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स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई में ‘हक’ पर डाका

KHULASA FIRST

संवाददाता

23 जनवरी 2026, 9:15 पूर्वाह्न
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स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई में ‘हक’ पर डाका

तत्कालीन अधीक्षक डॉ. डीके शर्मा पर पद के दुरुपयोग का संगीन आरोप, चहेतों को उपकृत करने के लिए ताक पर रखे शासन के नियम, हक मांगा तो मिला तबादला

चंचल भारतीय 98936-44317 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर का स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई अस्पताल इन दिनों आंखों की रोशनी लौटाने के लिए नहीं, बल्कि प्रबंधन की काली करतूतों और अंधेरगर्दी के कारण सुर्खियों में है। संस्थान के तत्कालीन अधीक्षक डॉ. डीके शर्मा के कार्यकाल में उपजे कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और कर्मचारियों के दमन की दास्तां अब गलियारों तक पहुंच गई है।

आरोप है कि गरीबों के लिए बनी आयुष्मान योजना की प्रोत्साहन राशि में जमकर बंदरबांट की गई और जब स्वाभिमानी नर्सिंग स्टाफ ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें न्याय देने के बजाय साजिशों के जाल में फंसाकर दंडात्मक कार्रवाई की गई।

विडंबना यह है कि गंभीर आरोपों के बावजूद डॉ. डीके शर्मा को दंड देने के बजाय एमजीएम प्रबंधन ने उन्हें सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल जैसे अति-महत्वपूर्ण संस्थान के अधीक्षक पद की कुर्सी पर बैठा दिया है, जिससे निष्पक्ष जांच की उम्मीदें दम तोड़ रही हैं।

संगठित आर्थिक अपराध से कम नहीं... शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए आयुष्मान योजना के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि का वितरण जिस तरह से किया गया वह किसी संगठित आर्थिक अपराध से कम नहीं है।

नियमानुसार यह राशि डॉक्टर से लेकर वार्ड बॉय तक तय अनुपात में वितरित होना चाहिए, लेकिन वर्ष 2022-23 के दौरान स्कूल ऑफ एक्सीलेंस में तैनात मूल नर्सिंग ऑफिसर स्नेहलता नरवरिया, मंगला धुर्वे और उनके कई साथियों को दरकिनार कर दिया गया।

इसके विपरीत सुपर अस्पताल से कथित तौर पर कार्य सुविधा के नाम पर बुलाई गई चहेती नर्सिंग ऑफिसरों श्वेता सेंगर और नेहा भूरिया पर धनवर्षा की गई। यह न केवल प्रशासनिक कदाचरण है, बल्कि उन निष्ठावान कर्मचारियों के साथ किया गया एक भद्दा मजाक है, जो वर्षों से संस्थान की नींव बनकर सेवाएं दे रहे हैं।

आयुक्त चिकित्सा शिक्षा के आदेशों की अनदेखी... आयुक्त कार्यालय द्वारा जारी नवीन आदेश क्रमांक 1-16/आयुष्मान/सचिशि/20 के तहत शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में कार्यरत नर्सिंग और चतुर्थ श्रेणी स्टाफ के लिए प्रोत्साहन राशि के उपयोग और वितरण की विस्तृत मार्गदर्शिका (गाइडलाइन) तय की गई थी।

इस नियम के तहत सर्जिकल और मेडिकल केस के आधार पर पैकेज की 3.5 प्रतिशत राशि नर्सिंग स्टाफ और 2 प्रतिशत राशि वार्ड बॉय व क्लास-4 श्रेणी के कर्मचारियों के लिए आरक्षित की गई है।

खुलासा फर्स्ट के तीखे सवाल
जब आयुष्मान योजना की राशि का बंदरबांट बाहरी स्टाफ में हो रहा था, तब संस्थान के मुखिया के तौर पर डॉ. अरविंद घनघोरिया डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज ने चुप्पी क्यों साधी? क्या यह विसंगति उनकी मौन सहमति से हुई?

भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाली

स्नेहलता नरवरिया को जांच के बजाय

प्रताड़ना और तबादला क्यों मिला? क्या

प्रबंधन की नीति अब भ्रष्टाचार बचाओ, शिकायतकर्ता हटाओ की हो गई है?

नियमितीकरण में यह दोहरा मापदंड
क्यों? कुछ को पसंद के आधार पर नियमित करना और अन्य को अधर में रखना किस

सेवा नियम के अंतर्गत आता है?
यह भी हैं गंभीर सवाल... संस्थान के मूल स्टाफ का हक छीनकर सुपर स्पेशलिटी से आए अपने चहेते कर्मियों को भुगतान करने का डॉ. डी.के. शर्मा तत्कालीन अधीक्षक, आई हॉस्पिटल एवं वर्तमान अधीक्षक का नैतिक और वैधानिक आधार क्या था?

क्या एक ही दिन में दो-दो नोटिस देना और बीमारी के बावजूद वेतन काटना आपके प्रशासनिक प्रतिशोध और पद के दुरुपयोग का प्रमाण नहीं है?

गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक आरोपों के बावजूद आप एक और महत्वपूर्ण पद पर काबिज हैं, क्या आपकी मौजूदगी इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच को प्रभावित नहीं कर रही?

शिकायतकर्ता पर ही मढ़ दिए आरोप
जब इस अन्याय के विरुद्ध नर्सिंग ऑफिसर स्नेहलता नरवरिया ने मुख्यमंत्री और संभाग आयुक्त के द्वार पर दस्तक दी तो सिस्टम ने अपनी कमियां सुधारने के बजाय शिकायतकर्ता का ही गला घोंटने की व्यूह रचना कर डाली।

तत्कालीन अधीक्षक के संरक्षण में बनी एक तथाकथित कमेटी ने आनन-फानन में शिकायतकर्ता पर ही मिथ्या आरोप मढ़ दिए और दंडात्मक रूप से उनका स्थानांतरण एमटीएच अस्पताल कर दिया। यह सीधे तौर पर ईमानदार तंत्र को डराने और भ्रष्टाचार की फाइलों पर पर्दा डालने की एक संस्थागत साजिश है।

सत्ता और रसूख का आलम यह है कि जिस अधिकारी को कठघरे में खड़ा होना था वह आज जांच को प्रभावित करने वाली स्थिति में आसीन है।

एक ही दिन में थमा दिए थे दो-दो कारण बताओ नोटिस
संस्थान के भीतर तुष्टीकरण और मानसिक प्रताड़ना का खेल यहीं नहीं रुका। अप्रैल 2022 में नियुक्त हुई कई नर्सों का परिवीक्षा काल पूर्ण होने के बावजूद उन्हें नियमितीकरण से वंचित रखा गया, जबकि कामिनी चौहान, छाया बोपचे और संगीता चौहान को तत्काल उपकृत कर दिया गया।

दूसरी ओर वनीता डेनियल आयुष्मान इंचार्ज, शिल्पा धाकड़, निधि रायकवार, मंगला धुर्वे, विनीता बिछोड़े, केजिया जोश और दीपा बरई जैसी नर्सिंग ऑफिसरों को प्रशासनिक उपेक्षा की आग में झोंक दिया गया। हद तो तब पार हुई जब बीमारी की सूचना और वैध मेडिकल सर्टिफिकेट देने के बाद भी मंगला धुर्वे का वेतन काट लिया गया और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए एक ही दिन में दो-दो कारण बताओ नोटिस थमा दिए गए।

डॉ. शर्मा के कार्यकाल के ये दाग एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया की कार्यप्रणाली और मंशा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं कि आखिर उनकी नाक के नीचे इतना बड़ा भ्रष्टाचार पलता रहा और वे मौन साधे रहे।

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