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लेन-देन वाली दुनिया में मजबूती से बढ़ा भारत

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संवाददाता

15 फ़रवरी 2026, 6:42 pm
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लेन-देन वाली दुनिया में मजबूती से बढ़ा भारत

गौरव वल्लभ आर्थिक सलाहकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बीती 2 फरवरी को घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौता इस बात को दर्शाता है कि अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में आर्थिक संबंधों पर बातचीत का तरीका कैसे बदल रहा है। आज व्यापार केवल शुल्क-सूचियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि
तुलनात्मक बाजार पहुंच और रणनीतिक विश्वास से जुड़ा हुआ है। इस संदर्भ में नई दिल्ली द्वारा हासिल किया गया नतीजा अमेरिका के साथ भारत की आर्थिक सौदेबाजी की क्षमता में एक संतुलित, मगर ठोस मजबूती दिखाता है।

बी ती 2 फरवरी को घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौता इस बात को दर्शाता है कि अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में आर्थिक संबंधों पर बातचीत का तरीका कैसे बदल रहा है। आज व्यापार केवल शुल्क-सूचियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तुलनात्मक बाजार पहुंच और रणनीतिक विश्वास से जुड़ा हुआ है। इस संदर्भ में नई दिल्ली द्वारा हासिल किया गया नतीजा अमेरिका के साथ भारत की आर्थिक सौदेबाजी की क्षमता में एक संतुलित, मगर ठोस मजबूती दिखाता है।

इस समझौते का सबसे अहम पहलू अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात पर शुल्क को 18 प्रतिशत पुन: निर्धारित करना है। यह पहले लगाई गई 50 प्रतिशत दर की तुलना में काफी कम है और एशियाई निर्यातकों के बीच भारत को अपेक्षाकृत अनुकूल स्थिति में रखता है।

व्यावहारिक तौर पर इसका अर्थ यह है कि भारतीय वस्तुएं अब अमेरिकी बाजार में वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्द्धी देशों से कम शुल्क पर प्रवेश करेंगी। पिछले कुछ महीनों में रुपये के अवमूल्यन के साथ मिलकर यह स्थिति भारत की निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को वास्तविक बढ़त दे सकती है।

गौरतलब है, अमेरिका द्वारा सहयोगी देशों में भारत पर सबसे कम टैरिफ में से एक लगाया जाना हमारे प्रति उसके आर्थिक भरोसे को दशार्ता है। विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के लिए यह एक बड़ा अवसर सिद्ध हो सकता है। कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए भी यह समझौता नए निवेश और व्यापार के विस्तार के द्वार खोलता दिख रहा है।

अमेरिका अब भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा आयात करता है, जो इस दशक की शुरूआत में लगभग 15 प्रतिशत था। पिछले वर्ष शुल्क को लेकर अनिश्चितता के दौर में भी भारत का अमेरिका में निर्यात बढ़ता रहा और वित्त-वर्ष 25-26 के पहले नौ महीनों में यह लगभग 65 अरब डॉलर को पार कर गया।

यह वृद्धि उस अवधि में भी हुई, जब कुछ समय के लिए शुल्क काफी अधिक थे, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय वस्तुओं की मांग संरचनात्मक रूप से मजबूत बनी हुई है। इसलिए यह समझौता किसी नए मोड़ को पैदा करने के बजाय एक मौजूदा प्रवृत्ति को सुदृढ़ करता है।

अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में इंजीनियरिंग वस्तुएं, रसायन, वस्त्र, चमड़े के उत्पाद, समुद्री उत्पाद व रत्न-आभूषण बड़ा हिस्सा रहे हैं। ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी शुल्क औसत से अधिक रहे हैं, विशेषकर वस्त्र, परिधान और फुटवियर में।

शुल्क अंतर में कुछ प्रतिशत की भी कमी, विशेषकर कम मार्जिन पर काम करने वाले निर्यातकों के लिए ‘लैंडेड कॉस्ट प्रतिस्पर्द्धा’ को काफी बेहतर बनाती है। समझौते की घोषणा के बाद रुपया थोड़ा मजबूत हुआ और डॉलर के मुकाबले एक रुपये से अधिक की रिकवरी के साथ लगभग 90 के स्तर पर आ गया। यह इस समझ को दशार्ता है कि यह समझौता कोई नई संवेदनशीलता नहीं पैदा करता, बल्कि मजबूत निर्यात प्रदर्शन के जरिये उन्हें कुछ हद तक कम कर सकता है।

ऊर्जा से जुड़े पहलू इस सौदे की पृष्ठभूमि में शांत रूप से मौजूद हैं। साल 2022 के बाद से भारत ने अपने कच्चे तेल आयात के स्रोतों को पुनर्गठित किया है, जिसमें रूस की हिस्सेदारी नगण्य स्तर से बढ़कर अपने चरम पर एक-तिहाई से अधिक हो गई।

रियायती कीमतों से प्रेरित इस बदलाव ने उस समय भारत को वैश्विक ऊर्जा महंगाई से बचाने में मदद की, जब तेल की कीमतें ऊंची थीं। साथ ही, भारत ने आपूर्ति का विविधीकरण जारी रखा है और पश्चिम एशिया, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका व लैटिन अमेरिका सहित लगभग 40 देशों से कच्चा तेल मंगाया है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी कच्चे तेल की हिस्सेदारी पांच साल पहले की तुलना में अब काफी अधिक है।

आयात पक्ष पर दिखाई देने वाला संयम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अधिक संरक्षण मुख्यत: खाद्य उत्पादों, पशु उत्पादों व फुटवियर तक सीमित है, जो अमेरिका से होने वाले आयात का नगण्य हिस्सा हैं। इसके विपरीत, अमेरिकी शुल्क ऐतिहासिक रूप से उन्हीं श्रेणियों में अधिक रहे हैं, जहां भारत बड़े पैमाने पर निर्यात करता है।

इस प्रकार मौजूदा वार्ता का परिणाम ऐसी विषमता को दशार्ता है, जो घरेलू व्यवधान पैदा किए बिना भारत के पक्ष में काम करती है। कृषि और डेयरी क्षेत्र सुरक्षित रखे गए हैं, जो भारत के विशाल उत्पादन आधार के अनुरूप है। 2010 के दशक के मध्य से दूध उत्पादन में 35 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है और यह सालाना 200 मिलियन टन को पार कर चुका है, जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बन गया है।

ऐसे क्षेत्रों में उदारीकरण की आर्थिक व राजनीतिक कीमत अनुपातहीन रूप से अधिक होती है, यह समझौता उन सीमाओं को परखने से बचता है।

यह समझौता आने वाले वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर तक की खरीद बढ़ाने के भारत के घोषित इरादे से भी जुड़ा है, जिसमें ऊर्जा, रक्षा, नागरिक उड्डयन और उच्च-मूल्य विनिर्माण शामिल हैं। यह आंकड़ा संकेतात्मक है, बाध्यकारी नहीं, पर अमेरिका से मौजूदा वार्षिक आयात (लगभग 45-50 अरब डॉलर) की तुलना में काफी महत्वपूर्ण है।

धीरे-धीरे यह विस्तार व्यापारिक संबंधों को गहराई से मजबूत करेगा, विशेषकर पूंजी व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरंतर मांग के माध्यम से बाजार पहुंच को सहारा देने की इच्छा का संकेत देगा।

समग्र रूप से देखें, तो यह समझौता दिखाता है कि भारत एक अधिक लेन-देन आधारित वैश्विक व्यापार वातावरण में कैसे आगे बढ़ रहा है। जिसका सबसे अधिक महत्व है, वहां निर्यात पहुंच में सुधार हुआ है, ऊर्जा लचीलापन बना हुआ है व संवेदनशील घरेलू क्षेत्र संरक्षित हैं।

ऐसे समय में, जब व्यापार परिणाम औपचारिक नियमों से अधिक सौदेबाजी की क्षमता और रणनीतिक प्रासंगिकता से तय हो रहे हैं, भारत ने ऐसा समझौता हासिल किया है, जो उसकी स्थिति को मजबूत करता है। (लेखक प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं) (यह लेखक के निजी विचार है।)

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