तुम्हें दिल में बंतुम्हें दिल में बंद कर लूं: पल-पल दिल के पास, तुम रहते होद कर लूं: पल-पल दिल के पास, तुम रहते हो
Khulasa First
संवाददाता

‘जय’ का साथ छोड़ चले गए ‘वीरू’, ‘धरम पाजी’ के साथ फिल्मों के एक युग का अंत
गांव की गलियों से ग्लैमर की दुनिया तक का सफर कर अलविदा हुए भारतीय सिनेमा के ‘ही-मैन’
धर्मेंद्र ने 6 दशकों तक किया दिलों पर राज, अब सिर्फ सबके हिस्से में ‘यादों की बारात’
भारत के सिने जगत ही नहीं, जन-जन के मन में सदियों तक जिंदा रहेंगे जिंदादिल ‘धरमवीर’
300 से ज्यादा फिल्मों में किया काम, सुपर स्टार के तमगे की कभी नहीं की परवाह
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अपने किरदार की कोई अकड़ नहीं। न स्टारडम का कोई घमंड। सदैव अपने जेहन में गांव की गलियों की महक लिए हुए, अंतिम समय तक जीने वाला ये शख्स जीता-जागता पंजाब था। ग्लैमर की चकाचौंध दुनिया भी इस इंसान के मन से ‘पिंड की मिट्टी’ की सुगंध को दूर नहीं कर पाई।
मायानगरी में इस शख्स का आशियाना किसी सितारे का घर नहीं, गांव के मकान का अहसास कराता था और मेहमाननवाजी के तो कहने ही क्या! खास ही नहीं, आम आदमी के लिए भी उनका दर खुला था। गांव की गलियों से ग्लैमर की दुनिया का लंबा व चमकीला सफर पूर्ण कर ये शख्स इस फानी दुनिया को आंसुओं में डुबोकर अलविदा कह गया। पीछे छोड़ गया एक लंबी, न खत्म होने वाली ‘यादों की बारात’। बस, अफसोस ये ही ताजिंदगी रहेगा कि जीते-जी इस शख्सियत को वह मान-सम्मान अपनी इंडस्ट्री में नहीं मिला, जिसका वह सच्चा हकदार था।
चले गए हम सबके ‘धरम पाजी’। उम्र के 89वें पड़ाव तक उनकी जिंदादिली अब किस्सों-कहानियों में सिमट गई। 60 साल तक लोगों के दिलों पर अपने अभिनय के दम पर राज करना कोई आसान है? हम सबके ‘धरम-गरम’ ने ये अनूठा कारनामा कर दिखाया। 60 के दशक का हीरो 21वीं सदी में भी ‘जट यमला-पगला-दीवाना’ बना फिरता रहा। धर्मेंद्र ने अभिनय की दुनिया में एक नया आयाम बनाया।
उनका अलविदा होना हिंदी सिनेमा जगत में ऐसा सदमा है, जिसकी आजीवन कोई दवा नहीं है। ऐसा जज्बाती इंसान अब बॉलीवुड को मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। पेशेवर फिल्म इंडस्ट्री में उन जैसा व्यक्ति अब बस एक किंवदंती जैसा रहना है कि बॉलीवुड में धर्मेंद्र जैसा सुपर स्टार भी था, जिसे अपने स्टार होने का अंतिम समय तक रत्तीभर गुमान नहीं था। सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के इस ‘नौजवान’ कलाकार ने अपने शिक्षक पिता और परिजन के संस्कारों को अंतिम समय तक जीया।
कम होता है 300 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय करना? एक से बढ़कर एक शानदार फिल्में। एक बरस में 9 सुपरहिट फिल्में, तो एक अन्य साल में 7 सुपर-डुपर हिट फिल्में देने वाला कलाकार कभी पुरस्कार की दौड़ में शामिल नहीं हुआ। न उस होड़ में दौड़ा, जो सिने कलाकार को सुपर स्टार का तमगा दिलाती है।
उन्होंने कभी भी सुपर-मेगा-महानायक के तमगे की परवाह नहीं की। बस, अभिनय को अपनी पूजा और सादगीपूर्ण व्यवहार की साधना की। वे न सिर्फ अपनी फिल्म इंडस्ट्री में, बल्कि भारत के जन-जन के हीरो थे। देश का जनसामान्य भी धर्मेंद्र से नजदीकी का अहसास महसूस कराता है।
उन्होंने कभी भी दो चेहरे जनसामान्य के सामने नहीं किए। जो थे, वे सबके सामने थे। कभी ‘पॉलिश्ड’ जीवन नहीं जीया कि अंदर कुछ और बाहर कुछ। उनके इस मिजाज ने ही उन्हें आजीवन एक खुली किताब-सा रखा, जिसे कोई भी आसानी से पढ़ सकता था।
कैसी अद्भुत शख्सियत थी वो... उस इंडस्ट्री में, जो बेहद ‘प्रोफेशनल’ है, जो बेहद निर्मम है। उस इंडस्ट्री में वह बेहद संवेदनशील शख्स था। बच्चे जैसा व्यक्ति। वैसी ही मासूमों जैसी निश्छल मुस्कान, वैसा ही खूबसूरत मन। कोसों दूर अहंकार। बस, हर वक्त बाल सुलभ व्यवहार।
तुम जो चले गए तो होगी बड़ी खराबी...
‘वीरू’ को ये देश भूल सकता है? ‘सत्यकाम’ को कोई बिसरा सकता है? कोई दूजा ‘धरमवीर’ हो सकता है? कतई नहीं। ऐसी एक नहीं, अनेक भूमिकाओं के लिए उन्हें जीवनभर ये देश याद करेगा। उन्होंने अपने अभिनय से अपनी फिल्मों का लोहा मनवाया, लेकिन उन्हें कोई बड़ा अवॉर्ड नहीं मिला, जबकि वे 60-70 के दौर, यानी ‘दिलीप-देव-राज’ के दौर से इंडस्ट्री में स्टार रहे।
उनका स्टारडम किसी भी महानायक से कम नहीं था, लेकिन उन्हें 1997 में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के अलावा कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला। इसके बावजूद उन्होंने अपने किरदार से ये बताया कि फिल्म की दुनिया सिर्फ रोशनी व कैमरे का खेल ही नहीं, बल्कि कुछ और भी है।
इसी कारण वे ‘पंजाब के शेर’ कहलाए। खेती-किसानी का उनका डीएनए मरते दम तक उनके अंतस में हिलोरें लेता रहा। वे अपनी मस्ती में ही आखिरी समय तक इंडस्ट्री में बने रहे। चेहरे पर कभी दूसरा चेहरा नहीं रखने वाला ये ‘वीरू’ ‘जय’ को छोड़ चला गया, लेकिन देश व देशवासियों के दिल में सबके प्यारे धर्मेंद्र पाजी पल-पल रहेंगे। अफसोस तो आजीवन ये रहेगा कि तुम जो चले गए तो होगी बड़ी खराबी, तुम्हें दिल में बंद कर लूं, दरिया में फेंक दूं चाबी।
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