नीचता का जवाब नीचता से: फिर ब्राह्मण का श्रेष्ठता का दावा कैसा
महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल । मध्यप्रदेश में अजाक्स के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा का हालिया बयान सिर्फ शब्दों की चूक नहीं, बल्कि उस जहरीली मानसिकता
Khulasa First
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश में अजाक्स के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा का हालिया बयान सिर्फ शब्दों की चूक नहीं, बल्कि उस जहरीली मानसिकता का आईना है, जो जाति के नाम पर समाज को लगातार बांटने पर आमादा है। उनका यह कहना कि, ‘जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान नहीं देगा, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए’, न केवल अपरिपक्व और हास्यास्पद कथन है, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ एक खतरनाक संकेत भी है। संतोष वर्मा के बयान की जितनी भर्त्सना की जाए, कम है।
और निश्चित रूप से उन्हें कानून और सेवा नियमावली के तहत कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को व्यक्तिगत रिश्तों और जातीय सौदेबाजी से जोड़ना, समाज में नफरत की आग भड़काने जैसा ही है। हालांकि, आईएएस वर्मा ने बाद में स्वीकार भी किया कि उनसे गलत बयानी हो गई है। लेकिन क्या सिर्फ यही पर्याप्त है?
परंतु असली प्रश्न यह है कि इस बयान के विरोध में जो प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उन्होंने क्या स्तर बढ़ाया या गिराया? कथित ब्राह्मण संगठनों के कुछ नेताओं की भाषा देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। किसी ने कहा कि, ‘हम अपना ब्राह्मण बेटा आईएएस वर्मा तुम्हारे घर भेज देते हैं।’ सोशल मीडिया पर और भी अशोभनीय एवं अभद्र टिप्पणियां सामने आईं।
क्या यह किसी ऐसे वर्ग को शोभा देता है, जो स्वयं को समाज का पुरोधा, नैतिकता का प्रहरी, सरस्वती का उपासक और परशुराम का वंशज कहता है? जिसकी जिह्वा पर वेदों की वाणी होनी चाहिए, वहां इस तरह की स्तरहीन भाषा कैसे स्वीकार्य है? विडंबना तो यह है कि, वर्मा ने जहर फैलाया और जवाब देने वाले उसी जहर को चाटने लगे।
यदि एक व्यक्ति नीच बयान दे, तो क्या उसके प्रतिवाद में भी नीच ही बन जाना चाहिए? क्या यही संस्कार? क्या यही ‘उत्तम’ होने का दावा? यह भी कटु सत्य है कि, आज ब्राह्मण इतना ‘श्रीहीन’ हो गया है कि, अपने और अपनी बहन-बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए उसे सड़कों पर उतरकर धरने-प्रदर्शन करने पड़ रहे हैं।
क्या यह वही ‘श्रेष्ठी वर्ण’ है जिसने सदियों तक ज्ञान, संयम और धर्म की धुरी बनकर समाज को दिशा दी? ब्राह्मण वह है जो ‘ब्रह्म’ को जानने का साधक हो। चरित्र, ज्ञान, तप और विवेक जिसकी पहचान हो। केवल उपनाम लेकर ब्राह्मण कहलाना पर्याप्त नहीं। इसलिए इस विमर्श में यह सवाल भी शामिल होना चाहिए।
क्या वर्मा जैसे लोगों का अस्तित्व स्वयं ब्राह्मणों की आचरणगत गिरावट की उपज नहीं है? इसलिए हर प्रतिक्रिया से पहले यह सोचना आवश्यक है कि हम आग बुझा रहे हैं या उसे और भड़का रहे हैं। समाज को जातीय खांचों, नफरत और प्रतिशोध की राजनीति में धकेल देने वाले ऐसे बयान और उनका उन्मादी प्रतिवाद, दोनों ही देश की आत्मा पर प्रहार हैं।
आरक्षण समाज में न्याय और बराबरी लाने का संवैधानिक प्रयास है। किसी की निजी कुंठा, रिश्तेदारी या सामाजिक सौदेबाजी का औजार नहीं। विरोध करने वालों को भी यह समझना होगा कि, नीचता का जवाब नीचता से दिया जाए, तो ब्राह्मण की श्रेष्ठता और सनातन संस्कृति का समूचा दावा ढह जाता है। कहने के निहितार्थ हैं कि-ब्राह्मण वह है, जो ज्ञान को जिये, ब्रह्म की ओर चले, और समाज को आलोकित करे। चरित्र ही ब्राह्मण की असली पहचान है। बाकी सब भ्रम, अहंकार और पाखंड है।
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