आरटीओ के पत्र से खुला वर्षों पुराना घोटाला: अफसर भी संदेह के घेरे में ;स्लीपर कोच पंजीकरण पर बड़ा सवाल प्रावधान ही नहीं तो रजिस्ट्रेशन कैसे
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शिवपुरी आरटीओ द्वारा हाल में जारी पत्र ने प्रदेश में स्लीपर कोच बसों के पंजीकरण और संचालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल है जब स्लीपर कोच के लिए न केंद्रीय मोटरयान अधिनियम न मप्र मोटरयान नियमों में स्पष्ट प्रावधान है तो फिर इन बसों का पंजीकरण आखिर किस आधार पर किया गया?
जिन बॉडी निर्माणों को अब अवैध बताकर निरस्त करने की बात कही जा रही है, वे वर्षों तक कैसे फिटनेस पाकर दौड़ती रहीं—यह अपने आप में एक बड़ा रहस्य है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह बसों के चेसिस 5 से 8 फीट तक एक्सटेंड कर बॉडी निर्माण होता रहा फिर भी किसी आरटीओ या परिवहन अधिकारी ने आपत्ति नहीं ली। ये गाड़ियां न केवल फिटनेस में पास हुईं, बल्कि नियमित रूप से पंजीकृत भी की गईं।
आज जब इन्हें निरस्त करने की कार्रवाई शुरू हुई है, तो सवाल उठना लाजिमी है क्या पहले किसी भी स्तर पर अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंदे रखीं?
सूत्रों के अनुसार स्लीपर कोचों के खिलाफ लगातार शिकायतें की गईं। वरिष्ठ अधिकारियों से परिवहन मंत्री तक लिखित शिकायतें पहुंचाई गईं, आरटीआई लगाई गईं और अखबारों में भी मामले उठे, इसके बावजूद किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
राजनीतिक दलों के पक्ष और विपक्ष—दोनों की चुप्पी भी संदेह पैदा करती है। आरोप यहां तक है स्लीपर कोचों में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर ‘दो नंबर की कमाई’ का हिस्सा लगा है, इसी कारण वर्षों तक यह अवैध व्यवस्था फलती-फूलती रही।
2009 में खुलासा फिर भी दबा मामला
पर्यटक यानों के लिए केवल ओमनी बसों में बर्थ का प्रावधान था। इसी आधार पर 24 अप्रैल 2001 को राज्य सरकार ने संकल्प पत्र क्रमांक 166 पारित कर डीलक्स बसों में व्हील बेस के अनुसार सीटें घटाकर स्लीपर बर्थ लगाने का रास्ता खोल दिया।
इसके बाद पूरे देश में स्लीपर कोचों की बाढ़ आ गई। हालांकि केंद्रीय मोटरयान नियम 1989 के नियम 128 में स्लीपर कोच का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था और न ही मध्य प्रदेश मोटरयान नियम 1994 में। इसी आधार पर महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में आपत्ति दर्ज की गई और बताया गया कि इससे राज्य को टैक्स के रूप में अरबों रुपए का नुकसान हुआ।
31 अक्टूबर 2009 को परिवहन विभाग ने संकल्प पत्र 166 को निरस्त कर दिया, जिससे स्लीपर बर्थ अवैध हो गई। रिपोर्ट में साफ कहा गया राज्य परिवहन प्राधिकरण को पर्यटक यानों में स्लीपर लगाने का अधिकार नहीं है। बावजूद जनहित का हवाला देकर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
कौन लेगा जिम्मेदारी?
वर्षों तक चले कथित महाघोटाले की जिम्मेदारी कौन लेगा? स्लीपर बसों में कई परिवहन अधिकारियों और राजनीतिक लोगों के निवेश की बात आ रही है। सरकार को हुए नुकसान की वसूली बस मालिकों से नहीं, बल्कि जिम्मेदार अफसरों व तत्कालीन मंत्रियों से भी की जानी चाहिए।
शिवपुरी आरटीओ के हालिया पत्र ने फिर स्पष्ट कर दिया है स्लीपर कोच का मामला सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि दशकों से चला आ रहा एक संगठित घोटाला है।
आरटीओ शिवपुरी का सख्त निर्देश
कार्यालय जिला परिवहन अधिकारी शिवपुरी ने सभी स्लीपर कोच संचालकों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। सभी पंजीकृत स्लीपर कोच से ड्राइवर पार्टीशन डोर तत्काल हटे। स्लाइडर तुरंत हटाए जाएं। फायर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (एफडीएसएस) के लिए एक माह का समय।
कम से कम 10 किलो क्षमता वाले अग्निशामक यंत्रों की अनिवार्य जांच। एक्सटेंडेड चेसिस निर्मित बस बॉडी को तत्काल परिचालन से हटाया जाए। निर्देशों का पालन न करने पर नियमानुसार कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
करोड़ों-अरबों का नुकसान, लेकिन न वसूली न जवाबदेही
महालेखाकार ने 2001 से 2009 के बीच स्लीपर कोचों से लगभग डेढ़ अरब रुपए के राजस्व नुकसान का आंकलन किया था। आरोप है इस घोटाले को दबा दिया गया क्योंकि खुलता तो बड़े पैमाने पर वसूली करना पड़ती। आरटीओ कार्यालयों में न वसूली की जानकारी दी गई न बंद करने से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए गए।
2009 में रोक के बावजूद 2010 में संशोधन कर फिर से स्लीपर कोचों का संचालन शुरू कर दिया गया और टैक्स वसूली भी शुरू हो गई, जबकि कानूनी प्रावधान तब भी स्पष्ट नहीं थे। 2012 में गजट नोटिफिकेशन लाने की कोशिश हुई, लेकिन मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन न होने के कारण जारी नहीं हो सका। इसके बावजूद 2014 में स्लीपर और 2015 में एसी स्लीपर कोचों को किराया सूची में शामिल कर लिया गया।
यात्री लुटे, सरकार को चूना, जिम्मेदार कौन?
आरोप है बस ऑपरेटरों को टैक्स में छूट दी गई, जबकि यात्रियों से दोगुना किराया वसूला गया। सरकार को कितना टैक्स मिलना चाहिए था और कितना मिला इसकी आज तक स्पष्ट गणना नहीं की गई। पहले भी खुलासा फर्स्ट द्वारा लगभग 180 अरब रुपये के घोटाले का खुलासा किया गया, लेकिन न परिवहन मंत्री ने जवाब दिया, न आयुक्त और न ही अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने।
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