शिव ही सत्य, शिव ही सुंदर: महादेव की भक्ति से मिटेंगे सारे कष्ट और संताप
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, हेमंत उपाध्याय।
"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेंद्रहारम्। सदा वसंतं हृदयारविंदे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात् जो कपूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात अवतार हैं, जो इस समस्त संसार के सार हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं; वे भगवान शिव माता पार्वती सहित मेरे हृदय कमल में सदैव निवास करें, उन्हें मैं सादर नमन करता हूँ। पुराणों में उल्लेख है कि जो भक्त अनजाने में भी महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का नाम लेता है, उसे 'यमलोक' के कष्ट नहीं भोगने पड़ते।
ब्रह्मांडीय ऊर्जा के उर्ध्वगमन की दिव्य रात्रि
आज हम पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ भगवान शिव की भक्ति का महान पर्व यानी महाशिवरात्रि मना रहे हैं। देर रात से ही शिव आराधना का अगाध महासागर उमड़ रहा है। महाशिवरात्रि केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा के उर्ध्वगमन की दिव्य रात्रि है, जो मनुष्य को जड़ता से चेतनता की ओर ले जाती है।
जीव का शिव से मिलन
जब फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की घनी अंधियारी रात आती है, तो वह अपने साथ आत्म-रूपांतरण का एक महा-अवसर लेकर आती है। यह वह संधि बेला है जब जीव का शिव से मिलन होता है और साधक अपनी भक्ति के बल पर शून्य से शिवत्व की यात्रा तय करता है। लोक-परंपराओं में जहाँ इसे शिव-पार्वती के विवाह का उल्लास माना गया है, वहीं अध्यात्म में यह अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का उजियारा भरने का महापर्व है।
विष पीकर नीलकंठ बन गए
पुराणों में उल्लेख है कि भगवान शिव 'आशुतोष' हैं, जो इसलिये विष पीकर नीलकंठ बन गए और कहलाए ताकि सृष्टि सुरक्षित रह सके। पद्म पुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु स्वयं कहते हैं— "शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः।" अर्थात शिव के हृदय में विष्णु वास करते हैं और विष्णु के हृदय में शिव।
'आशुतोष' यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाला
भगवान विष्णु ने ही शिव को 'आशुतोष' यानी शीघ्र प्रसन्न होने वाला कहा है। पुराणों के अनुसार विष्णुजी हर दिन महादेव को 1000 कमल अर्पित करते थे। एक बार एक कमल कम पड़ गया, तो विष्णुजी ने अपनी आँख यानी कमल नयन अर्पित करने का संकल्प लिया। इसी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 'सुदर्शन चक्र' भेंट किया था।
'शिव ही सत्य हैं और शिव ही सुंदर'
पंडितों और ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि भगवान शिव की पूजा का महत्व केवल कर्मकांडों में नहीं, बल्कि इस सत्य को स्वीकार करने में है कि 'शिव ही सत्य हैं और शिव ही सुंदर'। पुराणों के गूढ़ रहस्यों से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण तक, महाशिवरात्रि का यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि किस प्रकार हम अपनी ऊर्जा को संतुलित कर सुख-समृद्धि और शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
सृष्टि का जन्म हुआ
शिव पुराण के 'विद्येश्वर संहिता' में ब्रह्मा जी देवताओं को समझाते हैं कि शिव ही वह 'आदि-स्तंभ' हैं जिससे सृष्टि का जन्म हुआ। जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब शिव एक अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने स्वीकार किया कि- "शिव ही वह परम तत्व हैं जिनका न आदि है न अंत, वे ही काल के नियंता (महाकाल) हैं।"
पुराणों के अनुसार: शिव इसलिए हैं 'महादेव'
श्रीमद्भागवत पुराण में भगवान शिव को 'वैष्णवानां यथा शंभुः' कहा गया है, यानी वैष्णवों (भक्तों) में शंभु सबसे श्रेष्ठ हैं। वे संहारक नहीं, बल्कि 'लय' के देवता हैं जो नए सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
स्कंद पुराण (काशी खंड) में बताया गया है कि मृत्यु के समय स्वयं महादेव जीव के कान में 'तारक मंत्र' देते हैं, जिससे उसे मोक्ष मिलता है। इसीलिए उन्हें 'मुक्तिदाता' कहा गया है।
जो कल्याणकारी हैं वे शिव हैं
हमारे पौराणिक ग्रंथों 'वायु पुराण' और 'लिंग पुराण' में उल्लेख है कि शिव शब्द की उत्पत्ति 'शम' और 'इव' से मानी जाती है। इसका अर्थ है- जो कल्याणकारी हैं। जिन पर पूरी सृष्टि टिकी है। वे 'अद्वैत' हैं, जहाँ द्वैत (अच्छा-बुरा, लाभ-हानि) समाप्त हो जाता है। जो अपनी शरण में आने वाले प्रत्येक जीव का 'शमन' यानी दुखों का अंत कर उसे शिवत्व प्रदान करे, वही महादेव हैं। अर्धनारीश्वर रूप में भगवान शिव पुरुष और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक भी हैं। वे यह भी दर्शाते हैं कि सृजन के लिए ऊर्जा और चेतना दोनों का सामंजस्य अनिवार्य है। वहीं भगवान शिव का तीसरा नेत्र 'विवेक' और 'अंतर्दृष्टि' का प्रतीक है, जो काम (वासना) को भस्म कर ज्ञान का उदय करता है।
इसलिये पूज्य हैं भगवान शिव
भगवान पूजा के पीछे तीन मुख्य कारण ये हैं- पहला- त्याग और वैराग्य यानी सब कुछ होते हुए भी भगवान शिव श्मशान की भस्म लपेटते हैं, जो मनुष्य को संसार की नश्वरता सिखाता है।
दूसरा करुणा के सागर यानी भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले 'हलाहल' यानी विष को पीकर देवताओं और असुरों दोनों की रक्षा की। इसी 'नीलकंठ' स्वरूप के कारण वे रक्षक के रूप में पूज्य हैं।
और तीसरा सरलता (आशुतोष) यानी भगवान शिव जटिल कर्मकांडों के मोहताज नहीं हैं। शिव पुराण कहता है कि भगवान शिव केवल एक लोटा जल और भावपूर्ण हृदय से भी प्रसन्न हो जाते हैं।
अब जानिये शिव पूजा की महिमा के बारे में
शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) में उल्लेख है कि महाशिवरात्रि को ही भगवान शिव प्रथम बार 'ज्योतिर्लिंग' के रूप में प्रकट हुए थे, जिसका न आदि था न अंत। ब्रह्मा और विष्णु ने भी इसी दिन प्रथम पूजन किया था।
लिंग पुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि पर जागरण करता है और शिव के पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जप करता है, वह सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।
स्कंद पुराण में भगवान शिव को 'अव्यक्त' बताया गया है। ऋषि मार्कण्डेय ने इसी रात्रि को महामृत्युंजय मंत्र की सिद्धि की थी, जिससे उन्होंने मृत्यु (यमराज) पर विजय प्राप्त की।
जब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछी यह बात
पुराणों के अनुसार एक बार माता पार्वती ने महादेव से पूछा- "प्रभु, आपकी कृपा पाने का सबसे सरल मार्ग क्या है?" महादेव ने उत्तर दिया— "हे देवी, बाहरी आडंबरों से मैं प्रसन्न नहीं होता। जो मनुष्य महाशिवरात्रि की रात समस्त जीवों के प्रति दया भाव रखता है और अपनी इंद्रियों को वश में कर 'मौन' धारण करता है, मैं उसके हृदय में सदैव वास करता हूँ।" जानकारों के मुताबिक यह प्रसंग सिखाता है कि शिव की पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार और करुणा में झलकनी चाहिए।
चार पुरुषार्थों की प्राप्ति -शिवपुराण
शिवपुराण के 'विद्येश्वर संहिता' में उल्लेख है कि भगवान महादेव की पूजा से मनुष्य को जीवन के चार मुख्य लक्ष्य प्राप्त होते हैं। ये हैं- धर्म: सन्मार्ग पर चलने की शक्ति। अर्थ: जीवन यापन के लिए धन और संसाधनों की प्राप्ति। काम: उचित इच्छाओं और सांसारिक सुखों की पूर्ति। मोक्ष: अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति।
अकाल मृत्यु से रक्षा और आरोग्य - स्कंद पुराण
स्कंद पुराण में भगवान शिव को 'मृत्युंजय' और 'वैद्यनाथ' कहा गया है। आरोग्य: जो व्यक्ति नियमित रूप से शिवलिंग का जलाभिषेक करता है, उसे असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। दीर्घायु: "महामृत्युंजय" के प्रभाव से भक्त की अकाल मृत्यु टल जाती है और वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है।
मानसिक शांति और आत्म-नियंत्रण - लिंग पुराण
शिव पूजा का सबसे बड़ा मानसिक लाभ 'चित्त की शुद्धि' है। शिव के 'अघोर' रूप की पूजा से भय, तनाव और मानसिक विकारों का नाश होता है। चूंकि शिव 'मन' के स्वामी चंद्रमा को धारण करते हैं, इसलिए उनकी पूजा से एकाग्रता बढ़ती है और क्रोध पर नियंत्रण आता है।
पापों का क्षय -पद्म पुराण
पद्म पुराण में कहा गया है कि शिव की पूजा 'अग्नि' के समान है जो जन्म-जन्मांतर के संचित पापों (बुरे कर्मों के प्रभाव) को जलाकर भस्म कर देती है।
पारिवारिक सुख और सौभाग्य - शिवपुराण - रुद्र संहिता
माता पार्वती और भगवान शिव का दांपत्य 'आदर्श' माना गया है। कुमारी कन्याओं को मनचाहा और सुयोग्य वर प्राप्त होता है। विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य और गृहस्थ जीवन में सामंजस्य की प्राप्ति होती है।
परम ज्ञान और मोक्ष - श्रीमद्भागवत
पुराणों के अनुसार, शिव 'ज्ञान' के देवता हैं। वे दक्षिणमूर्ति रूप में समस्त ऋषियों को ज्ञान देते हैं। उनकी पूजा से अज्ञान का अंधकार मिटता है और व्यक्ति को 'आत्मज्ञान' (स्वयं को पहचानने की शक्ति) प्राप्त होता है।
महाशिवरात्रि केवल उपवास और जागरण की रात नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर के 'शिव' को पहचानने का अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि विष को कंठ में रखकर भी अमृत बांटा जा सकता है और विनाश (पुरानी आदतों का) ही नए सृजन का आधार है। पुराणों का सार यही है कि शिव 'संपूर्ण' हैं। जहाँ वे योगियों के लिए 'आदियोगी' हैं, वहीं गृहस्थों के लिए 'कल्याणकारी' पिता। शिवपुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार, शिव की पूजा केवल 'पुण्य' कमाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य मानी गई है।
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