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लावारिस हुई जिंदगी, मगर मौत को मिला सम्मान: सैटेलाइट जंक्शन की खामोश त्रासदी और इंसानियत की मिसाल बना इंदौर

खुलासा फर्स्ट, इंदौर । लसूड़िया थाना क्षेत्र स्थित सैटेलाइट जंक्शन में उस वक्त गहमागहमी बढ़ गई, जब एक बंद मकान से उठती बदबू ने लोगों को भीतर झांकने पर मजबूर कर दिया। दरवाजा खुलते ही जो मंजर सामने आया,...

Khulasa First

संवाददाता

20 दिसंबर 2025, 12:54 अपराह्न
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लावारिस हुई जिंदगी, मगर मौत को मिला सम्मान

खुलासा फर्स्ट, इंदौर
लसूड़िया थाना क्षेत्र स्थित सैटेलाइट जंक्शन में उस वक्त गहमागहमी बढ़ गई, जब एक बंद मकान से उठती बदबू ने लोगों को भीतर झांकने पर मजबूर कर दिया। दरवाजा खुलते ही जो मंजर सामने आया, उसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर दिया। मकान के अंदर कन्हैयालाल परनवाल और उनकी पत्नी स्मृति परनवाल के सड़े-गले शव पड़े थे। अनुमान है कि दोनों की मौत करीब 15 दिन पहले हो चुकी थी, लेकिन इस लंबे समय में न कोई परिजन आया, न कोई परिचित और न ही कोई ऐसा, जिसने उनकी खैरियत जानने की कोशिश की।

पुलिस जांच में और भी पीड़ादायक सच सामने आया कि परनवाल दंपति के परिजन ने उनके शव लेने से साफ इंकार कर दिया। चार भाइयों में से एक कन्हैयालाल मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रहने वाले थे। कई साल पहले वे पत्नी स्मृति के साथ इंदौर आकर बस गए थे। धीरे-धीरे उन्होंने न सिर्फ पड़ोसियों से दूरी बना ली, बल्कि परिजन से भी संपर्क लगभग खत्म कर दिया था।

मकान की तलाशी के दौरान पुलिस को एक डायरी मिली, जिसमें कन्हैयालाल के बड़े भाई का मोबाइल नंबर दर्ज था। लसूड़िया टीआई तारेश सोनी ने जब उन्हें फोन कर कन्हैयालाल और स्मृति की मौत की सूचना दी और इंदौर आने को कहा, तो जवाब और भी ज्यादा चुभने वाला था।

बड़े भाई ने आने से इंकार करते हुए पुलिस से ही दोनों का दाह संस्कार करने को कह दिया। महीनों में एक-दो बार बात होने का हवाला देकर रिश्तों की जिम्मेदारी से उन्होंने हाथ खड़े कर दिए।

गुरुवार को मिले दोनों शवों का पोस्टमॉर्टम किया जाना है, लेकिन उससे पहले यह साफ हो चुका था कि यह दंपति न सिर्फ जीवन में, बल्कि मृत्यु के बाद भी पूरी तरह लावारिस हो चुके हैं। ऐसे वक्त में, जब अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तब इंसानियत ने दस्तक दी।

सूचना मिलते ही सुल्ताने इंदौर एकता सेवा समिति आगे आई और वह कर दिखाया, जो शायद एक संवेदनशील समाज को करना चाहिए। संस्था के स्वयंसेवक बिना किसी भेदभाव, प्रचार या शोर-शराबे के मौके पर पहुंचे और पूरे मानवीय भाव के साथ जिम्मेदारी संभाली।

संस्था के मार्गदर्शक करीम खान, जय्यु जोशी, फिरोज खान और सुरेश मोरे के नेतृत्व में टीम ने पुलिस और प्रशासन से समन्वय बनाकर सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की। इसके बाद सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार कन्हैयालाल व स्मृति परनवाल का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कराया गया।

श्मशान की उस खामोशी में उठी प्रार्थनाएं सिर्फ दो आत्माओं की शांति के लिए नहीं थीं, बल्कि उन टूटते रिश्तों और मरती संवेदनाओं के खिलाफ एक मौन सवाल भी थीं।

यह अंतिम संस्कार केवल एक औपचारिक प्रक्रिया के बजाय उन दो जिंदगियों को दिया गया सम्मान था, जो शायद जीते-जी कभी उन्हें नसीब नहीं हुआ। सुल्ताने इंदौर एकता सेवा समिति कई वर्षों से लावारिस शवों के अंतिम संस्कार, बेसहारा बुज़ुर्गों की सेवा, गरीबों को भोजन, ठंड में कंबल वितरण और जरूरतमंदों की हरसंभव मदद में निरंतर अग्रसर है। धर्म, जाति या पहचान से ऊपर उठकर यह संस्था सिर्फ इंसान को इंसान मानकर सेवा करती है।

इंदौर संवेदनाओं और इंसानियत का शहर...यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि इंदौर सिर्फ स्वच्छता वाला ही नहीं, बल्कि संवेदनाओं और इंसानियत का भी शहर है। ऐसी संस्थाएं समाज की वह धड़कन हैं, जो यह भरोसा दिलाती हैं कि अगर अपनों ने साथ छोड़ दिया, तो इंसानियत अब भी जिंदा है।

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