राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: व्यक्ति निर्माण से विश्व कल्याण की यात्रा
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. मनमोहन प्रकाश स्वतंत्र पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘हम शाखाएं नहीं चलाते, जीवन गढ़ते हैं।’ संघ की कार्यपद्धति को व्याख्यायित करने वाला यह सूत्र मात्र एक कथन नहीं, बल्कि उस मौन क्रांति का आधार है जिसने भारत की सामाजिक चेतना को नया आयाम दिया है।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) केवल एक संगठन नहीं, अपितु एक विचार, एक अनुशासित आचरण और जीवंत सांस्कृतिक परंपरा बन चुका है। इसकी जड़ें भारत की सनातन मिट्टी में जितनी गहरी हैं, इसका विस्तार विश्व पटल पर उतना ही व्यापक है।
सन् 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा रोपा गया यह बीज किसी तात्कालिक राजनीति की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दीर्घकालिक ‘सांस्कृतिक समाधान’ था। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अपूर्ण है, जब तक समाज आत्मबोध और राष्ट्रप्रेम के सूत्र में न बंधा हो। इसी विजन से ‘शाखा’ का जन्म हुआ, जहाँं खेल, योग और वैचारिक विमर्श के माध्यम से ‘स्वयंसेवक’ के रूप में राष्ट्र को समर्पित नेतृत्व गढ़ा जाता है।
संघ की मूल शक्ति उसकी ‘शाखा’ है। यह एक ऐसा खुला मंच है जहां पद, प्रतिष्ठा या जाति का भेद विलीन हो जाता है। यहां नेतृत्व जन्मजात नहीं, बल्कि साधना और समर्पण से अर्जित होता है। ‘हिंदुत्व’ को एक समावेशी सांस्कृतिक पहचान मानते हुए संघ ने सामाजिक समरसता को व्यवहार में उतारा है। एक ही पंक्ति में भोजन और एक ही गणवेश में प्रशिक्षण, भारत में व्याप्त जातिवाद की जड़ों पर संघ का सबसे प्रखर प्रहार है।
संघ ने कभी प्रचार को प्राथमिकता नहीं दी, बल्कि ‘सेवा’ को ही संगठन का परिचय बनाया। ‘सेवा भारती’ और ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ जैसे प्रकल्पों के माध्यम से देश के सुदूर जनजातीय अंचलों और वंचित बस्तियों में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के कार्य किए जा रहे हैं। आपदाओं के समय स्वयंसेवकों की तत्परता यह सिद्ध करती है कि संवेदनशीलता ही राष्ट्र की असली शक्ति है।
आज संघ का विचार भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुका है। विश्व के अनेक देशों में संघ (हिंदू स्वयंसेवक संघ के रूप में) भारतीय प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़ रहा है। संघ की निस्वार्थ सेवा प्रवृत्ति ने प्राकृतिक आपदाओं और कोविड संकट के दौरान ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भारतीय दर्शन को वैश्विक मान्यता दिलाई है। यह विस्तार किसी भू-भाग को जीतने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक कल्याण के लिए है।
विविध क्षेत्रों में राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा से उपजी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विद्या भारती, विज्ञान भारती, साहित्य भारती, सेवा भारती, शिक्षा संस्कृति न्यास, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय सेविका समिति,भारतीय मजदूर संघ जैसे अनेकों अनुषांगिक संगठन आज अपने-अपने क्षेत्रों में ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ के मंत्र के साथ कार्य कर रहे हैं। ये संगठन प्रशासनिक रूप से स्वतंत्र होकर भी संघ के उसी एकात्म दर्शन से पोषित हैं, जो समाज को समर्थ और स्वाभिमानी बनाना चाहता है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि व्यक्ति निर्माण से प्रारंभ होकर विश्व कल्याण तक फैली यह यात्रा वास्तव में भारतीय मानस के पुनरुत्थान की यात्रा है। महत्वपूर्ण यह है कि संघ ने सत्ता को कभी साध्य नहीं माना, बल्कि समाज को इतना सशक्त बनाने का संकल्प लिया कि वह स्वयं अपनी समस्याओं का समाधान कर सके। आज यह विचार एक ‘संगठन’ की सीमाओं को पार कर जन-जन की ‘सामूहिक चेतना’ बन चुका है।
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