नेहरू की चर्चा के बहाने भाजपा कहीं राहुल वाली गलती तो नहीं दोहरा रही?
Khulasa First
संवाददाता

श्याम यादव वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जब से भाजपा केंद्र की सत्ता में आई, उसके राजनीतिक विमर्श में कांग्रेस से अधिक राहुल गांधी का उल्लेख प्रमुख रहा है। लगभग एक दशक तक भाजपा ने यह मान लिया था कि उनके राजनीतिक कथानक का सबसे सुविधाजनक केंद्र राहुल गांधी ही हैं-उनकी आलोचना, उनके बयान और उनकी राजनीतिक शैली।
यह रणनीति भाजपा के लिए शुरू में कारगर रही, लेकिन समय के साथ एक दिलचस्प उलटफेर हुआ। जितनी आलोचना बढ़ी, उतनी ही राहुल गांधी की दृश्यता भी बढ़ती गई। वे संसद में विपक्ष के नेता के रूप में अपनी जगह बना सके और आज वे एक स्थापित राजनीतिक स्वर हैं। यह घटना राजनीतिक संचार का एक क्लासिक उदाहरण है कि किसी नाम का अधिकतम पुनरावृत्ति उसे अनिवार्य रूप से सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बना देती है।
अब यही प्रवृत्ति एक नई दिशा में दिखाई दे रही है- पंडित जवाहरलाल नेहरू की ओर। भाजपा नेहरू को संसद, सार्वजनिक मंचों, चुनावी भाषणों, पार्टी साहित्य और मीडिया टिप्पणी में लगातार दोहराती आ रही है। आलोचना के इरादे से उठाए गए ये संदर्भ एक अप्रत्याशित परिणाम दे रहे हैं- नेहरू आज के राजनीतिक विमर्श का स्थायी विषय बन गए हैं।
भले वे वर्तमान राजनीति में मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका नाम राष्ट्रीय बहसों में उतनी ही सक्रियता से घूम रहा है, जितना किसी समकालीन नेता का। प्रश्न यह है कि क्या भाजपा कहीं वही गलती दोहरा रही है, जो उसने राहुल गांधी के मामले में अनजाने में कर दी थी?
देश की जो पीढ़ी आज 60–65 वर्ष की है, उसने भी नेहरू को प्रत्यक्ष रूप से बहुत सीमित रूप में देखा होगा। उससे छोटी उम्र की पीढ़ियाँ नेहरू को केवल इतिहास के अध्यायों, किताबों और फिल्मों में जानती थीं। लेकिन आश्चर्य यह है कि आज 18 से 30 वर्ष का युवा वर्ग नेहरू में नई रुचि दिखा रहा है।
इंटरनेट पर नेहरू से संबंधित सामग्री की खोज बढ़ी है। सोशल मीडिया पर उनके भाषणों, उनकी विदेश यात्राओं और संस्थागत निर्माण की क्लिप फिर से घूमने लगी हैं। एक प्रश्न युवा मन में उठ रहा है- नेहरू कौन थे, और क्यों आज भी उनकी राजनीति में इतनी चर्चा है?
यह रुचि भाजपा की रणनीति के अनपेक्षित परिणामों में से एक है। भाजपा की आलोचना अक्सर नेहरू को कई वर्तमान समस्याओं का आधार बताती है। यह आलोचना लंबे समय से भाजपा के वैचारिक विमर्श का हिस्सा रही है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इतिहास पर जितना जोर होगा, लोग उतना अधिक इतिहास को स्वयं पढ़ने की कोशिश करेंगे। और जब कोई व्यक्ति स्वयं पढ़ना शुरू करता है, तब निष्कर्ष हमेशा आलोचना के अनुरूप हों, ऐसा जरूरी नहीं होता।
पंडित नेहरू भारतीय राज्य की आधारभूत संरचना के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे। आधुनिक संस्थाएं- आईआईटी, आईआईएम, इसरो, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, राष्ट्रीय संग्रहालय, वैज्ञानिक अनुसंधान प्रयोगशालाएं- इनका आरंभ या आधार नेहरू काल में पड़ा।
आलोचना केवल नीतियों के चयन पर हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक छतरी नेहरू के दौर में ही खड़ी हुई। भाजपा अक्सर यह बताती है कि नेहरू काल की नीतियों ने आज कई समस्याओं की नींव रखी।
मगर इतिहास की राजनीति का एक अपना स्वभाव होता है—किसी नाम का अधिक उल्लेख उसे समय के पार भी प्रासंगिक बनाए रखता है।
राहुल गांधी का उदाहरण अभी ताज़ा है। भाजपा ने उन्हें निशाने पर इसलिए रखा कि वह उन्हें कमजोर बताना चाहती थी, लेकिन वर्षों की आलोचना ने उन्हें राष्ट्रीय मंच पर एक मजबूत राजनीतिक पहचान दे दी। राजनीतिक संचार की भाषा में इसे ओवर-एक्सपोज़र इफेक्ट कहा जाता है- जो जितना दोहराया जाए, वह उतना ही याद किया जाता है। नेहरू के संदर्भ में भी यही स्थिति विकसित होती दिख रही है।
भाजपा के लिए यह स्थिति मिश्रित प्रभाव वाली है। कुछ लाभ स्पष्ट हैं। पहला लाभ यह कि भाजपा अपने समर्थकों के बीच यह रेखांकित कर सकती है कि वह कांग्रेस से बिल्कुल अलग विचारधारा रखती है। दूसरा लाभ यह कि वर्तमान समस्याओं के विश्लेषण में नेहरू को संदर्भित करने से भाजपा के कथन में एक ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।
यह उन्हें यह कहने का अवसर देता है कि वे व्यवस्था में सुधार ला रहे हैं, जो कई दशक पुरानी गड़बड़ियों की देन है। तीसरा लाभ यह कि अतीत बनाम वर्तमान का विमर्श भाजपा को खुद को परिवर्तनकारी पार्टी के रूप में स्थापित करने का मंच देता है।
लेकिन इस रणनीति की अपनी स्पष्ट हानियां भी हैं।
सबसे पहली हानि यह कि बार-बार चर्चा में आने वाला कोई भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व पुनः स्थापित होने लगता है- चाहे आलोचना ही क्यों न हो। आलोचना भी स्मृति में जगह बनाती है। इससे कांग्रेस को एक बड़ा ऐतिहासिक आधार मिलने लगता है, जिसके सहारे वह नेहरू की संस्थागत उपलब्धियाँ गिनाकर भाजपा की आलोचना के जवाब तैयार कर सकती है।
दूसरा जोखिम यह कि जनता में यह भावना विकसित हो सकती है कि सरकार वर्तमान समस्याओं पर प्रत्यक्ष उत्तर देने से बच रही है और लगातार इतिहास पर बोझ डाल रही है। यह भावना सरकार के प्रति विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
तीसरा जोखिम युवा वर्ग से जुड़ा है। युवा जब सुनते हैं कि किसी नेता को लगातार दोषी ठहराया जा रहा है, तो वे सामान्यत: उस नेता के बारे में खुद पढ़ने लगते हैं। पढ़ने की यह प्रक्रिया उन्हें आलोचना से हटकर नयी समझ की ओर ले जाती है। कई बार इसका निष्कर्ष नेहरू की सकारात्मक छवि को आगे ला सकता है- खासतौर पर तब, जब इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री उनके संस्थागत योगदान की विस्तृत जानकारी देती है।
चौथी हानि यह कि अतीत-केन्द्रित राजनीति वर्तमान समस्याओं को चर्चा से बाहर धकेल देती है- चाहे वह महंगाई हो, नौकरियां हों या कृषि संकट। जब चर्चाओं का केंद्र इतिहास बनता है, तो नीति संवाद का वास्तविक स्वरूप कमजोर होता है। इससे यह धारणा बन सकती है कि सरकार वर्तमान चुनौतियों पर पर्याप्त रूप से केंद्रित नहीं है।
राजनीतिक विज्ञान के अध्येताओं का मानना है कि इतिहास का अत्यधिक उपयोग अक्सर वर्तमान राजनीतिक कमजोरी को ढंकने की कोशिश माना जाता है। यदि यह धारणा जनता में मजबूत होती है, तो यह सरकार की छवि पर असर डाल सकती है। राहुल गांधी के उदाहरण ने यह पहले ही साबित किया है कि विरोध हमेशा कमजोर नहीं करता- कभी-कभी वह अनजाने में व्यक्तित्व को मजबूत बनाने का माध्यम बन जाता है।
नेहरू के बढ़ते उल्लेख के साथ भी यही संभावना बन रही है। भाजपा का आलोचनात्मक नैरेटिव अपने समर्थकों के बीच तो सक्रिय रहता है, लेकिन उसी प्रक्रिया में नेहरू की विरासत की पुनर्पाठ की भी जमीन तैयार होती है। यह पुनर्पाठ भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि राजनीति में इतिहास का पुनर्मूल्यांकन अक्सर अप्रत्याशित निष्कर्ष देता है।
आने वाला समय तय करेगा कि नेहरू का बढ़ता उल्लेख भाजपा के लिए एक रणनीतिक लाभ सिद्ध होगा या वह वही गलती दोहराएगी जिसे वह राहुल गांधी के मामले में अनजाने में कर बैठी थी। राजनीति के लंबे खेल में कभी-कभी विरोधी को कमजोर करने की मंशा स्वयं विरोधी को मजबूत कर देती है। नेहरू की चर्चा का वर्तमान उभार उसी लंबे खेल की एक दिलचस्प कड़ी बनता जा रहा है।
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