बैंक ऐसा चोरों जैसा: इनका स्लोगन- आओ, मिलकर घर बिगाड़ें; पांच माह से मामला फोरम में, बैंक जवाब देने से बच रहा
Khulasa First
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश में कई सरकारी, निजी और गैर-सरकारी बैंक हैं, लेकिन आम जनता को ठगने का जिस तरह का धंधा कुछ निजी बैंक खुलेआम कर रहे हैं, वह अब किसी से छिपा नहीं है। बैंकिंग धोखाधड़ी की खबरें रोजाना अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में रहती हैं।
इसी कड़ी में अब सेंट्रम हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड नामक बैंक ग्राहकों को ठगने का एक नया और बेहद शातिर मॉडल लेकर सामने आया है। ऐसा मॉडल, जिसकी भनक न तो आरबीआई को है और न ही सरकार को। इस बैंक में ब्याज पर ब्याज तो नहीं लगाया जाता, बल्कि सीधा-सीधा ग्राहक को झूठ बोलकर उसके सपनों को गिरवी रख लिया जाता है।
वह भी इस तरह कि ग्राहक के पास बचने का कोई रास्ता ही न रहे। सेंट्रम हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ने देशभर में ठगी का ऐसा नेटवर्क खड़ा कर रखा है, जिस पर पहले ही कई शिकायतें कोर्ट में दर्ज हैं।
यहां तक कि बैंक के अधिकारी कोर्ट के नोटिस लेने तक से बचते हैं, जिससे उनका शातिर रवैया और साफ झलकता है। इंदौर की रहने वाली एक महिला ग्राहक ने बताया उन्होंने वर्ष 2018 में सेंट्रम से लोन लिया था। लोन प्रक्रिया के दौरान बैंक अधिकारियों ने जानबूझकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाईं, जो बताना उनकी जिम्मेदारी थी।
उस समय बैंक में विश्वजीत नामक मैनेजर था, जबकि लोन प्रोसेस उनके लोन मैनेजर अंकित (94065-54453) के जरिये चल रही थी। अंकित ने लोन देते समय यह बात छिपाई कि जिस घर के लिए लोन दिया जा रहा है, उसके अलावा ग्राहक के एक और घर की रजिस्ट्री भी गिरवी रखवाई जाएगी।
यह धोखाधड़ी तब सामने आई, जब लोन सेंक्शन के बाद ग्राहक विक्रेता को 10 लाख रुपए देकर अनुबंध कर चुका था। उसी स्थिति का फायदा उठाकर बैंक ने अतिरिक्त रजिस्ट्री गिरवी रखने का दबाव बनाया। इस चालाकी में ग्राहक भारी रकम फंसा बैठा था और मजबूरी में उसे अपने दूसरे मकान की रजिस्ट्री भी गिरवी रखनी पड़ी। धोखे की यह शुरुआत यहीं खत्म नहीं हुई।
आरबीआई के नियम ताक में- छिपे चार्ज, छिपी शर्तें और खुली लूट!
ग्राहक को फंसाने के बाद बैंक अधिकारियों ने दूसरी बड़ी धोखाधड़ी की। ग्राहक को भरोसा दिलाया गया कि प्रधानमंत्री आवास सब्सिडी योजना के तहत लगभग 2 लाख 80 हजार रुपए सीधे उसके खाते में आएंगे। इसी भरोसे पर ग्राहक ने बैंक की कठोर शर्तें मान लीं, लेकिन लोन जारी होने के बाद यह सब्सिडी रहस्यमय तरीके से गायब हो गई।
बैंक अधिकारी न तो कोई जवाब देते हैं, न रिकॉर्ड दिखाते हैं और न ही सब्सिडी की रकम का कोई हिसाब। ग्राहक ने इस गंभीर मामले की शिकायत आरबीआई से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक लिखित में भेजी, लेकिन चूंकि यह एक निजी बैंक है, इसलिए कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी है। ऐसा लगता है जैसे बैंक का शिकंजा और भी मजबूत हो रहा है, जबकि पीड़ित ग्राहक न्याय के लिए भटकने को मजबूर है।
चोरी-छिपे ब्याज बढ़ाकर ग्राहक को लूटते रहे: 5 साल तक नियमित किस्त भरने के बावजूद मूलधन घटा ही नहीं! इंदौर की रहने वाली पीड़ित महिला ग्राहक ने बताया वह पांच साल तक नियमित रूप से अपनी किस्त भरती रहीं, लेकिन मूलधन में एक रुपए की भी कमी नहीं हुई।
बैंक ने 13% की ब्याज दर लिखी थी, लेकिन धोखे से कभी 14% तो कभी 14.5% तक ब्याज वसूला। लोन स्टेटमेंट मांगने पर बैंक अधिकारी उसे जानकारी देने से बचते रहे। इतना ही नहीं, जब वह आरबीआई के रेपो रेट का हवाला देकर ब्याज कम करने की बात करती तो बैंक अधिकारी टालमटोल करते।
बैंक प्रबंधन जवाब देने के बजाय कर रहा टालमटोल
मामला पांच माह से उपभोक्ता फोरम में दर्ज है, लेकिन बैंक प्रबंधन जवाब देने के बजाय टालमटोल कर रहे हैं। पीड़ित ग्राहक की शिकायत के आधार पर जब उपभोक्ता फोरम में आवेदन दाखिल किया तो उम्मीद थी कि अब बैंक की तरफ से जवाब आएगा, लेकिन सेंट्रम हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड की असलियत तब सामने आई, जब पांच महीने बाद भी न तो बैंक की ओर से किसी वकील ने जवाब दाखिल किया और न ही बैंक का कोई प्रतिनिधि उपस्थित हुआ।
कोर्ट द्वारा बार-बार समन जारी किए जाते रहे, लेकिन हर बार एक ही बहाना कि पते पर कोई व्यक्ति नहीं मिला या पता गलत है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर एक बैंक का पता ही सही नहीं है तो ऐसे बैंक देश में काम कैसे कर रहे हैं?
यह हैरानी की बात है कि करोड़ों का कारोबार करने वाले बैंक खुद अपने पते से ही गायब पाए जाएं। निजी बैंकों की इस चालाकी से पहले भी न जाने कितने ग्राहकों की जीवनभर की कमाई हड़पी जा चुकी है। - धर्मेंद्र गुर्जर, हाई कोर्ट अधिवक्ता
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