आईपीएस साहब: अपनी वाह-वाही के चक्कर में पूरे विभाग को; कटघरे में खड़ा कर दिया
KHULASA FIRST
संवाददाता

फर्जी ड्रग्स कांड में डीजीपी के हाथों सम्मानित होना ही था मकसद?
क्या अब इनाम और प्रशस्ति-पत्र वापस लेंगे DGP?
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आईपीएस विनोद मीणा और करणदीप ने बीते कुछ दिनों में ऐसा माहौल बना दिया था कि उनकी तथाकथित ‘कार्रवाइयों की गूंज’ सीधे भोपाल पुलिस मुख्यालय तक पहुंचने लगी। दोनों अधिकारी अपने अधीनस्थ स्टाफ से यह कहने में भी नहीं हिचकते थे कि ‘मेरे काम की आवाज भोपाल तक जाती है’, और इसे साबित करने की होड़ में उन्होंने पूरी व्यवस्था को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा किया।
हकीकत यह है कि दोनों अधिकारियों के कार्यकाल में एनडीपीएस एक्ट के मामलों की संख्या तो नहीं बढ़ी, लेकिन सिर्फ एमडी ड्रग्स की बरामदगी को ही बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर दावा किया गया कि उनका सुरक्षा तंत्र इतना मजबूत है कि शहर के सभी ड्रग्स पैडलरों की जानकारी सीधे उन्हीं तक पहुंच रही है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन-सा अलादीन का चिराग दोनों आईपीएस अधिकारियों को मिल गया था, जिससे महज कुछ ही दिनों में एक के बाद एक एमडी ड्रग्स के मामले सामने आने लगे। पहला प्रकरण 27 फरवरी 2025 को दर्ज हुआ, जिसमें 198 ग्राम एमडी पकड़ने का दावा किया गया।
इसके बाद 7 मार्च को 50 ग्राम एमडी, फिर 24 मार्च को 8 ग्राम एमडी की बरामदगी दर्शाई गई। इन कार्रवाइयों की गूंज भोपाल तक पहुंची और डीजीपी ने इसे बड़ी सफलता मानते हुए प्रशस्ति-पत्र जारी कर दिया। इतना ही नहीं, डीजीपी द्वारा इस कार्रवाई के लिए इनाम राशि भी स्वीकृत की गई।
सूत्रों के अनुसार जिन पुलिसकर्मियों ने वास्तव में मौके पर काम किया, फील्ड में जोखिम उठाया और कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाया, वे इस सम्मान और इनाम से वंचित रह गए। इसके उलट इनाम की राशि उन जवानों को दी गई, जो या तो इस कार्रवाई में शामिल ही नहीं थे या फिर अधिकारियों के ‘खास’ और ‘मुंह लगे’ बताए जा रहे हैं।
अब सवाल यह नहीं कि कितनी एमडी पकड़ी गई, बल्कि सवाल यह है कि क्या महज वाह-वाही और प्रशस्ति-पत्र हासिल करने के लिए पूरे पुलिस विभाग की साख को दांव पर लगा दिया गया? यह भी कि डीजीपी को जो तस्वीर दिखाई गई, वह जमीनी हकीकत से मेल खाती भी है या नहीं?
जिन्होंने वास्तव में मौके पर कार्रवाई की उनका इनाम की सूची में नाम तक नहीं
इस पूरे प्रकरण में 26 मार्च 2025 को डीजीपी द्वारा आईपीएस करणदीप सिंह को प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया था। यह डीजीपी के पत्र क्रमांक C-97 के तहत जारी हुआ, जिसमें 15 फरवरी से 24 मार्च के बीच दो थानों में दर्ज चार प्रकरणों का उल्लेख किया गया।
इन प्रकरणों में एनडीपीएस एक्ट के तहत 12 अलग-अलग मादक पदार्थों की तस्करी, जिनकी कुल कीमत 3 करोड़ 9 लाख रुपए दर्शाई गई। यदि केवल एमडी के तीन प्रमुख प्रकरणों पर नजर डालें, तो कुछ और ही कहानी सामने आती है। इन मामलों में क्रमशः 198 ग्राम, 50 ग्राम और 8 ग्राम, कुल 256 ग्राम एमडी की एफआईआर दर्ज की गई।
यदि 1 ग्राम एमडी की कीमत 10 हजार रुपए भी मानी जाए, तो इसकी कुल कीमत 25-26 लाख से अधिक नहीं होती। 50 लाख भी मानें तो 3 करोड़ कैसे हो गई इसकी कीमत! इसके बावजूद डीसीपी विनोद मीणा द्वारा भेजी गई अनुशंसा के आधार पर उनके साथी आईपीएस करणदीप सिंह को प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर दिया गया। चौंकाने वाली बात यह कि जिन पुलिसकर्मियों ने वास्तव में मौके पर जाकर कार्रवाई की, उनका नाम तक इनाम की सूची में शामिल नहीं किया गया।
आरोपी से कहते रहे ‘कुछ बड़ा करवा दे’
आरोप है कि डीसीपी ने तेजाजी नगर थाने के एक जवान को बंद कमरे में बुलाकर आरोपी शाहरुख के सामने पेश किया और उससे ड्रग्स इलाके में बिकवाने की बात कहलवाई। इसके बाद उसी जवान लखन को आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसा दिखाया मानों विभाग में ‘सफाई अभियान’ चलाया जा रहा हो।
कई जवान लाइन अटैच किए तो कई के तबादले कर दिए गए। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि यह कार्रवाई सिर्फ चुनिंदा लोगों तक सीमित रही, जबकि अधिकारियों के खास जवान राजू और संजय पूरी तरह से अछूते बने रहे। जानकारी के अनुसार इन्हीं खास जवानों के कहने पर कोर्ट के एक मुंशी को निशाना बना दिया गया।
कोर्ट मुंशी की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने एक वारंट की तामील को लेकर अधिकारियों के खास जवान से बहस कर ली थी। यही बात आईपीएस साहब को इतनी नागवार गुजरी कि उसे विभागीय दंड देने के बजाय सीधे जेल भिजवा दिया गया। अब सवाल यह है कि क्या कोई ड्रग्स पैडलर हर महीने 35 हजार रुपए एक कोर्ट मुंशी को देगा? आरोप यह भी है कि त्वरित उपलब्धि दिखाने के चक्कर में ड्रग्स केस दर्ज करने की ऐसी जल्दबाजी दिखाई कि ड्रग्स खरीदी, लेकिन वह एमडी यूरिया साबित हुई।
आजाद नगर और तेजाजी नगर के एमडी प्रकरणों की दोबारा होगी जांच?
जब 198 ग्राम एमडी की बरामदगी के बाद दो अलग-अलग लैब रिपोर्ट में उसे यूरिया बताया गया, तब आरोपी खुलेआम पुलिस को चुनौती दे रहे थे। यही वजह रही कि पूरा खेल सामने आ गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या आजाद नगर और तेजाजी नगर में पकड़ी गई बाकी एमडी की भी निष्पक्ष जांच होगी? यदि ऐसा हुआ, तो संभव है कि उस ‘जादुई चिराग’ की असलियत भी सामने आ जाए, जिसके सहारे एक के बाद एक एनडीपीएस कार्रवाई की गई।
क्या अन्य कार्रवाइयों की भी होगी जांच?
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि क्या सिर्फ यही एक मामला संदिग्ध था? आईपीएस करणदीप सिंह और विनोद मीणा के कार्यकाल में एनडीपीएस एक्ट के तहत हुई अन्य कार्रवाइयों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो कई ‘जिन्न’ इस बोतल से बाहर आ सकते हैं।
अगले अंक में पढ़िए...
तुम्हारा टीआई तो दिनभर नमाज पढ़ता रहता है…’
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