बुंदेलखंड के कायाकल्प का मोहन का ‘मनमोहक’ रोडमैप
महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट । बुंदेलखंड…यह शब्द अपने भीतर वर्षों की उपेक्षा, सूखा, पलायन, बेरोजगारी और टूटी उम्मीदों का इतिहास समेटे हुए है। मप्र के हृदय में बसे होने के बावजूद बुंदेलखंड हम
Khulasa First
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
बुंदेलखंड…यह शब्द अपने भीतर वर्षों की उपेक्षा, सूखा, पलायन, बेरोजगारी और टूटी उम्मीदों का इतिहास समेटे हुए है। मप्र के हृदय में बसे होने के बावजूद बुंदेलखंड हमेशा सरकारों-नेताओं के भाषणों में तो चमकता रहा, पर विकास योजनाओं की फाइलों में हमेशा धूल चाटता रहा। चुनावी नारों की गहमागहमी खत्म होते ही बुंदेलखंड फिर उसी बेचैनी और बेसहारेपन की ओर धकेल दिया जाता।
यही नहीं, सच यह भी है कि जनप्रतिनिधियों ने खुद तो खूब सत्ता की मलाई खाई, लेकिन बुंदेलखंड के लिए वह जज्बा कभी नहीं दिखाया, जिसकी उसको दरकार थी। नतीजा, बुंदेलखंड बदहाली, सूखे और राजनीतिक उपेक्षा का स्थायी पर्याय बनता गया।
लेकिन खजुराहो की कैबिनेट बैठक ने पहली बार इस क्षेत्र के भविष्य की एक ठोस और सुविचारित पटकथा पेश की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने साफ संकेत दिया है कि बुंदेलखंड अब दया का पात्र नहीं, मप्र की औद्योगिक क्रांति का ग्राउंड ज़ीरो बनने जा रहा है।
सागर के मसवासी ग्रंट औद्योगिक क्षेत्र के लिए 24,240 करोड़ का निवेश, 29 हजार रोजगार और 42 औद्योगिक इकाइयों की मंजूरी, यह उस पलायन को उलटने का ऐलान है जिसने बुंदेलखंड की कई पीढ़ियां निगल लीं। अब नौकरी के लिए बड़े शहरों की ओर भागने वाला युवा, अपने ही इलाके में उद्योग खड़ा करेगा और रोजगार के नए अवसर गढ़ेगा।
इसी तरह 76 किमी सागर–दमोह फोरलेन सिर्फ सड़क नहीं, व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा और निवेश का नया राजमार्ग बनेगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में दमोह, छतरपुर और बुधनी में मेडिकल कॉलेज संचालन हेतु 1605 पदों की मंजूरी और 11 जिलों में स्वास्थ्य संस्थानों का अपग्रेडेशन यह उस पीड़ा को खत्म करने की पहल है, जब अस्पताल की दूरी ही बेमौत का कारण बन जाती थी।
मुख्यमंत्री के इरादों में बुंदेलखंड के सबसे गहरे ज़ख्म पानी पर भी निर्णायक हस्तक्षेप दिखा है। तेंदूखेड़ा की झापन नाला परियोजना से लेकर पहले से उम्मीद जगाती बेतवा-कैन लिंक परियोजना तक, यह साफ संकेत है कि बुंदेलखंड में सूखे की कहानी अब अंत की ओर है और हरियाली की शुरुआत तय है।
लेकिन इस पूरे बुंदेलखंड कायाकल्प पैकेज में मुख्यमंत्री को एक कठोर सच्चाई भी ध्यान में रखनी होगी कि नौकरशाही की लापरवाही और जिम्मेदार तंत्र की फाइलों में पेचीदगियां भरने वाली पुरानी आदतें। खतरा यही है कि कहीं ऐसा न हो कि दो-तीन साल में धरती पर उतरने वाला बुंदेलखंड के कायाकल्प का यह ‘रोडमैप’ फिर वही लेट-लतीफी, भर्राशाही और अनुमोदन-दौरों का शिकार हो जाए।
योजना जितनी भव्य है, उसके लिए उतनी ही निर्दय निगरानी, कठोर समयबद्धता और स्पष्ट जवाबदेही अनिवार्य है। क्योंकि बुंदेलखंड अब नेताओं के भावुक भाषण, बहानेबाजी और नौकरशाहों की मक्कारी का बोझ नहीं ढो सकता। वह अपना हक और परिणाम चाहता है। मोहन बाबू आपने इरादा दिखाया है, तो अब परिणाम दिखाना भी अनिवार्य है।
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