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SIR दबाव मानवीयता का अभाव: अमले को निलंबन-नौकरी से निकालने की धमकी क्यों

Khulasa First

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संवाददाता

29 नवंबर 2025, 12:55 pm
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SIR दबाव मानवीयता का अभाव

मानसिक-शारीरिक रूप से टूट रहे बीएलओ के दर्द को समझें सरकार व अफसर

मतदाता सूची शुद्धिकरण अभियान को पूरी तरह बीएलओ पर बना दिया बोझ

घर-घर भटक रहे छोटे कर्मचारियों के साथ समझाइश की जगह सख्ती का रवैया कितना उचित?

अभियान की समयसीमा क्यों नही बढ़ाता आयोग? झटपट काम समेटने की जल्दबाजी क्यों?

डॉक्युमेंट्स अपलोड करने में आ रही परेशानी व जटिल प्रक्रिया की विसंगति को दूर करे आयोग

2003 की मतदाता सूची का डाटा न मतदाता के पास, न बीएलओ के पास, न एपिक नंबर

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर
आख़िर आयोग व सरकारों को ये जानने की कोशिश क्यों नहीं करना चाहिए कि मतदाता सूची शुद्धिकरण में बीएलओ मानसिक व शारीरिक रूप से टूट क्यों रहे हैं? ये अमला तो वही है, जो हर बरस देशभर में न सिर्फ चुनाव, बल्कि तमाम सरकारी अभियान को अंजाम देता है। फिर ये ही अमला इस प्रक्रिया में हथियार क्यों डाल रहा है?

क्या काम को अंजाम देने की प्रक्रिया ही जटिल है या अभियान पूर्ण करने की समयसीमा कम है? इन दोनों विषयों पर समीक्षा करना तब और जरूरी हो जाता है, जब बीएलओ की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा। आयोग सिर्फ ये कहकर इससे पल्ला नहीं झाड़ सकता कि उसे ऐसे दबाव से मौत की अधिकृत सूचना नहीं।

लेकिन हकीकत तो ये ही कि मौत का आंकड़ा अब 25 तक पहुंच गया है। एक सरकारी काम को अंजाम देते हुए मौत के मुहाने तक पहुंचते सरकारी कर्मचारियों की क्या इसलिए सुध नहीं ली जा सकती कि मौत का कारण सिर्फ काम का दबाव नहीं?

आखिर क्या कारण है कि पूरी मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया छोटे कर्मचारियों के ही हवाले कर दी गई? अफसर बिरादरी भी ताकत से लगी है, सत्य तो ये ही है कि मैदान में शिक्षक से लेकर लिपिक तक जूझ रहे हैं। उस पर भी इन के प्रति जिम्मेदारों का व्यवहार कैसा है? ये भी जांच का विषय क्यों न हो?

पूरा अभियान ऐसा प्रतीत होता है कि बीएलओ पर बोझ लाद दिया गया है। उस पर उसे हर दिन समझाइश की जगह अधिकारियों से सख्ती मिल रही है। मैदानी अमले को निलंबन, बर्खास्तगी व नौकरी से निकालने की धमकी व डर क्यों दिया जा रहा है। हर दिन लापरवाही पर नोटिस थमाए जा रहे हैं।

शुक्रवार को इंदौर में ही काम में लापरवाही पर 11 बीएलओ को नोटिस दिए गए। अधिकारी बार-बार अपने अधीनस्थों पर ये दबाव क्यों बना रहे हैं कि निर्धारित लक्ष्य को समयसीमा से पहले पूर्ण कीजिए? माना कि एसआईआर का काम महत्वपूर्ण है, लेकिन जमीनी स्तर पर आ रही दिक्कतों की क्या अनदेखी कर दी जाएगी?

एसआईआर में आ रही परेशानियों को लेकर टीएमसी सांसद चुनाव आयोग शिकायत करने पहुंचे।

आखिर आयोग व सरकारें ये अहम प्रक्रिया झटपट क्यों पूरी करना चाह रही हैं? क्या निकट भविष्य में कोई चुनाव हैं? न राजस्थान में चुनाव हैं, न मप्र-छग में। प. बंगाल में भी अगले साल चुनाव हैं, तो फिर सब कुछ इसी महीने खत्म करने की जद्दोजहद क्यों? ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे पर अपनी पार्टी का स्टैंड साफ किया कि हम मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान के विरोधी नहीं, लेकिन इसके लिए वक्त क्यों नहीं दिया जा रहा।

वक्त की ये कमी अब अमले ही नहीं, मतदाता को भी चिंता में डाल रही है। वक्त पर काम नहीं करने की भारतीय मानसिकता के बीच महज 20-25 दिन में इतना अहम काम कर गुजरना कोई आसान है? वक्त की मांग है कि इस भगीरथी काम को सही गति व अंजाम देने के लिए अभियान की समयसीमा को बढ़ाया जाना बेहद जरूरी है।

तमाम सख्ती व जल्दबाजी के बावजूद अभी भी देखा जाए तो सही मायनों में 50 प्रतिशत तक काम भी मुकम्मल नहीं हुआ है। कुछ ऐसे इलाके व जिले होंगे, जहां अभियान पूर्णता की तरफ होगा। लिहाजा समय में इजाफे के साथ मैदानी अमले व मतदाताओं दोनों को मानसिक राहत देना अब नितांत जरूरी महसूस हो रहा है। उम्मीद है आयोग भी ये बात समझ रहा होगा।

...आखिर मौत का कारण क्यों बन रही मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया? चुनाव आयोग को ये बात समझना ही होगी। शुक्रवार को दिल्ली में टीएमसी के 10 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल की चुनाव आयोग से हुई चर्चा में भी बीएलओ की मौत अहम मुद्दा था। करीब 2 घंटे की मुलाकात के बाद टीएमसी सांसदों ने बाहर आकर जो बयान दिया, वह आयोग के लिए सबसे बड़ा आक्षेप है।

टीएमसी सांसदों ने एक सुर में कहा कि आयोग के हाथ बीएलओ के खून से रंगे हुए हैं। इस बयान को भले ही विपक्ष व आयोग के बीच उठापठक से जोड़ा जाए, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े व पुराने लोकतांत्रिक देश के चुनाव आयोग के लिए कहे गए सांसदों के ये शब्द क्या महज ‘लांछन’ भर हैं या जमीनी हकीकत? ये सवाल अब देश को मथने लगा है। खासकर तब, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में इस प्रक्रिया में लगे अमले के कारिंदों की मौत की खबरें थम नही रहीं।

2003 की सूची व एपिक नंबर, अपलोड प्रक्रिया में हैं खामियां
आयोग के साथ अफसर भी इस बात को समझें और देखें कि आख़िर दिक्कतें कहां-कहां आ रही हैं? 2003 की मतदाता सूचियों से अभियान का जुड़ जाना अब तक की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है। इसके साथ एपिक नंबर की जटिलता भी परेशानी का सबब बनी हुई है।

डॉक्युमेंट्स अपलोड करने की प्रक्रिया भी जटिलताओं से घिरी हुई है। 2003 की मतदाता सूची का डाटा न मतदाताओं के पास है, न अमले के पास। इस डाटा की ऑनलाइन पड़ताल भी बड़ी समस्या है। फिर एक मतदाता के दरवाजे पर अमले की तीन बार दस्तक कोई आसान काम है? बीएलओ की हो रही मौत व नौकरी छोड़कर घर बैठते कर्मचारी कुछ तो गड़बड़ियां बता ही रहे हैं। इन्हें समय रहते दुरुस्त करना अब जरूरी है, ये कोई राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय अब नजर नहीं आता।

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