जाली हस्ताक्षर से क्लीनचिट विभागीय ईमानदारी पर सवाल: परिवहन आयुक्त कार्यालय में बड़ा फर्जीवाड़ा
Khulasa First
संवाददाता

दो लिपिक निलंबित, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं
खुलासा फर्स्ट…इंदौर।
ग्वालियर स्थित परिवहन आयुक्त कार्यालय में गंभीर फर्जीवाड़े का खुलासा होने से प्रशासनिक पारदर्शिता और विभागीय ईमानदारी पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा है। विभागीय जांच के दायरे में चल रहे एक लिपिक को फर्जी तरीके से क्लीन चिट दिए जाने का आरोप है। चौंकाने वाली बात यह परिवहन आयुक्त के जाली हस्ताक्षर से आदेश जारी हुआ, जिससे विभाग की आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था का खुलासा हो गया।
सूत्रों के अनुसार सेवानिवृत्ति से पहले जांच से बचने के लिए लेनदेन और मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है। मामला का खुलासा होने पर परिवहन आयुक्त ने संबंधित दोनों लिपिकों को निलंबित कर दिया, लेकिन इतने बड़े अपराध में एफआईआर न करना कई सवालों को जन्म दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल है परिवहन आयुक्त के नाम से जाली आदेश जारी करना गंभीर आपराधिक कृत्य है लेकिन दोषी कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई? क्या निलंबन जैसी कार्रवाई पर्याप्त मानी जा सकती है, या फिर यह पूरे मामले को दबाने का प्रयास है?
विभाग का दोहरा मापदंड- आलोचकों का कहना है इसी प्रकार का अपराध कोई आम नागरिक करता, तो उसके खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाती और केस को उदाहरण बनाकर प्रस्तुत किया जाता। लेकिन आरोप विभागीय कर्मचारियों पर है इसलिए दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है।
बताया जा रहा है परिवहन आयुक्त कार्यालय में इस तरह के और भी गंभीर मामले दबे हैं, जिन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह प्रकरण न केवल भ्रष्टाचार और अनियमितता की ओर इशारा करता है, बल्कि दर्शाता है विभागीय स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता कितनी कमजोर हो चुकी है।
देखना यह है क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
जवाब के लिए उपलब्ध नहीं हुए मंत्री- परिवहन मंत्री से सवाल के लिए संपर्क किया तो उनका फोन नेटवर्क में नहीं था। एसएमएस कर विषय की जानकारी दी, लेकिन खबर लिखने तक उसका भी जवाब नहीं मिला। परिवहन आयुक्त विवेक शर्मा का फोन लगातार स्विच ऑफ बताता रहा।
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