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खाकी की निर्मम आंखों ने नहीं देखा मां का करुण क्रंदन

KHULASA FIRST

संवाददाता

10 फ़रवरी 2026, 11:20 पूर्वाह्न
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खाकी की निर्मम आंखों ने नहीं देखा मां का करुण क्रंदन

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
खजराना में 14 वर्षीय मासूम समीर राठौर की मौत ने पुलिसिया तंत्र के उस भयावह और संवेदनहीन चेहरे का खुलासा किया है, जहां वर्दी की सिलवटों में दबी अमानवीयता अब मासूमों की गरिमा पर भी भारी पड़ने लगी है।

एक तरफ मां की सूनी गोद का विलाप आसमान चीर रहा था, दूसरी तरफ कानून के रखवाले संवेदनाओं का गला घोंटकर कागजी खानापूर्ति का ढोंग रच रहे थे।

रविवार को जब भाई राज राठौड़ ने खुद कुएं की गहराई में अपने कलेजे के टुकड़े समीर की लाश तलाशी, तब से सोमवार को हुए अंतिम संस्कार तक सिस्टम का हर कदम उस पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा साबित हुआ। रविवार दोपहर 1 बजे आपदा प्रबंधन टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद समीर की पार्थिव देह को कुएं से निकाला, तब उम्मीद थी पुलिस तत्परता दिखाकर अस्पताल पहुंचाएगी ताकि समय पर पोस्टमार्टम हो सके, लेकिन जांच अधिकारी एएसआई सुरेंद्र सिंह और उनकी टीम ने संवेदनशीलता को ताक पर रख दिया।

परिजनों की सिसकियों के बीच समीर का शव दोपहर 1 से शाम 4 बजे तक खुले आसमान के नीचे जमीन पर पड़ा रहा और पुलिसकर्मी इत्मीनान से कागज काले करते रहे। पुलिस की इस लचर कार्यप्रणाली और कछुआ चाल का खामियाजा यह रहा जब शाम 5 बजे शव एमवाय अस्पताल पहुंचा, तो सूर्यास्त का हवाला देकर पोस्टमार्टम रोक दिया गया।

नाना गोविंद राठौर और मामा दिनेश चौहान सहित दूर-दराज से आए रिश्तेदारों को पूरी रात सिर्फ इसलिए सिसकना पड़ा क्योंकि पुलिस को मौके पर लिखा-पढ़ी में तीन घंटे लग गए। यदि खाकी ने थोड़ी भी तत्परता दिखाई होती, तो रविवार को ही समीर को गरिमापूर्ण विदाई मिल जाती। हद तो तब हो गई जब मां ललिता राठौर ने बदहवास अवस्था में पुलिस की उस बेरुखी का खुलासा किया जिसने न्याय की उम्मीद को ही खत्म कर दिया।

मां के मुताबिक, जब वे गुमशुदगी की गुहार लेकर थाने पहुंचे थे, तब जांच अधिकारी एएसआई सुरेंद्र सिंह ने सांत्वना देने के बजाय कह दिया था खुद ढूंढो, बच्चा है मिल जाएगा, बड़ा फोटो, आधार कार्ड और मार्कशीट लेकर आना।

एक तरफ सिस्टम का यह अहंकारी रवैया और दूसरी तरफ अपने लाड़ले को खोने का गम, ललिता राठौर के इन आंसुओं ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। सोमवार को जब समीर पंचतत्व में विलीन हुआ, तो श्मशान की राख से कई सुलगते सवाल उठे।

आखिर इस देरी और अपमानजनक लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या पुलिस की नियमावली में इंसान की संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं बचा है? कागजों के पुलिंदे भरने की जिद ने साबित कर दिया वर्दी चीखें सुनना भूल चुकी है।

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