क्या भारत में बढ़ते प्रदूषण का कारण हमारा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार है?
Khulasa First
संवाददाता

डॉ. मनमोहन प्रकाश स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पर्यावरण प्रदूषण आज मानवता के समक्ष सर्वाधिक भयावह चुनौतियों में से एक और इसका प्रमुख कारण है मानव जनित प्रदूषण।भारत में प्रदूषण की समस्या अक्सर उद्योगों, वाहनों, बढ़ते शहरी विस्तार और सरकारी तंत्र की कमियों से जोड़ी जाती है, परंतु सच्चाई यह है कि प्रदूषण को बढ़ाने में नागरिकों के गैरजिम्मेदाराना कृत्य भी बड़े और निर्णायक कारक हैं।
एक आंकड़े के अनुसार वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 76 प्रतिशत उर्जा उत्पादन और उपभोग से जुड़ा हुआ है,जो मानव की असंयत ऊर्जा खपत की प्रवृत्ति को दर्शाता है। वास्तव में देखा जाए तो पर्यावरण संकट किसी एक संस्था, नीति या व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सामूहिक व्यवहार की गलत दिशा का प्रतिफल है। हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियाँं मिलकर एक बड़े राष्ट्रीय संकट में बदल जाती हैं।
सबसे सामान्य और हानिकारक व्यवहार है कचरे को अनियमित रूप से इधर- उधर फेंकने की प्रवृत्ति। अधिकांश शहरों में सड़कें, ग्रीन बेल्ट, सार्वजनिक स्थल, नाले, नदी, तालाब किनारे आदि सभी जगह घर, दुकान, फैक्टरी आदि से निकले कचरा का ढेर दिखना इस बात का प्रमाण है कि हमने स्वच्छता को आदत नहीं, केवल अवसर भर समझा है। कई लोग कचरे को खुले में जला देते हैं, जिससे उसके जहरीले तत्व वायु में फैलकर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुँचाते हैं। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद इसका निरंतर उपयोग नागरिक जिम्मेदारी की कमी को दर्शाता है।
वाहनों का अनियंत्रित उपयोग, साझा न करने की प्रवृत्ति तथा पब्लिक ट्रांसपोर्ट को कम महत्व देने की सोच ने भी प्रदूषण बढ़ाने का काम किया है। छोटी दूरी पर भी निजी वाहन का उपयोग, समय पर प्रदूषण जांच न कराना, सर्विसिंग की अनदेखी करना और पुराने धुआँ छोड़ने वाले वाहनों का उपयोग तथा ई-वाहनों को कम महत्व देने का ही परिणाम है अवांछित कार्बन उत्सर्जन।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कचरा, पराली और पत्ते जलाने की परंपरा अब भी जारी है, जिससे पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण तेजी से वातावरण में फैलते हैं। जल प्रदूषण के लिए भी नागरिकों के कई आचरण सीधे जिम्मेदार हैं। नदियों और तालाबों में मूर्तियाँ, फूल, कपड़े और घरेलू कचरा विसर्जित करना, धार्मिक आस्था के नाम पर जलस्रोतों को कचरा-घर बनाना पर्यावरणीय संवेदनहीनता का प्रतीक है। घरों, दुकानों, उद्योगों का बिना उपचार का गंदा जल नदी,तलाब, नालों आदि में छोड़ देना अंततः जलस्रोतों को विषैला बना देता है।
ध्वनि प्रदूषण के मामले में भी नागरिकों की मनमानी किसी से छिपी नहीं है। तीव्र ध्वनि वाले डीजे, विविध अवसरों पर पटाखों का अत्यधिक उपयोग, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में लाउडस्पीकरों की ऊंची आवाज, वाहनों में अनावश्यक हॉर्न आदि का उपयोग शोर का ऐसा वातावरण बनाते हैं जो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
कई लोग देर रात तक ध्वनि स्तर के नियमों की खुली अवहेलना भी करते हैं। ऊर्जा और संसाधनों के दुरुपयोग में भी हमारा व्यवहार जिम्मेदार है। एसी और बिजली का अनावश्यक प्रयोग, पानी को बिना कारण बहने देना, बोरवेल का अत्यधिक दोहन और वर्षाजल-संग्रह को नजरअंदाज करना आदि भी संसाधनों पर दबाव बढ़ाते हैं। इसके साथ पेड़ों की कटाई, हरित-आवरण की अनदेखी और रोपित वृक्षों के संरक्षण में रुचि की कमी भी कहीं न कहीं प्रदूषण को और बढ़ाती है।
ऑन लाइन वस्तुओं को मंगाने की बढ़ती प्रवृत्ति,त्योहारों के दौरान प्लास्टिक सजावट, रासायनिक रंगों और पटाखों का अत्यधिक उपयोग यह दर्शाता है कि हम उत्सवों में स्वस्थ पर्यावरण को शामिल करना अब भी नहीं सीख पाए हैं। सत्य यही है कि प्रदूषण केवल सरकारी असफलता का परिणाम नहीं, बल्कि हमारे गैरजिम्मेदाराना आचरण का दर्पण भी है।
स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ बनाना और अपशिष्ट प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था करना, जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए नागरिकों को प्रेरित करना भी उसके प्रमुख दायित्व में से एक हैं। इतना ही नहीं पेड़-पौधों के संवर्धन- संरक्षण,जल स्रोतों की नियमित साफ-सफाई और शहरी हरियाली बढ़ाने जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सरकारें प्रदूषण नियंत्रण को प्रभावी बना सकती है, बशर्ते बनाना चाहें।
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