‘दिल्ली से लिली तक लिली से दिल्ली तक’
Khulasa First
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
मा माजी जब से भोपाल से दिल्ली शिफ्ट हुए हैं, तब से जैसे उनकी पूरी राजनीतिक दुनिया ‘दिल्ली से लिली और लिली से दिल्ली’ के बीच सिमटकर रह गई है। एक ‘लिली’ ही अब उनके सब कुछ बनकर रह गये हैं, कम से कम मध्य प्रदेश में तो ऐसा ही नजर आता है। बीस साल तक मप्र के मुखिया रहते हुए उन्होंने न जाने कितनों की राजनीतिक किस्मत संवारी।
किसी को पार्षद बनाया, किसी को विधायक, किसी को सांसद और न जाने कितनों को क्या-क्या बनाया। लेकिन जैसे ही मामाजी दिल्ली पहुंचे, उनके इर्द-गिर्द का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया। जो लोग खुद को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ‘चौहान वंशी’ कहलाने में गौरव महसूस करते थे, उनमें से कई अब ‘यदुवंशी’ होने की डिग्री लेने के प्रयास में दिख रहे हैं। नारदजी का आशय यह है कि मामाजी के राजनीतिक फलक पर सिर्फ एक ‘लिली-पुट’ रह गया है। बाकी उनके जितने भी खास तारे-सितारे थे, परिदृश्य से सब गायब हैं।
उमा कमाल हैं! रिश्ता टूटने से बचा लिया
भाजपा की तेजतर्रार नेत्री उमा भारती ने एक बार फिर अपने निर्णायक व्यक्तित्व का परिचय दिया है। दरअसल, उन्होंने प्रदेश के एक नामचीन नेता की गृहस्थी को बड़ी ही सूझबूझ से टूटने से बचा लिया। बताया जाता है कि यदि उमा समय पर हस्तक्षेप न करतीं, तो वह परिवार लगभग बिखरने की कगार पर पहुंच चुका था।
उमा ने नेताजी और उनकी सहधर्मिणी को आमने-सामने बैठाकर समझाया, गृहस्थ धर्म का पाठ पढ़ाया और बात को बिगड़ने से बचा लिया। उनके प्रयासों से ही नेताजी का घर-परिवार सुरक्षित रह गया। नारदजी को नेताजी के एक करीबी ने बताया कि यदि उमा सामने न आतीं, तो न सिर्फ परिवार टूटता, बल्कि राजनीति में भी नेताजी की स्थिति डांवाडोल हो जाती। ऐसे में उमा की राजनीति संग धर्मनीति सचमुच ‘कमाल’ से कम नहीं।
किस श्रीमंत समर्थक को भोपाल से मिलेगा टिकट?
टिकट किसे मिलेगा, यह तो भविष्य के खाते में जमा है, लेकिन इन दिनों श्रीमंत समर्थक दो युवा नेता भोपाल की सियासी ज़मीन पर ऐसे एक्टिव हैं, मानो टिकट पक्का हो। एक महानुभाव गोविंदपुरा की गलियां नाप रहे हैं, तो दूसरे महानुभाव ने भोपाल मध्य को अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि और टिकटभूमि, तीनों घोषित कर रखा है।
धार्मिक कार्यक्रम हो, जन्मदिन हो, शोकसभा हो या शादी समारोह सूचना मिलते ही दोनों की एंट्री सबसे पहले। और फिर सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी की फोटो ऐसे सजाते हैं, जैसे एक-एक पोस्ट टिकट की सीढ़ी हो।
हरी झंडी भले ही अभी दूर की कौड़ी हो, लेकिन दोनों नेताओं ने खुद को 2028 के विधानसभा चुनाव का प्रबल दावेदार मान लिया है। नारदजी सोच में हैं कि ये सेवा भाव है, जनसंपर्क है या फिर टिकट का ट्रायल रन ?
नेताजी का राजनीतिक डिमोशन चर्चाओं में
यूं तो मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़े नेताओं के राजनीतिक डिमोशन की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन इस बार चर्चा के केंद्र में हैं वे पूर्व मंत्री, जो कभी इतने प्रभावशाली थे कि जिले में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। हाल ही गठित रायसेन जिला विकास सलाहकार समिति में सांसद, विधायकों और स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ-साथ इन्हीं पूर्व मंत्री को भी सदस्य बनाया गया है।
इसी नियुक्ति ने उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है। बताया जाता है कि समिति में शामिल किए जाने के बाद उनके समर्थक चुटकी ले रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि जो भाईसाब पिछली भाजपा सरकारों में कई बार मंत्री रहे हों, जिनकी पत्नी स्वयं सांसद रही हों, उन्हें आज अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए जिला सलाहकार समिति की सदस्यता लेनी पड़ रही है। राजनीतिक डिमोशन, वह भी इस हद तक…!
बड़े साहब से मंत्रीजी परेशान
मप्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्रीजी इन दिनों अपने ही महकमे के शीर्ष अधिकारी से खासे परेशान बताए जा रहे हैं। स्थिति यह है कि मंत्रीजी जब भी अपने मनमुताबिक कोई फैसला लेने या किसी करीबी को ओवरलाइज कराने की कोशिश करते हैं, उनकी फाइलें नियम-कायदों की गांठ में उलझकर रह जाती हैं।
बीते कई महीनों से मंत्रीजी के प्रस्ताव नियमों की कसौटी पर अटक रहे हैं। इसका असर न केवल विभागीय कामकाज पर पड़ रहा है, बल्कि मंत्रीजी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है। हालांकि, मंत्रीजी यह भली-भांति समझते हैं कि बड़े साहब रोड़े क्यों अटका रहे हैं? लेकिन इसके बावजूद वे कोई सख्त कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं।
वजह, बड़े साहब मंत्रालय की ‘पांचवीं मंजिल’ के बेहद भरोसेमंद माने जाते हैं। निर्माण विभाग से जुड़े ‘महाकौशली’ मंत्रीजी प्रखर अहंकार के लिए जाने जाते हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या मंत्रीजी और बड़े साहब के रिश्ते कभी सहज हो पाएंगे, या नियमों की यह सख्ती मंत्रीजी की बेचैनी को यूं ही बढ़ाती रहेगी?
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