हाई कोर्ट ने जताई सख्त नाराजगी-भागीरथपुरा में सिस्टम फेल: स्वच्छ पेयजल अधिकार को कुचलने वाले नेताओं और अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में
KHULASA FIRST
संवाददाता

स्वतंत्र गुप्ता जांच आयोग का गठन
मौतों के आंकड़ों पर भी उठे गंभीर सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों ने न केवल प्रशासनिक तंत्र बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनहीनता का भी खुलासा कर दिया।
उच्च न्यायालय ने इसे ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ मानते हुए स्पष्ट कहा समय रहते जिम्मेदारों ने संवैधानिक जिम्मेदारी निभाई होती तो त्रासदी टाली जा सकती थी।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश सुशीलकुमार गुप्ता की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच आयोग गठित किया है, जो तय करेगा त्रासदी के लिए कौन अधिकारी, कर्मचारी और निर्णयकर्ता प्रथम दृष्टया जिम्मेदार हैं और पीड़ितों को मुआवजा कैसे दिया जाए।
उच्च न्यायालय इंदौर खंडपीठ ने (प्रभात पांडे बनाम मप्र राज्य एवं अन्य) से जुड़ी विभिन्न रिट याचिकाओं पर 27 जनवरी को सुनवाई के दौरान नगर निगम, जिला प्रशासन और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
उसने माना भागीरथपुरा (वार्ड क्रमांक 11) सहित अन्य क्षेत्रों में जल प्रदूषण प्रशासनिक लापरवाही, कुप्रबंधन और जवाबदेही के अभाव का प्रत्यक्ष परिणाम है। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया वर्षों से सीवेज और पेयजल लाइनों के समानांतर संचालन, जर्जर पाइप लाइनों और निगरानी तंत्र की विफलता के बावजूद न जनप्रतिनिधियों ने समय रहते आवाज़ उठाई न अधिकारियों ने ठोस सुधारात्मक कदम उठाए।
परिणाम यह हुआ दूषित पानी की आपूर्ति से बच्चों और बुजुर्गों सहित बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े और कई की जान चली गई।
मौत के आंकड़े में दोगुना अंतर
मौतों के आंकड़ों को लेकर भी स्थिति संदिग्ध पाई गई। जहां याचिकाकर्ताओं और स्थानीय लोगों के अनुसार मृतकों की संख्या लगभग 30 है, वहीं राज्य द्वारा पेश रिपोर्ट में बिना ठोस आधार केवल 16 मौतों को दूषित पानी से जोड़कर बाकी को ‘अनिश्चित’ बताया गया।
कोर्ट ने तथाकथित ‘वर्बल ऑटोप्सी’ पर आधारित इस रिपोर्ट को अविश्वसनीय मानते हुए तीखी टिप्पणी की और पूछा जब जीवन और मृत्यु का प्रश्न हो तो अस्पष्ट और अप्रमाणित शब्दावली के सहारे सच्चाई कैसे छिपाई जा सकती है।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा मामला केवल तकनीकी चूक नहीं बल्कि संवैधानिक दायित्व निभाने में विफलता का है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल शामिल है और इसके हनन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।
राज्य सरकार-निगम की रिपोर्ट खानापूर्ति
राज्य सरकार और निगम द्वारा पेश रिपोर्टों को याचिकाकर्ताओं ने कागजी खानापूर्ति करार दिया। वकीलों ने दलील दी आज भी सुरक्षित पेयजल आपूर्ति, मुफ्त इलाज और पानी की गुणवत्ता जांच जैसे निर्देश लागू नहीं हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय निवासियों की शिकायतों ने इन दावों की पुष्टि की।
कोर्ट का सख्त संदेश
आदेश साफ़ संकेत देता है कि जनस्वास्थ्य में राजनीतिक चुप्पी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जांच में लापरवाही की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और तंत्र पर अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई तय मानी जा रही है।
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