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खनन पर सौ फीसदी रोक से ही बच सकेगा अरावली

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संवाददाता

30 दिसंबर 2025, 4:42 pm
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खनन पर सौ फीसदी रोक से ही बच सकेगा अरावली

अजय बोकिल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश की राजधानी दिल्ली और पश्चिमी भारत की पर्यावरण ढाल कही जाने वाली अरावली पर्वत माला में नए खनन पर केन्द्र सरकार ने पर्यावरणप्रेमियों के भारी विरोध के चलते अभी भले ही रोक दिया हो, लेकिन भविष्य में ऐसा नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इससे भी अहम मुद्दा उन खदानों का है, जो वहां अभी चल रही हैं।

राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में ऐसी 1008 खदानें चल रही हैं। सरकार ने इनके बारे में सिर्फ इतना कहा है कि इन पर पर्यावरण सख्ती और बढ़ेगी। जबकि सामान्य अनुभव तो यह है कि वैध खदान से कई गुना ज्यादा खनन तो अवैध तरीके से होता है। जब तक अरावली में खनन पर सौ फीसदी रोक नहीं लगती तब तक ‘दिल्ली के इन फेंफड़ों’ को बचाने की बात कागजी ज्यादा है।

अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन रेंज में से एक है, जो लगभग 2.5 अरब वर्ष पूर्व बनी हैं। यह ऋषि पराशर की तपोभूमि है और महर्षि वेद व्यास का जन्म भी यहीं हुआ माना जाता है। हिमालय से भी प्राचीन यह पर्वत श्रृंखला 692 किमी लंबी है और पांच राज्यों से होकर गुजरती है।

इसका अस्सी फीसदी हिस्सा राजस्थान में है। इतने सालों से शान से खड़ी यह पर्वत मामला 21 सदी के आते-आते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर है। ताजा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद शुरू हुआ, जिसमें उसने पहाडि़यों की केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ‘वैज्ञानिक परिभाषा’ को मंजूरी दी।

विगत 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृति को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। इस आदेश से सिर्फ राजस्थान के 15 जिलों में 20 मीटर से ऊंची 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (8.7 फीसदी) ही इस मानक को पूरा कर सकेंगी और 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा।

यानी इस इलाके में खनन हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अरावली को बचाने को लेकर 1000 किलोमीटर लंबी ‘अरावली आंदोलन’ जनयात्रा माउंट आबू में शुरू हुई। ग्रीनमैन नरपतसिंह राजपुरोहित ने अपने खून से राष्ट्रपति के नाम लिखा ज्ञापन बाड़मेर कलेक्टर टीना डाबी दिया और ‘अरावली बचाओ’ जैसे स्लोगन भी लिखे।

बहरहाल मोदी सरकार ने अरावली से नई छेड़छाड़ पर रोक लगाकर संवेदनशीलता दिखाई है। सरकार दबाव में इसलिए आई क्योंकि आम लोगों के विरोध के साथ-साथ यह राजनीतिक मुद्दा भी बनता जा रहा था। वरना एक हफ्ते पहले तो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव अरावली में खनन को जायज बताते हुए कह रहे थे कि वहां केवल 277. 89 वर्ग किमी में ही खनन की अनुमति दी गई है, जो अरावली पर्वतमाला के कुल क्षेत्र 1 लाख 43 हजार 577 वर्ग किमी का महज 0.19 फीसदी है। ऐसे में सवाल उठ रहा था कि क्या सरकार खनन को बढ़ावा देने की अपनी मंशा को आंकड़ों में छिपाना चाहती है?

पूर्व में इसी संदर्भ में केन्द्र सरकार का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल 2005 के आदेश के बाद अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टे देने पर रोक है, जिसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। क्योंकि खनन गतिविधियों से 8 लाख लोगों को सीधे और 20 से 25 लाख लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।

कोर्ट के प्रतिबंधों से लगभग 10 हजार औद्योगिक इकाइयां भी प्रभावित हुई हैं, जिनमें हजारों करोड़ रुपये का निवेश हुआ है। ये इकाइयां अरावली क्षेत्र वाले 16 जिलों की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।

यह तर्क अपनी जगह है, लेकिन लोगों के रोजगार की चिंता किस कीमत पर की जा रही है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हालांकि केन्द्र सरकार ने कहा है कि अब अरावली के किसी भी हिस्से में खनन की नई मंजूरी नहीं मिलेगी। यह नियम पूरे लैंडस्केप पर समान रूप से लागू होगा।

लेकिन विपक्षी कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। पूर्व केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री व कांग्रेस नेता जयराम रमेश का आरोप है कि सरकार अरावली की ‘परिभाषा’ बदलकर लोगों को गुमराह कर रही है। रमेश के अनुसार भारतीय वन सर्वेक्षण, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी और न्याय मित्र ने इस नई परिभाषा का विरोध किया था।

फिर भी सरकार इसे क्यों थोप रही है? इस पर केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस ‘गलत सूचना’ फैला रही है। अरावली के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही कानूनी रूप से खनन हो रहा है।

दूसरी तरफ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि केन्द्रीय सशक्त समिति ( सीईसी) के वर्ष 2024 के दस्तावेज में राजस्थान सरकार के ड्राफ्ट विजन डॉक्यूमेंट-2047 का उल्लेख है, जिसमें राज्य के आर्थिक विकास के लिए अरावली में खनन क्षेत्र 2,339 वर्ग किलोमीटर से बढ़ाकर 4,000 वर्ग किलोमीटर करने की योजना है।

जबकि केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने जिस 277.9 वर्ग किमी में खनन की बात कही थी, वह संशोधित परिभाषा है। बहरहाल विवाद की असली जड़ यह है कि ‘अरावली’ किसे माना जाए? विपक्ष का आरोप है कि सरकार परिभाषा बदलकर अरावली का दायरा कम कर रही है ताकि बाकी जगहों पर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा सके, जबकि सरकार इसे संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है।

गौरतलब है कि अरावली पर्वत श्रृंखला को उत्तर-पश्चिम भारत का ‘फेफड़ा’ और ‘दीवार’ माना जाता है। यह दीवार थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर (दिल्ली और यूपी) बढ़ने से रोकती है और भूजल रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाती है। दिल्ली-एनसीआर को धूल भरी आंधियों से बचाती है।

दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला केवल प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं, बल्कि जीवनरक्षक संसाधनों का भी खजाना है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर अरावली पर्वतमाला खत्म हुई तो भविष्य में दिल्ली और आसपास का इलाका रेगिस्तान में बदल सकता है।

इस बीच केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कहा कि जब तक अरावली की वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार नहीं हो जाती, वहां खनन की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसका मकसद अरावली को एक ‘निरंतर भूवैज्ञानिक रिज’ के रूप में बचाना है। पर्यावरण मंत्रालय ने ‘इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन’ ( आईसीएफआरई) को पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाकों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं, जहां खनन पूरी तरह वर्जित होगा।

यह काम क्षेत्र की यह काम इकोलॉजी और जियोलॉजी को ध्यान में रखकर किया जाएगा। आईसीएफआरई एक व्यापक और वैज्ञानिक ‘सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान’ तैयार करेगा। जिसमें यह देखा जाएगा कि पर्यावरण कितना बोझ झेल सकता है। संवेदनशील इलाकों की पहचान की जाएगी। इस प्लान को जनता के सामने भी रखा जाएगा ताकि लोग अपनी राय दे सकें।

इसी दौरान हरियाणा वन विभाग के एक रिटायर्ड अधिकारी आर.पी.बलवान ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति द्वारा 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली के रूप में मान्यता देने की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि यह तकनीकी मुद्दा न होकर उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। इस पर सुनवाई 7 जनवरी को होना है। उल्लेखनीय है कि डाॅ. बलवान ‘द अरावली इको सिस्टम मिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशन’ पुस्तक के लेखक भी हैं।

वो बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार अरावली की 31 पहाड़ियां खनन से खत्म हो चुकी हैं। इस कमेटी ने राजस्थान के 15 जिलों को खनन से प्रभावित बताया था। पर्यावरण नुकसान को धता बताते हुए खनन से हर साल करीब 5000 करोड़ की रॉयल्टी विभिन्न माइनिंग कंपनियों को मिलती है।

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