हाई कोर्ट सख्त, फटकार के बाद हरकत में आया प्रशासन: बीआरटीएस की आधी रेलिंग हटाकर छोड़ी; 10 महीने में भी काम पूरा नहीं
खुलासा फर्स्ट, इंदौर । बीआरटीएस की रेलिंग हटाने, बिगड़ते ट्रैफिक और नियम विरुद्ध प्राइवेट वाहनों में हूटर लगाने को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर बुधवार को हाई कोर्ट की डबल बेंच में सुनवाई हुई। कमेटी ने...
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संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बीआरटीएस की रेलिंग हटाने, बिगड़ते ट्रैफिक और नियम विरुद्ध प्राइवेट वाहनों में हूटर लगाने को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर बुधवार को हाई कोर्ट की डबल बेंच में सुनवाई हुई। कमेटी ने बीआरटीएस पर अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसके बाद कोर्ट ने प्रशासन की धीमी रफ्तार पर कड़ी नाराजगी जताई।
कोर्ट ने साफ कहा भोपाल में बीआरटीएस की रेलिंग हटाने का फैसला हुआ और नौ दिन में सड़क चौड़ी हो गई। इंदौर में 10 महीने बीत गए, फिर भी एक ही हिस्से की रेलिंग हट पाई है। इस मुद्दे पर करीब 45 मिनट तक तीखी बहस चली।
अधिकारी किसी भी हालत में ढाई बजे कोर्ट में उपस्थित हों
पहले सत्र में कोर्ट ने कलेक्टर और निगम कमिश्नर की गैरहाजिरी पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा बीआरटीएस का काम भी उतना ही जरूरी है, आप किसी भी बहाने से आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते। सरकारी वकील को निर्देश दिए गए कि अधिकारी किसी भी हालत में ढाई बजे कोर्ट में उपस्थित हों।
फटकार के बाद पहुंचे आला अफसर: कोर्ट की सख्ती के बाद कलेक्टर शिवम वर्मा, निगम कमिश्नर दिलीप यादव और ट्रैफिक डीसीपी आनंद कलांदगी बेंच के सामने पेश हुए। याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अजय बागड़िया ने कहा कोर्ट के आदेशों की वजह से ही अब तक इतना काम हो पाया है। मामले में अगली सुनवाई 12 जनवरी तय की गई है।
एक तरफ राहत, दूसरी तरफ जाम
याचिकाकर्ता ने बताया कि भंवरकुआं से विजय नगर की ओर एक तरफ की रेलिंग हटने से सड़क चौड़ी हुई है और ट्रैफिक को कुछ राहत मिली है, लेकिन विजय नगर से भंवरकुआं जाने वाले हिस्से की रेलिंग नहीं हटने से रास्ता संकरा हो गया है, जिससे यहां जाम की स्थिति बनी रहती है।
अस्थायी डिवाइडर पर भी तकरार
याचिकाकर्ता ने बीच में अस्थायी डिवाइडर लगाने का सुझाव दिया। सीमेंट ब्लॉक, पुलिस बैरिकेड्स या प्लास्टिक बैरिकेड्स, इस पर निगम कमिश्नर ने कहा लागत बहुत ज्यादा है, निगम के पास संसाधन सीमित हैं। अधिकारियों का तर्क था कि इससे दुर्घटनाएं बढ़ सकती हैं। याचिकाकर्ता का जवाब था कि जो लोग नियम नहीं मानते उनकी वजह से पूरा शहर क्यों भुगते।
कोर्ट ने फिर दोहराया कि भोपाल में काम तेजी से हुआ, इंदौर में नहीं। इस पर याचिकाकर्ता ने तंज कसते हुए कहा वह भोपाल है, इसलिए हो गया, यह इंदौर है, इसलिए नहीं हो पा रहा। कोर्ट ने सुझाव दिया कि हटाई गई रेलिंग को अस्थायी डिवाइडर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पर निगम ने ठेके के भुगतान से जुड़ी तकनीकी अड़चन बताई।
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