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स्मार्ट सिटी के ‘स्मार्ट गुंडे’ रखते हैं कानून पर पकड़

मारो-पीटो, सबूत मिटाओ, लूट करो… फिर सीना ठोंककर आवेदन दे दो- इंदौर आरटीओ में यही है ‘कानून’ खुलासा फर्स्ट,इंदौर । स्मार्ट सिटी का ताज सिर पर सजाए इस शहर में 28 नवंबर को जो हुआ, उसने पूरे शहर के पत्रका

Khulasa First

संवाददाता

01 दिसंबर 2025, 11:18 पूर्वाह्न
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स्मार्ट सिटी के ‘स्मार्ट गुंडे’ रखते हैं कानून पर पकड़

मारो-पीटो, सबूत मिटाओ, लूट करो… फिर सीना ठोंककर आवेदन दे दो- इंदौर आरटीओ में यही है ‘कानून’

खुलासा फर्स्ट,इंदौर
स्मार्ट सिटी का ताज सिर पर सजाए इस शहर में 28 नवंबर को जो हुआ, उसने पूरे शहर के पत्रकारों की रूह कंपा दी। किसी ने सोचा भी नहीं था महज़ एक कवरेज के दौरान हुई कहासुनी इतनी भयावह शक्ल ले लेगी कि आरटीओ में पल रहे गुंडे सीधे हत्या की नीयत से टूट पड़ेंगे। और जब घटना स्थल से पत्रकारों ने पुलिस को फोन लगाया तो पीसीआर के जवान हाथ बांधे मूक दर्शक की तरह दूर खड़े देखते रहे-मानों किसी ने उनके पैरों में बेड़ियां डाल दी हों। आदेश के नाम पर पुलिस का यह डरपोक रवैया नई बात नहीं, लेकिन इस बार मामला पत्रकारों की जान से जुड़ा था।

घटना के बाद बंद कमरे में जब इंदौर मीडिया प्रतिनिधि कलेक्टर शिवम वर्मा से मिले तो उन्होंने भी साफ स्वीकार किया हां, पुलिस सिर्फ खड़ी रहती है, देखती रहती है। यह बयान ही इंदौर की कानून-व्यवस्था की नंगी सच्चाई का खुलासा करने के लिए काफी है। सबसे बड़ा सवाल- आरटीओ के अधिकारी इतने बेलगाम क्यों है? प्रदीप शर्मा जैसे अधिकारी, जिनके सामने उनके स्टाफ का अपराध सिर उठाकर खड़ा है, गलती मानने की बजाय उल्टा पत्रकारों को ही नौसिखिया बताने लगे। मानो अनुभवी वही है जो अपनी कुर्सी को ढाल बनाकर अपराधियों को संरक्षण दे।

सरकारी दफ्तर में पल रहा ‘स्मार्ट माफिया’
गुंडे भी स्मार्ट, ट्रेनिंग लिए हुए और कानून की हर धारा की जानकारी से लैस हैं। आरटीओ परिसर, जहां हजारों लोग आते हैं, वहां गुंडा तंत्र ऐसे घूमता है मानों सिस्टम इनकी जागीर हो। फाइलें, काम, दफ्तर… सब इनके सामने बौना। ये गुंडे (या कहें ‘बाबुओं के लिए काम करने वाले अपराधी’) इतने प्रोफेशनल हो चुके हैं कि विवाद होते ही पहले हमला करो, सामने वाले का सामान लूटो फिर थाने में उसी के खिलाफ आवेदन दे दो। यह तरीका कोई आम बदमाश नहीं जानता, यह जानकारी उन लोगों को होती है जो जेल की हवा खा चुके हों या बड़े अपराधी के साझेदार हों। 28 नवंबर की घटना में भी यही स्क्रिप्ट चली। मारपीट की गई, चेन लूटी, कैमरा छीना, मोबाइल गायब हुए… और पीड़ित पत्रकार थाने पहुंचता, हिस्ट्रीशीटर अंकित चितमन पहले ही आवेदन देकर खुद को पीड़ित घोषित कर चुका था। पुलिस की मेहरबानी देखिए—इतने गंभीर आरोपों के बावजूद,बिना जांच,बिना सत्यापन हिस्ट्रीशीटर का आवेदन पहले रखा गया और पत्रकार हेमंत शर्मा का ही मोबाइल थाने में जमा करा लिया जबकि घटनास्थल से हेमंत के साथी राजा खान ने उसी वक्त पीसीआर को फोन किया था फिर भी पुलिस की जीभ और हाथ दोनों बंद रहे—मानो आरटीओ के गुंडों और पुलिस के बीच कोई अदृश्य गठजोड़ हो।

जल्द होगा खुलासा… आरटीओ अधिकारी को मतलब तक नहीं मालूम!
आरटीओ अधिकारी प्रदीप शर्मा वे खबरों, न्यूज़ पोर्टलों और मीडिया की बुनियादी भाषा से भी कोसों दूर हैं। प्रतीत होता है न अखबार पढ़ते हैं, न खबरों से कोई सरोकार रखते हैं। शुक्रवार को जब वे खुलासा फर्स्ट के संपादक अंकुर जायसवाल से चर्चा कर रहे थे, तब उनकी समझ का स्तर उस समय सामने आ गया जब उन्होंने हेमंत शर्मा के न्यूज़ पोर्टल की एक लिंक दिखाई और कहा जल्द होगा खुलासा का क्या मतलब? यह सुनते ही मौजूद पत्रकार ठहाका लगाए बिना नहीं रहे। सभी ने एक स्वर में कहा- श्रीमान, आपको खबरों की भाषा का भी ज्ञान नहीं है।

‘जल्द होगा खुलासा’ का अर्थ है कि मामले का अगला हिस्सा जल्द जारी होगा। पत्रकारों के मुताबिक, जिस अधिकारी को ‘जल्द होगा खुलासा’ जैसे सामान्य वाक्य का भी मतलब न समझ आए, उससे विभाग चलाने और जनता की जिम्मेदारियां निभाने की उम्मीद बेमानी है। इसी वजह से शर्मा को ‘जल्द खुलासा’ शब्द धमकी जैसा महसूस हुआ। उनके व्यवहार ने यह भी संकेत दिया आलोचना से दूर भागते हैं और मीडिया को दुश्मन समझने की मानसिकता रखते हैं। एक सरकारी दफ्तर में बैठे अधिकारी की यह सोच न केवल हास्यास्पद है, बल्कि चिंताजनक भी।

दो आरोपी गिरफ्तार
आरटीओ में पत्रकार पर हुए हमले के मामले में पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। जानकारी के मुताबिक मामले में आरोपी आशीष शिरसाट और उसका एक साथी नरेंद्र गोस्वामी देर रात पुलिस की पकड़ में आ गए। घटना के बाद पुलिस लगातार दबिश दे रही थी। सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के आधार पर दोनों की पहचान की गई। पत्रकार संगठनों ने हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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