बीमा और फाइनेंस कंपनियों की शह पर अवैध पंजीयन: स्लीपर कोच बसों का काला खेल
KHULASA FIRST
संवाददाता

कंपनियों ने खोला अवैध स्लीपर बसों का रास्ता
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर सहित प्रदेशभर में स्लीपर कोच बसों का अवैध संचालन लगातार जानलेवा साबित हो रहा है। बसों के अंदर नियम विरुद्ध तीन फीट अतिरिक्त लंबाई बढ़ाकर बनाए गए शयनयान ढांचे न केवल कानून का उल्लंघन, बल्कि यात्रियों की जान के साथ खुला खिलवाड़ भी हैं।
सवाल यह है कि जब ये बसें अवैध हैं, तो फिर उनका बीमा, फाइनेंस और पंजीयन कैसे हो रहा है? इस पूरे तंत्र में परिवहन विभाग के साथ बीमा और फाइनेंस कंपनियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बीमा कंपनियां और फाइनेंस संस्थाएं अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभातीं, तो देश-प्रदेश में स्लीपर कोच बसों का इतना व्यापक और अनियंत्रित प्रसार संभव ही नहीं होता।
नियमों के अनुसार किसी भी वाहन में संरचनात्मक बदलाव अवैध है। इसके बावजूद स्लीपर बसों में अंदर से लंबाई और डिजाइन बदले जाते हैं, जिसे नजरअंदाज कर बीमा और फाइनेंस उपलब्ध कराया जा रहा है।
अब तक स्लीपर कोच बसों से जुड़ी दुर्घटनाओं में अनेक यात्रियों की जान जा चुकी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन मृतकों के परिजन को बीमा कंपनियों से समुचित मुआवजा मिला? उपलब्ध जानकारी के अनुसार अधिकतर मामलों में मुआवजा केवल सरकार द्वारा दिया गया, जबकि बीमा कंपनियों द्वारा भुगतान की कोई ठोस मिसाल सामने नहीं आई। इससे बीमा दावों की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
संभाग स्तर पर जवाबदेही तय क्यों नहीं?
नियमों के अनुसार ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के आदेशों के पालन की जिम्मेदारी संभागीय और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों की होती है। सवाल यह है कि आदेशों के बाद कितनी कार्रवाई हुई, कितनी स्लीपर बसें जब्त या बंद की गईं, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड क्यों नहीं है?
नुकसान में सिर्फ यात्री
इस पूरे खेल में फाइनेंस कंपनी ब्याज वसूल लेती है, बीमा कंपनी प्रीमियम कमा लेती है, बस मालिक यात्रियों से अधिक किराया वसूलता है, लेकिन दुर्घटना होने पर आम यात्री अपनी जान गंवाता है या अधूरा मुआवजा पाता है।
बस बीमा और फाइनेंस की हकीकत
स्लीपर कोच बसों के लिए वाणिज्यिक वाहन बीमा अनिवार्य है, जिसमें थर्ड पार्टी और कॉम्प्रिहेंसिव कवर शामिल होता है। वहीं फाइनेंस कंपनियां बस की कीमत, डाउन पेमेंट और ब्याज दर के आधार पर ईएमआई तय करती हैं। कागजों में यह प्रक्रिया वैध दिखती है, लेकिन अवैध संरचना वाली बसों पर इसका लागू होना पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
विशेषज्ञ की राय
राज्य परिवहन विधिक विशेषज्ञ अधिवक्ता सूरजप्रकाश अग्रवाल (नर्मदापुरम) ने कहा बीमा कंपनी और फाइनेंस कंपनी के सहयोग से ही शयनयान बसों का पंजीयन सुगम हुआ है। अधिक प्रीमियम और ऋण के लालच में वैधानिक जांच को नजरअंदाज किया गया, जिससे परिवहन विभाग ने भी इन्हें नियमों के अनुरूप मान लिया। इसका खामियाजा आम जनता को अधिक किराया देकर और दुर्घटनाओं में पूर्ण मुआवजा न मिलने के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
पहले फाइनेंस-बीमा, बाद में पंजीयन की उलटी प्रक्रिया!
सूत्रों के अनुसार करोड़ों रुपए की स्लीपर कोच बसों को पहले फाइनेंस कंपनियां ऋण उपलब्ध कराती हैं, फिर बीमा कंपनियां उनका बीमा करती हैं और इसके बाद आरटीओ में पंजीयन की प्रक्रिया पूरी होती है।
परिवहन विभाग के अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि जब फाइनेंस और बीमा हो गया, तो नियमों के तहत ही हुआ होगा। यही मान्यता अवैध बसों को वैध बनाने का आधार बन रही है।
दोहरे मापदंड: 15 साल पुरानी बस को बीमा नहीं, अवैध स्लीपर को हां!: एक ओर बीमा कंपनियां 15 साल पुराने वाहनों को बीमा और फाइनेंस देने से इनकार कर देती हैं, वहीं दूसरी ओर अधिक प्रीमियम के लालच में करोड़ों रुपए की अवैध स्लीपर कोच बसों का बीमा किया जा रहा है। यह सीधा-सीधा यात्रियों की जान से खिलवाड़ है।
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