्था के नाम जमीन दर्ज कराने 50 लाख की रिश्वत ली गई। मुन्ना उर्फ लीलाधर चौधरी द्वारा की शिकायतों के बाद सीजेआई के आदेश पर जांच शुरू होने की बात कही, परंतु आरोप है कि कलेक्टर कार्यालय स्तर पर जांच दबा दी। आज तक न भूमि की नपती हुई, न पंचनामा बना और न ही दोषियों पर ठोस कार्रवाई की गई।

इंदौर जिले में 40 सरकारी मंदिरों की जमीन पर कब्जे के आरोप
बताया गया है कि जिले में 40 सरकारी मंदिरों की जमीन पर कब्जा हो चुका है। इनमें तहसील मल्हारगंज में 19, जूनी इंदौर में 11, बिचौली हप्सी में 4, हातोद एवं देपालपुर में 2-2 तथा सांवेर और राऊ में 1-1 मंदिर शामिल हैं। इनमें से 17 मंदिरों पर कलेक्टर, 1 पर कमिश्नर और 1 पर अपर कलेक्टर व्यवस्थापक हैं।

कुछ मंदिरों पर पुजारी नियुक्त हैं, जबकि कई स्थानों पर नियुक्ति नहीं है। इन जमीनों पर मेडिकल कॉलेज, कॉलोनियां, गौशालाएं, महाविद्यालय, गोदाम, मिल, पेट्रोल पंप, बैंक, गार्डन, धर्मशालाएं, कारखाने, पानी की टंकियां, बस डिपो, अहिल्या वन, आईडीए की योजनाएं और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने के आरोप हैं।

विभिन्न मंदिरों की जमीन पर कथित अतिक्रमण का विस्तृत ब्योरा
कबीरखेड़ी स्थित खेड़ापति हनुमान मंदिर की सर्वे नंबर 48 (0.138 हे.) एवं 49 (1.125 हे.) भूमि पर आईडीए की स्कीम के अंतर्गत प्लॉट काटे जाने की बात सामने आई है। भमोरी दुबे स्थित खेड़ापति हनुमान मंदिर (खसरा 24/1 रकबा 0.907 हे. एवं 25/1 रकबा 0.388 हे.) पर अवैध मकान बने हुए बताए गए हैं। भंवरासला स्थित श्री बैजनाथ मंदिर (खसरा 13/1 रकबा 2.680 हे.) की 0.800 हे. भूमि पर अरविंदो मेडिकल कॉलेज की पार्किंग और गुमठियां बनी हैं।

भंवरासला के श्रीराम मंदिर (सर्वे 17/1, 27, 114, 151) की भूमि पर आधे से अधिक हिस्से में मकान निर्मित हैं। नरवर स्थित श्री महादेव मंदिर (2.914 हे.) और श्री राम मंदिर (1.137 हे.) की जमीन पर भी रिहायशी अतिक्रमण बताया गया है।

छोटा बांगड़दा के श्री राम मंदिर (सर्वे 342/1, 342/2, कुल 5.115 हे.) में से 4.300 हे. पर अवैध कॉलोनी काटी जा चुकी है। शेष भूमि पर खेती की जा रही है तथा एमआर-5 का व्यावसायिक उपयोग बताया गया है।

सुल्काखेड़ी, सिरपुर, धार रोड, टिगरिया बादशाह, कांटाफोड़, नरवर, हातोद, देपालपुर, सांवेर और राऊ तहसीलों के अंतर्गत अनेक मंदिरों की भूमि पर अवैध बस्तियां, कॉलोनियां, दुकानों, कारखानों और निजी निर्माण के आरोप लगाए गए हैं।

कई मामलों में विशिष्ट व्यक्तियों के नामों के साथ कब्जे और निर्माण का विवरण प्रस्तुत किया गया है, वहीं कुछ मामलों में न्यायालयीन प्रकरण लंबित बताए गए हैं।

उठते सवाल: जब भूमि देवस्थान के नाम दर्ज थी, ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध हैं और सरकारी रिकॉर्ड मौजूद हैं, तो नामांतरण कैसे हुआ? निजी व्यक्तियों को भूमि किस प्रक्रिया के तहत हस्तांतरित हुई? उस समय पदस्थ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?

विधानसभा में उठे प्रश्न और विभागीय उत्तरों के बीच जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मंदिरों के जीर्णोद्धार के साथ-साथ उनकी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए भी ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की जाएगी या नहीं।

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