‘सदियों के घाव-दर्द भराए’: गौरव-गरिमायुक्त राष्ट्र की भू-नभ में लहराई भगवा पताका
राष्ट्र प्रमुख-संघ प्रमुख की डबडबाई आंखें सनातन की मानबिंदु अयोध्या नगरी में प्रभु श्रीरामजी का मंदिर पूर्णता को प्राप्त। सकल हिंदू समाज के एक अभीष्ट संकल्प की हुई पूर्णाहुति, सदियों का सपना हुआ साकार
Khulasa First
संवाददाता

राष्ट्र प्रमुख-संघ प्रमुख की डबडबाई आंखें
सनातन की मानबिंदु अयोध्या नगरी में प्रभु श्रीरामजी का मंदिर पूर्णता को प्राप्त।
सकल हिंदू समाज के एक अभीष्ट संकल्प की हुई पूर्णाहुति, सदियों का सपना हुआ साकार।
प्रधानमंत्री मोदी व आरएसएस प्रमुख भागवत ने किया ध्वजारोहण, शिखर पर फहराई धर्म ध्वजा।
500 साल के संघर्ष के बाद हुई संकल्प की सिद्धि, राम जन्मभूमि आंदोलन के हुतात्माओं को मिली शांति।
दीपावली-सी जगमग अवधपुरी के भाग्य में आया स्वर्णिम क्षण, जय-जय सियाराम का गूंजा गगनभेदी जयघोष।
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट इंदौर।
राष्ट्र देवता की जन्मभूमि पर उनकी पुनर्स्थापना से रोकने के लिए लाठियां भी चलीं और गोलियां भी। अवधपुरी की गलियां रामभक्तों के रक्त से रंजित भी हुईं। एक नहीं, अनेक बार। लेकिन संकल्प नहीं डिगा। सदियों संघर्ष चला। मुगलिया दौर से गुलाम भारत तक और आजादी के बाद भी। लेकिन कदम डगमगाए नहीं।
आंखों में अपने आराध्य के दिव्य-भव्य मंदिर की संकल्पना का स्वप्न कभी ओझल नहीं हुआ। पीढ़ियां खत्म हो गईं, कई मर-खप गए, भारत की आत्मा पर कई घाव हुए, अनेक दर्द झेले, असीम वेदनाएं मिलीं, लेकिन ‘मंदिर वहीं बनाएंगे…’ का जज्बा रत्तीभर कम नहीं हुआ। सदियों से मिले ये घाव-दर्द मंगलवार को भरा गए। ‘मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी…’ वाली तुलसी की चौपाइयां साकार हो गईं।
गगन में भगवा फहरा गया। वह भी उस शिखर पर, जो रामलला का मंदिर है। विजयी ध्वजा फहरे... गौरव-गरिमायुक्त राष्ट्र की... भू-नभ में लहरें...!! ठीक इसी तरह भू से नील नभ तक भगवा पताका लहरा गई। स्वर्णमंडित ध्वज दंड पर जैसे-जैसे ये भगवद् ध्वज शिखर की तरफ बढ़ रहा था, वैसे-वैसे भारत का भाग्योदय ऊंचाई चढ़ रहा था, छू रहा था।
करोड़ो-करोड़ नयन इस अद्भुत, अप्रतिम व अलौकिक दृश्य को अपलक निहार रहे थे। सहस्र कोटि नयन सजल थे। ‘राष्ट्र प्रमुख’ की आंखें भी डबडबाई हुई थीं और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ प्रमुख की आंखें भी छलक उठी थीं। वातावरण में गगनभेदी जयघोष गूंज रहा था- ‘सियावर रामचंद्रजी की जय’। वैदिक मंत्रोच्चार हो रहा था।
शंख ध्वनि गूंज रही थी। आसमान से पुष्पवृष्टि हो रही थी। लग रहा था जैसे देवी-देवता, सुर, मुनि, नाग, किन्नर, गंधर्व इस पल के साक्षी हों। इस पल का कौन साक्षी बनना नहीं चाहेगा? इस क्षण को कौन निहारना नहीं चाहेगा? आखिर ये सनातन के मानबिंदु अयोध्या नगरी में श्रीरामजी के मंदिर की पूर्णता का पल जो था।
रामलला के भव्यातिभव्य शिखर पर धर्म ध्वजा के आरोहण के साथ ही 500 साल के संघर्ष को विराम मिला। पूर्णाहुति हुई उस संकल्प की, जो सकल हिंदू समाज ने मिलकर लिया था। एक ऐसे अभीष्ट की प्राप्ति हुई, जिसका स्वप्न लिए हमारे पुरखे इस जगत से विदा हो गए। लाखों काल-कवलित हो गए। सैकड़ों गुमनाम हो गए।
अनेकानेक हुतात्मा की गति को प्राप्त हो गए। ऐसी सभी हुतात्माओं को मंगलवार को असीम शांति मिल गई। हर उस आत्मा को आराम मिला, जो राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ा था, लड़ा था। सबसे बड़ा सुकून तो इस बात का था कि ये दिव्य और भव्य स्वप्न हमारी-आपकी आंखों के सामने साकार हुआ। वह भी जैसा सोचा था, उससे कई-कई गुना बढ़कर।
एक अदद मंदिर की कल्पना करने वाले भारत के भाग्य में महल से भी बढ़कर रामजी का मंदिर अस्तित्व में आना ईश्वरीय कृपा से बढ़कर कुछ नहीं। वह भी उस देश में, जहां प्रभु रामजी के होने के सबूत अदालतों में मांगे गए। मर्यादा पुरुषोत्तम रामजी को काल्पनिक पात्र बताने वाले देश में राम कहां जन्मे थे... इसकी लड़ाई दशकों तक चली। उस देश ने मंगलवार को जो दृश्य देखा, वो कल्पनातीत था, है और आजीवन रहेगा।
फटे-पुराने टेंट में इस राष्ट्र का ‘राष्ट्र देवता’ बैठा था। फटेहाल तंबू में धूप, गर्मी, सर्दी, बारिश झेल रहा था। उस देवता तक पहुंचने की तमाम राहें ऊबड़-खाबड़, टूटी-फूटी, गंदगी-कचरे से अटी पड़ी थीं। जो भूमि उस देवता की जन्मभूमि थी, वह अंधेरे में डूबी हुई थी। दिन ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था।
सूर्यवंश का सूर्य भी उदासी, बेबसी में ही उदित होता था और नाकामी के साथ अस्त हो जाता था। सरयू का कल-कल निनाद जब-तब रक्तरंजित था। झांझ-मंजीरों, ढोलक की थाप की जगह संगीनों के साये का पहरा था और भारी-भरकम बूटों की पदचाप थी। सब तरफ घनघोर निराशा व्याप्त थी। सदियों से चल रहा राष्ट्र की चेतना की पुनर्स्थापना का संघर्ष आजाद भारत में और दुर्गति को प्राप्त था।
उसी भारत में मंगल को सब कुछ मंगलमय हो गया। जैसे सदियों का स्वर्णिम स्वप्न एकाएक साकार हो गया। दशकों की गुलामी की बेड़ियां टूट गईं। धर्म ध्वजा के साथ राजधर्म की स्थापना हो गई। राष्ट्र देवता की सदियों की दासता को मुक्ति मिल गई। मुक्ति उन आत्माओं को भी मिल गई, जो इस स्वप्न को अपनी आंखों में बसाए हुए काल-कवलित हो गईं। उसी काल में कल अवधपुरी के कपाल पर भव्य-दिव्य हस्ताक्षर कर दिए, जो भारत के भाल पर, ललाट पर अब सदा अमिट रहेंगे। अक्षुण्ण रहेंगे-अखंड रहेंगे।
‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’… करीब 30 बरस पूर्व गूंजे इस नारे के साथ जो संकल्प इस सनातन राष्ट्र ने लिया था, मंगलवार को उस अभीष्ट संकल्प की पूर्णाहुति हो गई। अभीष्ट, यानी अकल्पनीय। जी हां, किसने कल्पना की थी इस संकल्प की सिद्धि हम-आप अपनी आंखों से देखेंगे? कैसा विषाक्त वातावरण था देश में, जब ये नारा गली-गली, गांव-गांव, नगर-कस्बों में गूंजा था- ‘बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का’।
इस नारे के साथ एक जज्बाई नारा और गूंजता था- ‘लाठी-गोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’। कितने हैरत व दुःख की बात थी कि राष्ट्र की चेतना के प्रतीक, जन-जन के आराध्य, हम सबके जीवनप्राण रघुकुलमनि प्रभु श्रीरामजी के मंदिर के लिए हम लाठी-गोली खाने की बात करते थे।
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