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ऊंचे गगन में लहराएगी सनातन की धर्म-ध्वजा

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संवाददाता

24 नवंबर 2025, 3:17 pm
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ऊंचे गगन में लहराएगी सनातन की धर्म-ध्वजा

रामनाथ मुटकुळे वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर
प्रभु राम की नगरी अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि पर बने भव्य राम मंदिर के शिखर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धर्म ध्वज की स्थापना 25 नवंबर को करने वाले हैं। यह दिन सनातन को मानने वाले करोड़ों धर्मप्रेमियों के लिए बहुत ही विशेष होने वाला है।

धार्मिक दृष्टि से यह दिन बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन विवाह पंचमी भी है। इसी दिन त्रेतायुग में प्रभु राम और माता जानकी का विवाह हुआ था। इस दिन मंगलवार भी है, जो भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमानजी को समर्पित है।

इस दिन अभिजित मुहूर्त में गगन के भाल पर सनातन की धर्म-ध्वजा अपने गौरव के चरम को लेकर लहराएगी।

पांच वर्ष के लंबे कालखंड के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हो गया है। 5 अगस्त साल 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के लिए शिलान्यास किया था। यह अत्यंत शुभता का समय है। संपूर्ण सनातनियों के लिए यह अवसर मंगलकारी है।

विवाह पंचमी के शुभ अवसर पर अयोध्या के राम मंदिर पर केसरिया रंग की धर्म ध्वजा स्थापित होगी। ध्वज पर कोविदार वृक्ष और ‘ऊं’ का चिन्ह अंकित होगा, जो पवित्रता और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदू धर्म में हमेशा से ही मंदिर पर ध्वजा फहराने की परंपरा बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण रही है।

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मंदिरों पर फहराया गया ध्वज देवता की उपस्थिति को दर्शाता है और जिस दिशा में वह लहराता है, वह पूरा क्षेत्र पवित्र माना जाता है। शास्त्रों में मंदिर के शिखर का ध्वज देवता की महिमा, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक बताया गया है। यह ध्वज अयोध्या के सूर्यवंश और रघुकुल जैसी महान परंपराओं का साक्षी भी बनेगा। रघुकुल तिलक के मंदिर शिखर पर जब ध्वजा लहराएगी, तो यह संसार को संदेश देगी कि अयोध्या में रामराज की पुनर्स्थापना हो चुकी है.

यह ध्वज केसरिया रंग का होगा। सनातन परंपरा में केसरिया त्याग, बलिदान, वीरता और भक्ति का प्रतीक माना गया है। भगवा वह रंग है जो ज्ञान, पराक्रम, समर्पण और सत्य की विजय का प्रतिनिधित्व करता है। रामभक्तों और साधु-संतों ने सदियों तक जिस त्याग और संघर्ष से इस परंपरा को जीवित रखा, वही इनके बलिदान का प्रतीक बनकर इस ध्वजा पर अंकित है।

वाल्मीकि रामायण में भरत के ध्वज पर भी कोविदार का वर्णन मिलता है, जब वे श्रीराम से मिलने वन गए थे। इसी तरह ‘ऊं’, जो सभी मंत्रों का प्राण है, ध्वजा पर अंकित होने से यह संपूर्ण सृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। राम-सीता विवाह महोत्सव, धर्म ध्वजा का रोहण और अयोध्या की दिव्य सजावट, यह सब मिलकर ऐसा दृश्य रच रहे हैं जैसा कभी त्रेतायुग में था।

अयोध्या दुल्हन की तरह सजी हुई है और दुनियाभर के रामभक्त इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने को उत्साहित हैं। धर्म ध्वजा के शिखर पर लहराने के साथ ही यह क्षण सदियों की प्रतीक्षा का अंत और रामराज्य की पुनर्स्थापना का प्रतीक बनकर इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो जाएगा।

हजारों वर्षों की प्रताड़ना और गुलामी की मानसिकता से मुक्त हुए सनातनियों का प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के रूप में गौरव लौटा है। देश आजाद होते ही भगवान सोमनाथ के मंदिर के रूप में सनातन के गौरव के लौटने की शुरूआत हुई। इसके बाद भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण से सनातन का मस्तक ऊंचा होकर गौरवान्वित हुआ है। जब तक भगवान सोमनाथ और प्रभु श्रीराम का मंदिर कायम रहेगा, तब तक सनातन की पीढ़ी सरदार वल्लभ भाई पटेल और नरेंद्र मोदी के प्रति कृतज्ञ और नत मस्तक रहेगी।

भारतवर्ष पर पहला मुस्लिम आक्रमण 712 ई. में हुआ था, तब से लेकर मुगल सत्ता के अंत तक सनातन परंपरा मुस्लिम आक्रांताओं से पीड़ित रही। सनातन संस्कृति पर इस्लाम का यह गहरा और कड़ा आघात था। लगभग सभी इस्लामिक आक्रमणकारियों ने भारत पर लगातार आक्रमण कर यहां की संस्कृति को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया।

हालांकि वे इस प्रयास में सफल नहीं हो सके, यह इस संस्कृति की दृढ़ता का परिचायक है। इस्लामी आक्रांताओं ने अत्याचारों की सारी सीमाएं लांघी। लगभग एक हजार वर्षों तक इस्लाम के झंझावात को सहते हुए सनातन संस्कृति का विशाल वट वृक्ष लगभग ठूंठ बन चुका था, लेकिन नष्ट नहीं हुआ था। यह ठूंठ पुन: पल्लवित हुआ और इसकी जड़ों ने पुन: कोमल पर्णों को सहारा देते हुए स्वयं को पोषित कर फिर हरा-भरा कर लिया।

राजनीतिक तुष्टिकरण की नीति पर चलते सनातन का गौरव कहीं गुम-सा गया था। अब देश ही नहीं विदेशों में भी सनातन का सम्मान और गौरव बढ़ा है। भगवान राम का मंदिर अब हजारों वर्षों तक सनातनी गौरव का प्रतीक बनकर देश, दुनिया में हिंदू संस्कृति और परंपरा का आदर्श उदाहरण रहेगा। वहीं इसके शिखर पर धर्म-ध्वजा अनंत काल तक लहराती रहेगी।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सनातन संस्कृति के आदर्श पुरुष हैं। वे मर्यादा की पराकाष्ठा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान हैं। उनका जीवन सनातन संस्कृति को जीने वाले हिंदुओं के लिए आदर्श है। वे सनातन संस्कृति के पुरोधा हैं। केवल भारत ही नहीं वरन् पूरी दुनिया के लिए उनका जीवन चरित्र एक उत्तम उदाहरण है कि एक सामान्य मनुष्य को अपने जीवन को किस तरह मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा के बीच रखना चाहिए। उनके जैसा आदर्श जीवन चरित्र दुनिया के इतिहास में और कोई दृष्टिगोचर नहीं होता है। राम मंदिर का निर्माण अपने में सौहार्द और संयम की पराकाष्ठा अपने में समेटे हुए है।

जिस लंबे कानूनी संघर्ष और शांतिपूर्ण सौहार्द के साथ मंदिर का निर्माण हुआ, वह सराहनीय होने के साथ ही दुनिया के समक्ष सनातन संस्कृति की सौम्यता, सहनशीलता और सहिष्णु होने का प्रमाण है। बिना किसी तनाव और जिस सौम्यता के साथ मंदिर का निर्माण हुआ, वह सराहनीय तो है ही, वहीं भारतीय मुस्लिम समुदाय का रवैया भी प्रशंसनीय है कि उन्होंने शांति से भारतीय संविधान और कानून का सम्मान किया।

साथ ही कानून के फैसले को पूर्णत: स्वीकार किया। जिस तरह से मंदिर का निर्माण हुआ है, उससे भगवान श्रीराम की मर्यादा ही साकार हुई है और इससे प्रभु श्रीराम भी अवश्य ही प्रसन्न होंगे कि उनके जीवन चरित्र की तरह ही उनका मंदिर भी मर्यादा के एक आदर्श के रूप में स्थापित हुआ है।

भगवान श्रीराम के बिना सनातन धर्म अस्तित्वविहीन है। श्रीराम सनातन धर्मावलंबी की आत्मा में बसते हैं। भगवान नारायण के अवतार प्रभु श्रीराम का जीवन चरित्र उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बताता है। उनका जीवन चरित्र ही सनातन धर्म के लिए आदर्श जीवनशैली है। अर्थात् सनातन धर्म को मानने वाले के लिए मर्यादा ही एक आदर्श वाक्य है। यहां मर्यादा के अर्थ बड़े गहरे और सारगर्भित हैं।

करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर आखिरकार मंदिर का निर्माण हुआ। सदियों से इस मंगल बेला की राह तक रहे भक्तों की कामना पूर्ण हुई। राम सनातन धर्म की आत्मा है, जिसके बिना वह निष्प्राण है। राम के बिना हिंदू अस्तित्वहीन है। राम ही सनातन धर्म का आधार बिंदु है, जिसके चारों ओर इस महान और प्राचीन धर्म का ताना-बाना बुना हुआ है। राम का आदर्श ही इस धर्म को सबसे महान और सहिष्णु बनाता है। जहां सबके लिए स्नेह और मानवीयता है, मर्यादा है। भगवान राम का चरित्र पुरुषोत्तम गुणों का सागर है। वहां अमर्यादा और अधर्म के लिए कोई स्थान नहीं है।

मनुष्य के लिए जीवन जीने का एक आदर्श और अनुपम उदाहर है प्रभु श्रीराम का चरित्र। रिश्तों की मर्यादा, धर्म की मर्यादा, जीवन की मर्यादा, गुरुजन से संबंधों की मर्यादा, जीवन में व्यवहार की मर्यादा… इस सबका आदर्श प्रस्तुत करता है प्रभु श्रीराम का जीवन चरित्र।

न्याय और अन्याय के बीच भेद और उसके साथ जीवन के कर्म को निभाना भी सिखाता है भगवान राम का आदर्श जीवन। सनातन धर्मियों और रामभक्तों का सदियों पुराना सपना पूरा हुआ और रामलला का मंदिर साकार ग्रहण हुआ। मंदिर की नींव रखी जाने के ऐतिहासिक पलों के बाद मंदिर के अपने भव्य स्वरूप में खड़े होने तक हम लोग साक्षी बने।

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