देवी अहिल्या की नगरी में ‘नाम-दान’ की गूंज अध्यात्म का महाकुंभ है राधा स्वामी सत्संग: अंतर्मन की खोज का वैश्विक मार्ग; क्यों खिंचे चले आते हैं दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री, विद्वान तथा कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मार्क जर्गेन्समेयर के अनुसार- राधास्वामी मत कोई परंपरागत धर्म नहीं है, बल्कि यह चेतना का एक विज्ञान है।
यह प्राचीन ‘सूरत शब्द योग’ को आधुनिक जीवनशैली के अनुकूल बनाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सांगठनिक क्षमता और अनुयायियों के बीच ऊँच-नीच के भेद का पूरी तरह अभाव होना है।
विद्वानों का कहना है कि यह मत ‘संत मत’ और ‘भक्ति मार्ग’ का एक अनूठा संगम है। राधास्वामी मत यह सिखाता है कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं बल्कि मनुष्य के अपने भीतर ‘शब्द’ के रूप में मौजूद है। यह पंथ मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से ईश्वर-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
दो दिवसीय आयोजन में पहुंचेंगे लाखों अनुयायी
स्वामी विवेकानंद अक्सर कहते थे कि धर्म मनुष्य के भीतर पहले से ही मौजूद दिव्यता की अभिव्यक्ति है। राधास्वामी मत ठीक इसी सिद्धांत को ‘नाम दान’ और ‘आंतरिक अभ्यास’ के जरिए क्रियान्वित करता है।
इसी भावना के साथ देवी अहिल्या की नगरी में आज और कल यानी 24 और 25 जनवरी को राधा स्वामी सत्संग ब्यास का आयोजन होने जा रहा है।
राधा स्वामी सत्संग ब्यास मैदान, खंडवा रोड (तेजाजी नगर) पर होने वाले इस अनूठे आयोजन में में देश-विदेश से लाखों अनुयायियों के इंदौर आने की संभावना है।
आयोजन के दो दिन पहले से ही अनुयायी शहर पहुँचना आरंभ हो गए थे।
सब धर्मों के लोग एक पंक्ति में
इतिहासकार बताते हैं कि राधास्वामी मत ने जाति-पाति के बंधनों को तोड़कर एक ऐसा मंच तैयार किया है, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एक ही पंक्ति में बैठकर ‘शब्द’ की साधना करते हैं। यहां गुरु केवल एक शिक्षक नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक होता है।
विद्वान राधा स्वामी पंथ को ‘अंधविश्वास मुक्त’ पंथ मानते हैं। इसकी वजह यह है क्योंकि यहाँ किसी चमत्कार की जगह आंतरिक अभ्यास यानी ध्यान पर ही जोर दिया जाता है।
इस पंथ की लोकप्रियता का मुख्य कारण इसकी सरलता है। इसमें न तो कोई आडंबर है और न ही मूर्ति पूजा अथवा कोई कर्मकांड।
आत्मा का अपने परमात्मा से मिलन
शहर में इस बड़े आध्यात्मिक समागम से पहले आइये जानते हैं इस पंथ के बारे में। दरअसल ‘राधा स्वामी’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: ‘राधा’ जिसका अर्थ है ‘आत्मा’ और ‘स्वामी’ जिसका अर्थ है ‘प्रभु’ या ‘परमात्मा’। राधा स्वामी का शाब्दिक अर्थ है आत्मा का अपने परमात्मा से मिलन।
जानिए कैसे हुई इसकी शुरुआत
राधा स्वामी मत की नींव 1861 में आगरा में सेठ शिव दयाल सिंह (स्वामी जी महाराज) ने रखी थी। उन्होंने वसंत पंचमी के दिन सार्वजनिक रूप से सत्संग की शुरुआत की। उनके बाद यह विचारधारा विभिन्न शाखाओं में विभाजित हुई।
इसमें ‘राधा स्वामी सत्संग ब्यास’ सबसे बड़ी और प्रभावशाली शाखा के रूप में उभर कर सामने आई। ब्यास केंद्र की स्थापना बाबा जैमल सिंह ने 1891 में पंजाब में ब्यास नदी के किनारे एक छोटी सी कुटिया से की थी, जिसे आज ‘डेरा बाबा जैमल सिंह’ के नाम से जाना जाता है।
जैमल सिंह के बाद महाराज सावन सिंह , जगत सिंह , महाराज चरण सिंह और वर्तमान में बाबा गुरेंद्र सिंह ढिल्लों ने इस कारवां को वैश्विक स्तर की ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। अब संस्था ने जसदीप सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है। 90 से अधिक देशों में सक्रिय इस पंथ को संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद ने 2018 में इसे ‘विशेष परामर्शदात्री’ का दर्जा दिया है।
जानिये क्या है नाम दान
राधास्वामी सत्संग ब्यास में ‘नाम दान’ को आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक शुरुआत माना जाता है। यह गुरु द्वारा शिष्य को दिया गया वह ‘भेद’ है, जिसके माध्यम से आत्मा अपनी सुप्त अवस्था से जागकर परमात्मा की ओर यात्रा शुरू करती है। यह प्रक्रिया अत्यंत सरल और अनुशासित होती है। सत्संग के दौरान, वर्तमान गुरु (या उनके द्वारा अधिकृत प्रतिनिधि) साधक को ‘सूरत शब्द योग’ की विधि सिखाते हैं।
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