हादसे ने फिर सिस्टम की निष्पक्षता पर खड़े किए गंभीर सवाल: सीहोर में महिला एसआई की थार बनी मौत का कारण; हाईवे पर मचा कोहराम, एक की मौत, तीन की हालत नाजुक
खुलासा फर्स्ट, इंदौर/सीहोर । इंदौर–भोपाल हाईवे पर हुए सड़क हादसे ने एक बार फिर सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार लोगों को रौंदने वाली कार से एक की मौत और तीन की हालत नाजुक होने क
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संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, इंदौर/सीहोर।
इंदौर–भोपाल हाईवे पर हुए सड़क हादसे ने एक बार फिर सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार लोगों को रौंदने वाली कार से एक की मौत और तीन की हालत नाजुक होने के बावजूद क्या सिर्फ निलंबन और लाइन अटैच कर देना ही पर्याप्त कार्रवाई है? बड़ा सवाल यह कि जब हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है, तो फिर गैर-इरादतन हत्या (आईपीसी 304-ए / बीएनएस की समकक्ष धाराएं) का प्रकरण दर्ज क्यों नहीं किया?
सीहोर जिले के इंदौर–भोपाल हाईवे पर शुक्रवार दोपहर बिलकिसगंज चौराहे के पास तेज रफ्तार कार का कहर देखने को मिला, जब आष्टा थाने में पदस्थ महिला एसआई किरण सिंह राजपूत की बेकाबू थार कार ने सड़क किनारे कंबल बेच रहे लोगों और बाइक सवारों को रौंद डाला।
इस भीषण हादसे में चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनमें से एक घायल विजय शर्मा ने भोपाल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया, तीन अन्य की हालत अब भी चिंताजनक बनी हुई है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक लाल रंग की थार (एमपी04 जेडडब्ल्यू 7803) आष्टा से भोपाल की ओर अत्यधिक तेज गति में जा रही थी और अनियंत्रित होकर लोगों को कुचलती चली गई।
पहले प्राथमिक उपचार फिर भोपाल रैफर
हादसे में उज्जैन निवासी कंबल विक्रेता वकील पिता गिरधारी और लखन पिता मदनलाल गंभीर घायल हुए, बाइक सवार रातीबड़ भोपाल के सगे भाई ह्रदेश राजौरिया और विजय राजौरिया भी चपेट में आ गए। घायलों को भोपाल रेफर किया गया, जहां विजय की मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और लोगों में आक्रोश फैल गया।
गैर-इरादतन हत्या का अपराध बनता है: कानून साफ कहता है कि लापरवाही से वाहन चलाकर किसी की जान लेने पर गैर-इरादतन हत्या का अपराध बनता है। वर्दी अपराध को न हल्का करती है, न माफ। सवाल यह भी है कि क्या मौके पर रफ्तार, नियंत्रण, नियमों की अनदेखी और परिस्थितियों का निष्पक्ष परीक्षण हुआ?
या फिर ‘अपने सिस्टम’ के भीतर मामला समेटने की कोशिश? यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि कानून के दोहरे मापदंड का आईना है। जनता जानना चाहती है क्या न्याय वर्दी देखकर बदल जाता है? या फिर इस मामले में भी कानून वही सख्ती दिखाएगा, जो आम नागरिक के लिए रोज दिखाई जाती है। अब निगाहें जांच पर नहीं, न्यायिक निष्पक्षता पर टिकी हैं।
क्या वर्दी कानून से ऊपर है?
क्या इसलिए कि कार चला रही महिला एसआई वर्दी में थी? क्या वर्दी कानून से ऊपर है? यदि यही कृत्य किसी आम नागरिक द्वारा किया गया होता तो पुलिस बिना देर किए ताबड़तोड़ धाराएं लगाकर उसे सलाखों के पीछे भेज देती। यहां उलटा दृश्य दिखता है एक जान गई, कई परिवार उजड़ गए, लेकिन आरोपी को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई की चादर ओढ़ाकर मामले की इतिश्री कर दी गई।
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