चुल्लूभर पानी में डूब मरो: तीन मरे या आठ; अफसरों के कम न होंगे ठाठ
Khulasa First
संवाददाता

70-80 के दशक के जहरीली शराब कांड-सा शहर पर कालिख पोत गया ‘जहरीला पानी'
अफसरशाही' के जरिये इंदौर पर कंट्रोल करने की ‘परिपाटी' की है ये परिणीति, ‘भोपाल' से इंदौर कब तक चलेगा?
सत्तारूढ़ दल की गुटबाजी का एक बार फिर शिकार हुई अहिल्या नगरी, एक-दूजे को ‘निपटाने' की राजनीति
‘सत्ता' के समक्ष एक बार शहर के चुने हुए जनप्रतिनिधियों की ‘मूक-बधिरता' का हुआ खुलासा
बावड़ी कांड में 36 मर गए, ट्रक के नीचे आधा दर्जन, क्या बिगाड़ लिया जिम्मेदारों का, जो अब उम्मीद कर रहा इंदौर?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
छोटे थे, तब सुना था कि इंदौर में एक समय जहरीली शराब का कांड हुआ। तब शराब पीने से इतने मरे कि श्मशान घाट में शव एक-दूजे के ऊपर रखकर दाह संस्कार करना पड़ा। ये 1970-80 दशक की बात है। उसके बाद इस इंदौर पर अब जहरीले पानी से मौत की कालिख पुत गई।
जिस इंदौर के डंके देशभर में सबसे साफ शहर के बज रहे हैं, उस शहर के लोग गंदे पानी से मर गए, मर रहे हैं और मरने को मजबूर हैं। धिक्कार है, शर्मनाक है ये सुनना। देशभर में शहर की थू-थू हो गई और हो रही है। सेंट्रल इंडिया के तेजी से बढ़ते शहर व ‘स्मार्ट सिटी' के माथे लगा ये कलंक कब और कैसे धुलेगा, कोई नहीं जानता।
अब तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने की बात भी बेमानी-सी लगने लगी है। फिर भी ये चुल्लूभर पानी में उन जिम्मेदारों के डूब मरने की ही स्थिति है, जिनके जिम्मे भागीरथपुरा के बाशिंदों को साफ-शुद्ध पानी पिलाने की जिम्मेदारी थी।
भागीरथपुरा के बगल से ही एक गंदा नाला भी बहता है। जिम्मेदारों में जरा-सी भी गैरत बची हो, तो उसमें डूब जाएं, क्योंकि सबसे स्वच्छ शहर की ख्याति तो विदा होते साल में अब गहरे गंदे पानी में डूब चुकी है।
ये तो होना ही था। ये पहले भी हुआ है। ये आगे भी और होना है। ये सिलसिला थमेगा नहीं, क्योंकि अब इस शहर के लिए बोलने, कहने वाला कोई नहीं। या यूं कहें कि बोलने-कहने लायक किसी को छोड़ा ही नहीं गया।
यहां तो परिपाटी ही ये स्थापित कर दी गई कि इंदौर के लिए बोलने वाले की सुनना नहीं है। न सुनने की योग्यता ही इंदौर में पदस्थापना की एकमेव पात्रता बन गई है। अब शहर के लिए लड़ने-भिड़ने का मतलब है अपनी ‘हत्या'।
ये ‘हत्या' राजनीतिक भी हो सकती है और आर्थिक-सामाजिक भी। इसलिए सब चुप हैं। आंख देखी मक्खी निगलने को मजबूर हैं। पर चुप्पी नहीं टूटती। ‘तू बोला, मैं चला' का डर ऐसा घर कर गया है कि ऐसी कितनी ही जानें चली जाएं, खामोशी बरकरार रखना है।
वह भी उस शहर में, जो सच कहने के लिए, सच के लिए लड़ने-भिड़ने के लिए ही कभी पहचाना जाता था। जहां दल से ज्यादा शहर के प्रति जवाबदेही अव्वल थी कि इंदौर को क्या मुंह दिखाएंगे?
तीन मरे या आठ? अफसरों के तो वे ही बने रहने हैं इंदौर में ठाठ। उन्हें इसी काम के लिए इंदौर में आजकल तैनात किया जाता है कि किसकी सुनना है, किसकी बिलकुल नहीं सुनना। वे अपना यह काम पूरी मुस्तैदी से कर रहे हैं। चाहे वे जिला प्रशासन में बैठे हों या फिर नगर निगम में या पुलिस कंट्रोल रूम में।
आखिर अफसरशाही के जरिये इंदौर को कंट्रोल करने की परिपाटी की ये ही परिणीति होना ही थी। मरने वाले मरते रहें। कल भी मरे, आज भी और कल भी मरेंगे, लेकिन कोई सवाल नहीं करता कि भोपाल से इंदौर को कब तक चलाया जाएगा? इंदौर वालों के हाथ में ही इंदौर की बागडोर क्यों नहीं दी जाती, ताकि वे इस अफसरशाही से कुछ तो सवाल-जवाब तलब कर सकें।
भागीरथपुरा की घटना ने एक बार फिर सत्ता के समक्ष शहर के चुने हुए जनप्रतिनिधियों की मूक-बधिरता का खुलासा किया। अफसर उस टेंडर को अपने पुट्ठे के नीचे दबाकर बैठे थे, जो वक्त पर पास हो जाता तो चलती-फिरती जिंदगियां धरती से आकाश की ओर बायपास नहीं होतीं।
टेंडर की इस लेटलतीफी पर किसी ने मुंह नहीं खोला। कैसे खोलते? मरना है क्या? पता है उन्हें कि टेंडर किसके कहने से रोके गए हैं? किसके कहने से वार्ड-विधानसभा को जानबूझकर तंग किया जा रहा है? ऐसे में बोलना मतलब अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारना। लोग मरें तो मरे, अपनी राजनीतिक संभावनाओं को कौन मारेगा? वह भी जनता के लिए? उसका क्या है, वह तो पैदा ही मरने के लिए हुई है।
जहरीले पानी के तांडव के जरिये एक बार फिर अपना इंदौर सत्तारूढ़ दल की गुटबाजी का शिकार हुआ है। कमलदल के नेताओं के बीच एक-दूसरे को निपटाने की राजनीति इस कदर हावी हो गई है कि अब ये शहर और यहां के बाशिंदे ही आए दिन निपट रहे हैं। कभी बावड़ी में डूबकर, कभी ट्रक में दबकर तो कभी दूषित जल पीकर।
एक-दूजे को निपटाने से जुड़े हालात इतने खराब और निर्लज्ज हो गए हैं कि निर्दोष लोगों के दूषित पानी से हुई मौत से ज्यादा खुशी इस बात की है कि ये मौतें प्रदेश के कद्दावर मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में हुई हैं। कितने शर्म की बात है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं में गुटबाजी का स्तर इतना निम्नतम हो गया है कि सिस्टम से हो रही मौत के भी विधानसभावार क्षेत्र तलाशे जा रहे हैं। सिस्टम से सवाल-जवाब करने की जगह इस बात की खुशी है कि नेताजी अच्छे निपटे..!!
जहरीले पानी से हुई मौतों पर मुख्यमंत्री का एक्शन
मु ख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भागीरथपुरा क्षेत्र में हुई घटना को बेहद दु:खद बताया है। मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उपचार रत प्रभावितों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। साथ ही उन्होंने इस दु:खद हादसे में क्षेत्र का दायित्व संभालने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए है।
भागीरथपुरा मामले में निगम जोन 4 के जोनल अधिकारी शालिग्राम सितोले, सहायक यंत्री योगेश जोशी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है और प्रभारी उपयंत्री पीएचई शुभम श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से सेवा से पृथक किया गया है।
मामले की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति गठित की गई है। यह आईएएस नवजीवन पंवार के निर्देशन में जांच करेगी। समिति में प्रदीप निगम, सुप्रिंटेंडेंट इंजीनियर और मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शैलेष राय को भी शामिल किया गया है।
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