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प्रदेश में एक भी कलेक्टर ईमानदार नहीं: राजनीतिक संरक्षण और ‘व्हाइट कॉलर’ भूमाफिया

Khulasa First

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संवाददाता

29 जनवरी 2026, 5:04 pm
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प्रदेश में एक भी कलेक्टर ईमानदार नहीं

सरकारी जमीन से देवस्थान तक भूमाफिया-अफसरों की खतरनाक जुगलबंदी,

क्या मुख्यमंत्री असहाय हैं या व्यवस्था बंधक बन चुकी है?

अंकित शाह 99264-99912 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर कटघरे में है। एक मीडिया समूह द्वारा किए गए खुलासे और उसके बाद जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी खंडन ने भले ही सरकारी स्तर पर सफाई देने की कोशिश की हो, लेकिन जो सवाल खड़े हुए हैं, वे अब दबने वाले नहीं दिखते।

चर्चा सिर्फ भोपाल तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में भी यह बहस तेज हो गई है कि क्या प्रदेश में एक भी कलेक्टर ईमानदार है? और यदि नहीं, तो फिर मुख्यमंत्री की भूमिका क्या है, क्या वे असहाय हैं या फिर पूरा सिस्टम ही मिलीभगत का शिकार हो चुका है?

सरकारी ग्रीन बेल्ट, देवस्थान की सैकड़ों साल पुरानी भूमि, तालाबों और मंदिरों की जमीन पर अवैध कॉलोनियां, हजारों फर्जी रजिस्ट्रियां, हजारों करोड़ के राजस्व नुकसान और वर्षों से लंबित शिकायतें, ये सब संकेत करते हैं कि यह सिर्फ जमीन घोटाला नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का संगठित मॉडल है।

कलेक्टर के नाम चढ़ी जमीन पर भी अवैध कॉलोनियां!
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कलेक्टर के नाम दर्ज सरकारी जमीन भी सुरक्षित नहीं रही। सैकड़ों अवैध कॉलोनियां काट दी गईं, भूखंडों की खुलेआम खरीदी-बिक्री हुई और आज भी यह खेल बदस्तूर जारी है। सवाल यह नहीं कि भूमाफिया सक्रिय हैं, सवाल यह है कि प्रशासन आंखें मूंदे क्यों बैठा है?

यदि कलेक्टर ईमानदार होते, तो क्या वर्षों तक सरकारी जमीन पर कब्जा संभव था? और यदि मान भी लिया जाए कि उन्हें जानकारी नहीं थी, तो जब जानकारी मिली, तब क्या कार्रवाई हुई?

किन-किन अधिकारियों को दोषी ठहराया गया? जांच के बाद कितनों को सजा मिली? पीड़ितों को पैसा या प्लॉट वापस मिला या नहीं? सरकारी राजस्व की वसूली कितनी हुई?

इन सब सवालों के जवाब आज भी फाइलों में दफन हैं।

इंदौर में ताजा सुर्खियों में कई ऐसे नामों का खुलासा हुआ है, जिन पर करोड़ों-अरबों रुपए की धोखाधड़ी के आरोप हैं। यह कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण से पनपे ‘व्हाइट कॉलर’ भूमाफिया हैं।

कानून इनके सामने अक्सर बेबस नजर आता है, क्योंकि धाराएं हाथ बांध देती हैं और आरोपी बेखौफ घूमते रहते हैं। यह धारणा अब आम होती जा रही है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करना सबसे आसान काम बन गया है। बस, अधिकारियों और नेताओं से ‘सहमति’ होनी चाहिए।

मामला एक : 53 साल पुराना विदुर नगर घोटाला, आज भी जारी है फर्जीवाड़ा, अहिरखेड़ी की 443 एकड़ शासकीय जमीन कैसे बन गई निजी संपत्ति?

अहिरखेड़ी में सिरपुर तालाब से लगी सर्वे नंबर 525 की 443 एकड़ जमीन वर्ष 1962-63 तक शासकीय थी और राजस्व रिकॉर्ड में विश्रामबाग के नाम से दर्ज थी, लेकिन 1964 में यह जमीन महारानी उषाराजे होलकर के नाम दर्ज हो गई, बिना किसी स्पष्ट शासकीय आदेश के। यहीं से शुरू हुआ अवैध कॉलोनियों का सिलसिला।

ग्रीन बेल्ट पर कॉलोनियां, जमीन खरीदी-बिक्री जारी
निजी होने के बाद इस जमीन के टुकड़े किए गए और उस पर विदुर नगर, प्रजापत नगर सहित कई अवैध कॉलोनियां बसा दी गईं। आज भी खाली जमीन पर प्लॉट बेचे जा रहे हैं और अवैध निर्माण जारी है।

सहकारी संस्था की आड़ में सुनियोजित लूट
1971 में ऋषिकुमार शुक्ला ने नाइटेगल नाम से संस्था पंजीकृत करवाई, जिसे 1975 में विदुर नगर सहकारी संस्था में बदल दिया गया। इसके बाद शुक्ला परिवार ने अध्यक्ष पद पर रहकर हजारों सदस्यों को आवंटन-पत्र जारी किए, जिनके आधार पर रजिस्ट्रियां हुईं।

135 एकड़ जमीन का षड्यंत्रपूर्ण विक्रय
1995 में विदुर नगर संस्था के ही अध्यक्ष रहते हुए प्रदीप और राकेश शुक्ला ने षड्यंत्रपूर्वक 135 एकड़ जमीन मोहनदास रामरख्यानी, राजकुमार खतुरिया और नारायणदास को बेच दी, जबकि उसी जमीन पर पहले ही 835 लोगों को प्लॉट आवंटित हो चुके थे।

संस्था पर कब्जा, रिश्तेदारों की एंट्री
1998 में इन तीनों ने संस्था के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और संचालक पदों पर खुद को काबिज कर लिया और रिश्तेदारों को भी संचालक मंडल में शामिल कर लिया। इसके बाद झूलेलाल गृह निर्माण संस्था नाम की डमी संस्था बनाकर 28 एकड़ जमीन बेच दी गई। बगीचे, स्कूल और ओपन स्पेस भी नहीं छोड़ा... विदुर नगर में प्रस्तावित 24 बगीचों में से आज सिर्फ 8 बचे हैं। स्कूल की जमीन तक बेच दी गई। वह भी सहकारिता विभाग के अधिकारियों की कथित मिलीभगत से।

1000 करोड़ से ज्यादा का घोटाला!
आरोप है कि 5000 से ज्यादा फर्जी प्लॉट बेचे गए, 2000 अतिरिक्त फर्जी रजिस्ट्रियां हुईं, रजिस्ट्री शुल्क में अवैध छूट दी गई, शासन को 1000 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ।

मामला दो : 675 साल पुरानी देवस्थान भूमि पर कब्जा, श्री महादेव मंदिर की जमीन पर कैसे बन गई कॉलोनियां?

होलकर स्टेट के दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि यह भूमि श्री महादेव मंदिर चंद्रहास्य देवस्थल के नाम पर दर्ज थी। मिसल बंदोबस्त रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर के पास लगभग 35 एकड़ भूमि थी, जो स्पष्ट नहीं है और अधिक भी हो सकती है।

पेशवाकालीन दान और इनामी भूमि
यह भूमि पेशवाकाल में पूजा-पाठ के लिए दान दी गई थी। खसरा नंबर 1458 से 1468 तक देवस्थान की इनामी भूमि के रूप में दर्ज थे।

खसरों में हेरफेर, निजी नाम चढ़ाए गए
आरोप है कि नजूल विभाग के अधिकारियों और कॉलोनाइज़र की साठगांठ से खसरों में हेरफेर किया गया, निजी नाम दर्ज किए और अवैध कॉलोनियां काट दी गईं।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
मामले में हाई कोर्ट, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की जा रही है। यह भी आरोप है कि आकाश गृह निर्माण सहकारी संस्था के नाम जमीन चढ़ाने के लिए 50 लाख रुपए की रिश्वत ली गई।

शिकायतें, जांच और दबाया गया सच
मुन्ना उर्फ लीलाधर चौधरी द्वारा की गई शिकायतों के बाद सीजेआई के आदेश पर जांच शुरू हुई, लेकिन आरोप है कि कलेक्टर कार्यालय में जांच दबा दी गई। आज भी भूमि की नपती नहीं हुई, पंचनामा नहीं बना, दोषियों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

सबसे बड़ा सवाल...जब जमीन देवस्थान के नाम दर्ज थी, सरकारी रिकॉर्ड मौजूद हैं, ऐतिहासिक दस्तावेज प्रमाणित हैं, तो फिर नामांतरण कैसे हुआ? निजी व्यक्तियों को जमीन कैसे मिली? उस समय पदस्थ अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

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