मोहन मंत्रिमंडल से छह मंत्रियों की विदाई तय
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
मध्यप्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है, यदि मोहन मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है, तो किन-किन मंत्रियों की विदाई तय मानी जाए? चर्चाओं के बाजार में फिलहाल ‘एन-एन, आर-आर, पी और व्ही’ नाम से पहचाने जाने वाले छह मंत्रियों के नाम सबसे अधिक लिए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि इनकी कुर्सियों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। बताते हैं कि बीते दो वर्षों में इन मंत्रियों का कामकाज न तो कागजों में संतोषजनक रहा और न ही जमीन पर।
इसके अलावा इनकी कथनी और करनी ने पार्टी व सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचाया है। शिकायतों का यह पुलिंदा जब दिल्ली तक पहुंचा, तो हाईकमान ने भी इसे गंभीरता से लिया। ऊपर से स्पष्ट संकेत हैं कि जिनका प्रदर्शन कमजोर है और जिनके कारण सरकार व संगठन को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें हटाने में अब कोई संकोच नहीं किया जाएगा। फिलहाल सबकी निगाहें संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल पर टिकी हैं। अब देखना यह है कि ये चर्चाएं हकीकत का रूप लेती हैं या फिर कुछ कुर्सियां फिलहाल बचा ली जाती हैं।
नेताजी का सुझाव भाईसाब के ठेंगे पर!
राजधानी के सत्ता गलियारों में इन दिनों एक मुलाकात खासा चर्चा में है। इंदौर के एक मौजूदा बड़े नेता हाल ही में भोपाल पहुंचे और संगठन के शीर्ष पदाधिकारी भाईसाब से भेंट की। बातचीत के दौरान नेताजी ने संगठनात्मक मजबूती का हवाला देते हुए एक व्यावहारिक सुझाव रखा-प्रदेश के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को भोपाल बुलाकर एक दिन का सम्मेलन और सामूहिक भोज आयोजित किया जाए।
मकसद साफ था- अनुभव को सम्मान, वरिष्ठता को स्थान और कार्यकर्ताओं को सकारात्मक संदेश। सुझाव में दम भी था और नीयत भी साफ। लेकिन पदाधिकारी भाईसाब की प्रतिक्रिया ने पूरी कहानी का एंगल बदल दिया। न खुली सहमति, न सीधा इंकार-बस एक मुस्कान और गोलमोल जवाब, ‘यह आगे बढ़ने का समय है, पुरानी बातों के जिक्र का अब औचित्य नहीं।’ नारदजी कहते हैं कि क्या गजब सीन है, कल तक जो चेहरे संगठन की पहचान थे, आज उन्हीं चेहरों से दूरी बनाई जा रही है...!
मंत्रीजी कैबिनेट से ‘गोल’ क्यों हैं?
मप्र सरकार के एक मंत्रीजी इन दिनों सत्ता गलियारों में अलग ही वजहों से चर्चा का विषय बने हुए हैं। बताया जा रहा है कि मंत्रीजी पिछले कई महीनों से सरकारी प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करते हुए मंत्रिमंडलीय बैठकों से लगातार गैरहाजिर चल रहे हैं। मामला केवल बैठकों में गैरहाजिरी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपी मजबूरी भी अब चर्चाओं में है।
कहा जा रहा है कि अपने ही विभाग में मंत्रीजी की पकड़ कमजोर होती जा रही है। हालात यह हैं कि विभागीय अधिकारी उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि मंत्रीजी न केवल दूसरों के काम, बल्कि अपने खुद के विभाग से जुड़े काम भी प्रभावी ढंग से नहीं करा पा रहे हैं।
नारदजी बताते हैं कि अलीराजपुर जिले से आने वाले ये मंत्रीजी वर्ष 2024 में अपने तीखे तेवरों के कारण सरकार को असहज कर चुके हैं। लेकिन अब कैबिनेट बैठकों में उनकी लगातार गैरमौजूदगी नई चर्चाओं को जन्म दे रही है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मंत्रीजी कैबिनेट से ‘गोल’ क्यों हैं? यह उनकी कोई सोची समझी रणनीति है या बदले हुए हालात की मजबूरी?
वर्दी उतरी, तो साहब बने ज्योतिषाचार्य
प्रदेश के एक रिटायर्ड आईपीएस साहब, जिनका कभी पुलिस महकमे में खासा रौब-रुतबा हुआ करता था, इन दिनों बिल्कुल नए अवतार में नजर आ रहे हैं। वर्दी उतरी तो साहब ने खाकी की जगह कुंडली संभाल ली। जी हां, रिटायर्ड होते ही साहब बाकायदा ज्योतिषाचार्य बन बैठे हैं।
बताते हैं कि साहब ने इस काम को शौकिया नहीं, बल्कि पूरी गंभीरता से अपनाया है। बाकायदा एक ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र भी खोल लिया गया है, जहां ग्रह-नक्षत्र से पीड़ित व्यक्ति अपाइंटमेंट लेकर साहब के दरबार में हाजिरी लगा सकता है। यहां कुंडली दिखाई जाती है, ग्रह-दशा बताई जाती है और साथ ही यह भी समझाया जाता है कि किस ग्रह ने कब और कैसे परेशान कर रखा है, और उससे मुक्ति का उपाय क्या हो सकता है।
नारदजी कहते हैं कि, रिटायरमेंट के बाद यूं ही घर बैठने से तो बेहतर है, लोगों का भूत-भविष्य ही वाच लिया जाए। आखिर साहब को जांच-पड़ताल और भविष्य भांपने का तजुर्बा तो पहले से ही रहा है..!
सार्वजनिक बेइज्जती से नेताजी परेशान
मामाजी के गढ़ विदिशा में राजनीतिक उड़ान भर रहे एक नेताजी हाल ही में हुई सार्वजनिक बेइज्जती से खासे आहत बताए जा रहे हैं। मौका था सांसद खेल महोत्सव के समापन समारोह का, जिसमें मामाजी भी मौजूद थे। नेताजी मंच पर मामाजी के साथ बैठने के इच्छुक थे, लेकिन उनके धुर विरोधी स्थानीय विधायक ने चुपचाप आयोजकों को इशारा कर दिया कि नेताजी को मंच तक न आने दिया जाए। इस घटनाक्रम के बाद नेताजी इतने असहज हो गए कि हालात ‘काटो तो खून नहीं’ जैसे हो गए।
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