वरिष्ठ अधिकारियों तक पीड़िताओं के आवेदन पहुंचने से रोकने का खेल: महिला थाने का ‘ज्ञान’- लुटेरी दुल्हन गैंग का हुआ था ऑपरेशन बेनकाब
Khulasa First
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट की खबरों पर उठाए सवाल अब खुद दलालों की गर्दन के बने फंदे
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महिला थाने की दीवारों के भीतर वर्षों से पलता आ रहा संदिग्ध तंत्र अब शहर में आक्रोश और अविश्वास का कारण बन गया है। यहां आने वाले अधिकतर आवेदक वरिष्ठ अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचा ही नहीं पाते। उन्हें पहले ही रोक दिया जाता है और फिर शुरू होता है एक ऐसा खेल, जिसमें सच्चाई को दबाकर केवल वही दिखाया जाता है, जो कुछ चुनिंदा चेहरे चाहते हैं।
न्याय की दिशा बदल दी जाती है और आवेदक को एक तैयार स्क्रिप्ट देकर आगे बढ़ाया जाता है। लुटेरी दुल्हन गिरोह से जुड़े शुरुआती खुलासे खुलासा फर्स्ट ने किए थे। इसके बाद दलालों का पूरा नेटवर्क हरसंभव तरीका अपनाकर इन खबरों को झूठ साबित करने में जुट गया। पुलिस विभाग के कुछ अधिकारी भी इन रिपोर्टों पर विश्वास करने को तैयार नहीं थे।
मगर सच्चाई तब सामने आई, जब छत्तीसगढ़ के व्यापारी को ठगने के बाद वही लुटेरी दुल्हन खुद को गर्भवती बताकर पत्रकार को ही फंसाने की धमकियां देने लगी। बाद में खुलासा हुआ कि उसे महिला थाने के कुछ कर्मचारियों ने सिखाकर भेजा था कि कैसे बयान देना हैं, कब भावनाओं का सहारा लेना है और कैसे दूसरे पक्ष को जाल में फंसाना है।
समय के साथ जब सच्चाई पर से परतें हटने लगीं, छत्तीसगढ़ और मुंबई, महाराष्ट्र में लगातार इस गिरोह पर प्रकरण दर्ज होते गए। जैसे-जैसे गिरफ्तारी की कड़ियां खुलीं, कई दलालों ने स्वयं स्वीकार किया कि महिला थाने में ही आवेदकों को धारा-दर-धारा पूरा ‘ट्यूटोरियल’ दिया जाता था। कब आरोप तय करना है, कौन-सी धारा जोड़नी है और कैसे आरोपी को घुटनों पर लाना है। इस खेल ने न केवल कानून को मजाक बना दिया, बल्कि असली पीड़ितों को न्याय से कोसों दूर कर दिया।
क्या सीपी ऑफिस के ठीक पीछे ही वह जगह है, जहां न्याय को मोड़कर एक अलग दिशा दे दी जाती है? और इससे बड़ा सवाल, कब तक महिला थाना दलालों, गिरोह और ‘ज्ञान देने’ वाले कर्मचारियों का अड्डा बना रहेगा?
लुटेरी दुल्हन गिरोह की सरगना उषा और उसका कथित विजय लंबे समय से एक ऐसा जाल बुनते आए हैं, जिसमें सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत परिवार भी फंसते चले गए। इनके साथ नकली रिश्तेदारों का पूरा गिरोह, कानून के नाम पर खेल खेलने वाले सलाहकार और उनके संरक्षक भी शामिल रहे हैं।
इन सभी की पकड़ महिला थाने पर इतनी मजबूत बताई जाती है कि कई मामलों में बिना जांच सीधे एफआईआर दर्ज कर दी जाती है। इसके बाद एक तयशुदा प्रक्रिया शुरू होती है। आवेदक को निर्देश, बयान गढ़ने की तरकीबें, वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने की चालें और खबरें छप जाएं तो स्थिति संभालने का तरीका।
फिर आता है गिरोह का सबसे घातक हथियार ‘मोटे आसामी’ की तलाश। जैसे ही सामने वाली पार्टी आर्थिक रूप से सक्षम दिखती है, पूरा तंत्र एकदम सक्रिय हो जाता है। 498ए और अन्य धाराओं को इस तरह जोड़ा जाता है कि मामला गैरजमानती बन जाए। इसके बाद आरोपी पर गिरफ्तारी का भय लादकर पुराने ढर्रे पर सौदेबाजी और वसूली का खेल चलता है।
सबसे खतरनाक पहलू यह कि इस पूरे नेटवर्क में कुछ ‘पुलिस मित्रों’ की सहभागिता भी सामने आई है, जिनकी भूमिका मामलों को मोड़ने, धारा तय करने और आगे की दिशा तय करने में बताई जाती है। इस गठजोड़ ने न केवल महिला थाने की विश्वसनीयता को ध्वस्त किया, बल्कि उन पीड़ितों को भी निराश किया है, जिनके लिए यह संस्थान न्याय का अंतिम सहारा होना चाहिए था।
लुटेरी दुल्हन गिरोह के खुलासे के बाद पूरे तंत्र में बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। फिर भी सवाल वही कायम, कब तक अनावेदकों को बुलाकर यह ‘खेल’ खेला जाता रहेगा और कब तक पुलिस मित्र इस पूरे नेटवर्क की ढाल बने रहेंगे?
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