शहर बढ़ा, दुकानें बढ़ीं, फिर भी नगर निगम की कमाई घटी: शुल्क वसूली में बरती जा रही कोताही
निगम अफसरों की लापरवाही से विज्ञापन, लाइसेंस, मार्केट और लीज की कमाई आधी से भी कम हुई आदित्य शुक्ला 98260-63956 खुलासा फर्स्ट, इंदौर । नगर निगम की आय का मुख्य जरिया टैक्स वसूली है। इसके चलते संपत्ति क
Khulasa First
संवाददाता

निगम अफसरों की लापरवाही से विज्ञापन, लाइसेंस, मार्केट और लीज की कमाई आधी से भी कम हुई
आदित्य शुक्ला 98260-63956 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम की आय का मुख्य जरिया टैक्स वसूली है। इसके चलते संपत्ति कर, जलकर और कचरा शुल्क की वसूली पर अफसर लगातार जोर दे रहे हैं, लेकिन निगम मार्केट की दुकानों का किराया वसूलने, लीज रेंट की वसूली, लाइसेंस शुल्क और विज्ञापन शुल्क वसूली में कोताही बरती जा रही है।
जबकि इन विभागों से ही निगम को दस साल पहले करीब 25 करोड़ रुपए राजस्व मिलता था, जबकि मौजूदा में बमुश्किल दस करोड़ मिल रहा है। जबकि शहर का दायरा बढ़ा, विज्ञापन बढ़े, लाइसेंस बढ़े और लीज पर दी गई संपत्ति का ग्राफ भी बढ़ा है, फिर भी निगम की राजस्व आय में कमी आई है।
नगर निगम की सीमा में नए गांव जुड़ने से निगम सीमा का दायरा बढ़ा है। इससे शहरवासियों को मूलभूत सुविधाएं दिलाने के नाम पर निगम का खर्च भी बढ़ा है। निगम का बजट ही सात हजार करोड़ से अधिक बनने लगा है, लेकिन राजस्व आय का ग्राफ लगातार कम होता जा रहा है। सूत्रों की मानें तो निगम की कमाई का मुख्य जरिया राजस्व वसूली है।
इसके चलते संपत्ति कर, जलकर और स्वच्छता प्रबंधन शुल्क वसूली पर जोर दिया जाता है। जबकि इसके अलावा अन्य कई माध्यमों से निगम को करोड़ों रुपए की कमाई हो सकती है, लेकिन निगम अफसरों की लापरवाही से निगम की कमाई बढ़ने की जगह कम होती जा रही है।
निगम अफसरों और विज्ञापन माफिया की मिलीभगत
ज्ञात रहे कि नगर निगम के राजस्व विभाग में पहले विज्ञापन, व्यवसायिक लाइसेंस, मार्केट और लीज पर दी हुई संपत्तियों से अच्छी-खासी कमाई होती थी। बताया जाता है कि वित्तीय वर्ष 2013-14 तक करीब 25 करोड़ रुपए से अधिक की आय होती थी, लेकिन निगम अफसरों और विज्ञापन माफिया की मिलीभगत से इन सभी विभागों का विलय कर दिया गया।
इससे निगम की आय बढ़ने की जगह कम हो गई है। जानकारी के अनुसार विज्ञापन, लाइसेंस और मार्केट की कुल आय मौजूदा में करीब 10 करोड़ रुपए से भी कम रह गई है।
निजी वेंडर को फायदा पहुंचाया: बताया जाता है कि बीते वर्षों में नगर निगम के कुछ विभागों का आपस में विलय किया गया। निगम अफसरों और विज्ञापन माफिया की मिलीभगत के इस खेल से निजी वेंडर को फायदा पहुंचाया गया।
जबकि इस कारगुजारी से निगम को नुकसान हुआ, लेकिन निगम के आला अफसर मिलीभगत के इस खेल को रोकने में असहाय साबित हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि विज्ञापन, लाइसेंस और मार्केट का विलय करने के बाद इनसे निगम को होने वाली आय कम हो गई है।
लगातार कम होती गई निगम की कमाई
ज्ञात रहे कि वर्ष 2014 के बाद नगर निगम की सीमा में विस्तार हुआ नगरीय सीमा का दायरा बढ़ा। इससे सड़कों पर लगे मार्ग संकेतकों और डिवाइडर तथा होर्डिंग आदि से विज्ञापन की कमाई पहले की अपेक्षा दोगुना होने की संभावना थी, लेकिन सभी अनुमान निराधार साबित हुए।
इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में बाजार का भी विस्तार हुआ है। वर्ष 2013 की अपेक्षा मौजूदा में शहरी सीमा में दोगुना से अधिक मार्केट और दुकानें बन गईं, लेकिन निगम की कमाई लगातार कम होती गई है। जबकि अब तक निगम मार्केट, लाइसेंस, विज्ञापन और लीज विभाग से ही निगम को करीब सौ करोड़ रुपए की आय होना चाहिए, लेकिन निगम अफसरों की नीति-रीति के कारण निगम की राजस्व आय लगातार कम होती जा रही है। जबकि अफसर महज संपत्तिकर, जलकर और कचरा शुल्क के फेर में फंसे हुए हैं।
विज्ञापन के ठिए बढ़े
नगर निगम ने बीते वर्षों में शहर में यूनिपोल व लॉलीपॉप के जरिए विज्ञापन करने की अनुमति देना शुरू किया है। इससे मौजूदा में निगम सीमा में सैकड़ों यूनिपोल पर विशालकाय होर्डिंग लगाकर प्रचार किया जाने लगा है, लेकिन निगम को मिलने वाले विज्ञापन शुल्क में कमी आ गई है। इसी तरह सिटी बसों के बस स्टॉप बढ़ गए, उनमें विज्ञापन लगाने की संख्या बढ़ गई, लेकिन निगम की कमाई घट गई।
सूत्रों की मानें तो अब निगम निजी जमीन पर विज्ञापन बोर्ड लगाने की अनुमति देने पर विचार कर रहा है। ऐस हुआ तो शहर की निजी बिल्डिंगों और खाली प्लॉटों में विज्ञापनों की भरमार हो जाएगी। इससे शहर की सुंदरता को ग्रहण लग सकता है।
गौरतलब है कि विज्ञापन बढ़े, यूनिपोल, बस स्टॉप सहित विज्ञापन के स्थान बढ़े तो विज्ञापन की आय कम कैसे हो रही है। मार्केट, लाइसेंस, विज्ञापन और लीज विभाग मिलकर निगम को सौ करोड़ रुपए की कमाई करने में असहाय साबित किस वजह से हो रहे हैं।
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