मेट्रो के नाम पर हरियाली का कत्ल, क्या यही विकास है: विकास से किसी को आपत्ति नहीं; पर क्या बेज़ुबानों के आशियाने उजाड़ना जरूरी है
Khulasa First
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के विस्तार और आधुनिक सुविधाओं के विकास पर किसी को आपत्ति नहीं है। मेट्रो चले, सड़कें चौड़ी हों, शहर प्रगति की नई ऊंचाइयों तक पहुंचे, इससे किसी को परहेज भी नहीं, लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की इस दौड़ में वर्षों, बल्कि दशकों से खड़े पेड़ों को उजाड़ देना ही एकमात्र रास्ता है?
ये पेड़ किसी परियोजना की फाइल में दर्ज महज आंकड़े नहीं हैं। ये वही बेजुबान साक्षी हैं जो तपती गर्मी में छांव देते हैं, बारिश में जीवन को थामते हैं, सर्दी में पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं और हर सांस के साथ हमें ऑक्सीजन का अमूल्य उपहार देते हैं। बदले में उन्होंने कभी कुछ नहीं मांगा, सिवाय सुरक्षा के।
दुर्भाग्य यह है कि आज विकास के नाम पर इन्हीं बेजुबानों को बेसहारा किया जा रहा है। मेट्रो, इमारतों, कांक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए हरे-भरे वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। क्या विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया गया? क्या संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की कोशिश हुई? या फिर सबसे आसान रास्ता चुन लिया गया कि पेड़ों को काट दो? जब प्राकृतिक आपदाएं दस्तक देती हैं तब हम प्रकृति को दोष देने से नहीं चूकते, लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि प्रकृति से की गई यही बेरहमी एक दिन लौटकर हिसाब मांगती है।
विकास का विरोध कोई नहीं कर रहा, विरोध उस अंधे विकास का है जो पर्यावरण की बलि लेकर आगे बढ़ता है। हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है कि वह हरियाली के इस विनाश के खिलाफ आवाज उठाए। यदि हम प्रकृति के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि उसके रक्षकों पेड़ों को बचा सकें, तो फिर खुद को संवेदनशील इंसान कहलाने का नैतिक अधिकार भी हमें नहीं होना चाहिए। विकास हो, जरूर हो, लेकिन हरियाली की कीमत पर नहीं।
पेड़ों को हटाने के विरोध में प्रतीकात्मक रक्षा सूत्र बांधे
कल एक बार फिर जनहित पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रीगल रानी सराय क्षेत्र में पेड़ों को हटाने के विरोध में प्रतीकात्मक रूप से उन्हें रक्षा सूत्र बांधे, साथ ही मौके पर मौजूद सभी पेड़ों की गिनती कर उन्हें अपने रजिस्टरों में दर्ज किया गया, ताकि कल को यह न कहा जा सके कि कि कुछ पेड़ ही तो थे।
कार्यकर्ताओं का साफ कहना था कि भोजन और पानी से भी अधिक जरूरी ऑक्सीजन है, सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, बल्कि धरती पर मौजूद हर जीव-जंतु के लिए। यदि ऑक्सीजन देने वाले हरे-भरे वृक्ष ही नहीं रहेंगे तो विकास के ये दावे किसके लिए होंगे? कांक्रीट की इमारतें क्या सांस देंगी? शहर के चारों ओर बने बायपास आज वीरान और सूने पड़े हैं।
वहां हरियाली का नामोनिशान नहीं बचा। शहर के भीतर हरियाली अब सिर्फ गमलों तक सिमटकर रह गई है। जो जीवंत, विशाल पेड़ अब भी बचे हैं उन्हें भी विकास के नाम पर काटा जा रहा है। सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियों को हम क्या सौंपकर जाएंगे।
कांक्रीट का जंगल या सांस लेने लायक शहर? जिन पेड़ों की छांव में पीढ़ियां पली-बढ़ीं, उनकी बलि देकर अगर विकास करना पड़े तो उस विकास पर सवाल उठना लाजिमी है। यह विरोध मेट्रो का नहीं, बल्कि संवेदनहीन सोच का है, जो हरियाली को सबसे बड़ी बाधा मान बैठी है।
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