‘ माननीय ‘संघ की मेहनत की मलाई खा रहे भाजपाई: इंदौर में आज फिर संघ के सरसंघचालक; हिंदू सम्मेलनों से समाज जागरण
KHULASA FIRST
संवाददाता

सौ बरस की यात्रा के उत्सवों से 25 बरस बाद समाज में पुनः बना आरएसएस का माहौल
संघ सुप्रीमो इंदौर आकर निमाड़ अंचल के खरगोन रवाना, शाम को फिर लौटेंगे इंदौर
लेपा गांव में श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन के कार्यक्रम के निमित्त हुआ है संघ सुप्रीमो का पुनः प्रवास
इस बार ‘मध्य क्षेत्र' संघ प्रमुख के हिस्से में आया, इसलिए बार-बार हो रहा है मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में आना-जाना
हिंदू सम्मेलनों की सफलता से गद्गद् भगवा वाहिनी, घर-घर दस्तक का अभियान पूर्ण हुआ
‘परिवार के मुखिया' तक पहुंचा स्वयंसेवकों का परिश्रम, समाज के हर हिस्से में पुनर्स्थापित हुई संघ की प्रतिष्ठा
हिंदू सम्मेलनों में सर्व समाज का बस एक ही मलाल- आरएसएस की मेहनत की मलाई खा रहे सत्ता वाले भाजपाई
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आरएसएस के मुखिया डॉ. मोहनराव भागवत का एक बार फिर बुधवार को अहिल्या नगरी इंदौर में आगमन हुआ। उनके आगमन के पूर्व ही उन तक मालवा प्रांत में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त बहे स्वयंसेवकों के पसीने की दास्तां पहुंच गई।
बिना किसी जन आंदोलन व भावनात्मक मुद्दे के स्वयंसेवकों का घर-घर पहुंचना और फिर समाज को एक जाजम पर जमा कर एक पंगत में बैठा देने का काम आसाम नहीं था। लेकिन खाकी नेकर-पतलून वालों ने ये सब कर दिखाया।
एक घर में एक नहीं, तीन बार दस्तक दी। एक-एक परिवार को इत्मीनान से बैठकर बताया कि आरएसएस क्या है? कब से है और क्यों है? भविष्य में भी संघ क्यों समाज जीवन में आवश्यक है, इस पर भी विस्तार से बात की गई।
संपर्क-संवाद-समन्वय का ये अहम कार्य न सिर्फ मुंहजुबानी हुआ, बल्कि लिखित साहित्य, पत्रक, स्टिकर भी स्थायी स्मृति के लिए दिए गए। समाज ने भी स्वयंसेवकों को मान दिया। उनकी मनुहार को स्वीकारा भी।
‘हिंदू सम्मेलनों' के जरिये स्वयंसेवकों की महीने-दो महीने चली मेहनत की परिणीति सामने आई। ये सम्मेलन कोई इक्का-दुक्का नहीं हुए। एक जिले में यह दर्जनों तो विभाग स्तर पर सैकड़ों की संख्या में आहूत इन सम्मेलनों में संघ का सबसे बड़ा मनोरथ भी पूर्ण हुआ और वह था- ‘जात-पांत की करो विदाई, हिंदू हम सब आपस में भाई-भाई..!! ’ इसी स्लोगन के हिसाब से आरएसएस की बिछाई जाजम पर सर्व समाज एकजुट होकर जुटा।
न सिर्फ जुटा, बल्कि एक साथ समरस हो एक ही पंगत में बैठा। न सिर्फ बैठा, बल्कि एक साथ जीमा-चुठा भी।
बिना किसी भेदभाव के जब एक साथ सभी समाज ने इस सहभोज में हिस्सेदारी की तो नजारा देखने लायक था। सम्मेलन जाति, वर्गभेद से तो परे थे ही, इन्होंने दलीय सीमाओं को भी एक तरफ सरका दिया। हिंदू समाज के नाम पर इन सम्मेलनों में भाजपा ही नहीं, अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोग व परिवार भी शामिल हुए।
इन सम्मेलनों के जरिये एक बार फिर समाज जीवन में भगवा ब्रिगेड, यानी संघ परिवार का मान-सम्मान साबित हुआ। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद एक बार फिर गली-गली भगवा दस्तक हुई और माहौल भी बेमौसम केसरिया हुआ।
90 का दशक था वो। राम जन्मभूमि आंदोलन का आगाज भी, चरम भी। समाज जीवन को आंदोलित करने का उस वक्त भगीरथी काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूर्ण किया था। राम शिला पूजन के जरिये शुरू हुई सामाजिक दस्तक एक बड़े आंदोलन में तब्दील हो गई।
एक ऐसा आंदोलन, जो आजाद भारत के जीवन में एक इतिहास बन गया। उस दौर में घर-घर दस्तक देकर स्वयंसेवकों ने ऐसी अभूतपूर्व मेहनत की कि सहस्र-ओ-सहस्र नेत्रों ने जीते-जी अयोध्या में रामलला का भव्य देवालय उसी स्थान पर आकार लेते देखा, जहां कभी बर्बर बाबर के नाम से एक ढांचा खड़ा कर दिया गया था।
90 के दशक के इस ‘संघी आंदोलन' ने देश की राजनीति को भी 360 डिग्री घुमा दिया। समाज के बीच उस वक्त जो आरएसएस की आमद हुई थी, ठीक वैसा ही नजारा आरएसएस की 100 बरस की यात्रा की पूर्णाहुति पर एक बार पुनः नजर आई।
इस बार आंदोलन नहीं था। न कोई भावनात्मक मुद्दा था। न समाज को उद्वेलित करती कोई घटना थी। बावजूद इसके संघ के स्वयंसेवकों ने जमीन पर ऐसा परिश्रम किया कि एक बार पुनः सर्वसमाज में आरएसएस के प्रति आदर व विरोधियों में संघ की दमक, चमक व धमक कायम हुई।
ऐसा 25 बरस बाद पुनः हुआ। तब राम जन्मभूमि मुद्दा था, अब आरएसएस की 100 बरस की यात्रा विषय था। इस यात्रा के जरिये समाज के बीच संघ पुनः पहुंचा और वहीं से निकलकर ये सामने आया- नाचे-कूदे बांदरी, खीर खाए मलंग। यानी मेहनत संघ की, ऐश भाजपा नेताओं की।
‘माननीय' कमलदल से निराश ‘आपका समाज'
इन सम्मेलनों में समाज के बीच से एक बात मलाल के रूप में सर्वाधिक सामने आई और वह थी आरएसएस की राजनीति शाखा भाजपा के विषय में। आम चर्चा इस बात को लेकर ही थी कि आरएसएस की इस तमाम मेहनत की फसल भाजपा काट लेती है, जो सत्ता में आने के बाद समाज व जनसामान्य से ही कट गई है।
संघ की मेहनत की मलाई सत्ता वाले भाजपाई खा रहे हैं। आरएसएस निर्दोष भाव से समाज के बीच हिंदुत्व के विचार को रोपित करता है। फिर निःस्पृह भाव से उसे अपने परिश्रम से पुष्पित-पल्लवित करता है, लेकिन इस परिश्रम का इस्तेमाल भाजपा कर ले जाती है।
पार्टी के नेता व सत्ता दोनों ही ‘विचार' से दूर ‘व्यापार' से जुड़ गए। संघ के वैचारिक अनुष्ठान से भी अब नेता इत्तेफाक नहीं रखते। ऐसे में आखिर कब तक समाज आरएसएस को देखकर भाजपा की झोली भरता रहेगा?
जबकि समाज देख रहा है कि भाजपा के पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री, पदाधिकारी... सबके सब उन्हीं ‘कु-कृत्यों' में लिप्त हो चले हैं, जिनसे तंग आकर जनता ने कमलदल का चयन किया था।
यहां तक कि अब तो आरएसएस की तरफ से पार्टी की निगरानी के लिए भेजे जाने वाले पदाधिकारी भी उसी दौड़ में शामिल हो रहे हैं, जिसे सत्ता की पद-प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है।
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