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वसूली वालों को उल्टे पैर लौटा रहे किसान, कहा- शिवराज का वादा है, हम कर्ज नहीं चुकाएंगे

Khulasa First

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संवाददाता

24 नवंबर 2025, 3:41 pm
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वसूली वालों को उल्टे पैर लौटा रहे किसान, कहा- शिवराज का वादा है, हम कर्ज नहीं चुकाएंगे

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
किसानों पर अब भी कर्ज है और वे इसे नहीं चुका रहे हैं। कांग्रेस की सरकार गिराने वाली भाजपा और उसकी प्रदेश सरकार के रुख से किसान अचंभित और आक्रोशित हैं और इसकी वजह है सरकार द्वारा किसानों से 2 लाख रुपये तक के कर्ज और इस पर चढ़े ब्याज की वसूली करवाना।

दूसरी तरफ, डिफाल्टर किसानों के ब्याज की राशि माफ करने की घोषणाएं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बार-बार कर रहे हैं। सरकार द्वारा वादा पूरा नहीं करने से नाराज किसान न तो मूल, न ही ब्याज अदायगी कर रहे हैं। यही नहीं, बैंक का बकाया वसूल करने वालों को सरकार की घोषणा याद दिलाकर चलता कर दिया जा रहा है।

भाजपा सरकार के लिए यह मामला मुश्किलें बढ़ा रहा है। इसकी जड़ में मप्र की अल्पकालिक कांग्रेस सरकार द्वारा की गई कर्ज माफी भी है।

अपनी डेढ़ साला सरकार में अपने चुनावी वादे के मुताबिक कांग्रेस, जैसे-तैसे दो लाख रुपये तक के कर्ज माफ कर रही थी, लेकिन फिर से सत्ता पाने को उतावली भाजपा को यह मंजूर नहीं था। चाल, चरित्र और चेहरा ताक पर रख भाजपा ने तख्ता पलटकर अपनी सरकार बना ली। कांग्रेस के उलट इस सरकार ने किसानों का कर्ज माफ नहीं करने का ऐलान कर दिया।

अपने सत्ता कार्यकाल में अनेकोनेक जनहित योजनाओं पर खजाना खाली करने वाली भाजपा सरकार ने कर्ज का सिर्फ ब्याज माफ करने का वादा किया।

बहाए मगरमच्छ वाले आंसू और किया केवल ब्याज माफी का वादा: विधानसभा में सभी नेताओं ने किसानों की कमजोर आर्थिक स्थिति पर मगरमच्छ वाले आंसू बहाए और गहरी चिंता जताते हुए राष्ट्र हित में कर्ज की बजाय ब्याज माफी का वादा और घोषणा की। तब से अब तक छल कपट और झूठ की राजनिति का काफी पानी बह चुका है, इसलिए अब ऋण और ब्याज वसूली का सरकारी डंडा चल पड़ा है।

इससे अब तक धैर्य रखने वाले किसानों में आक्रोश पैदा हो चुका है और उन्होंने भी सरकार को उसी की भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया है। सरकार को चुनौती देता इस तरह का खेती किसानी का वाकया हाल ही में सामने आया है, जिसके गहरे राजनीतिक मायने हैं। इंदौर के समीप ग्राम उमरिया में किसानों ने दूधिया की सहकारी समिति से आए वसूली अधिकारी को कर्ज की राशि तो दूर ब्याज की अदायगी तक नहीं की और खरी-खरी सुनाते हुए उल्टे पांव लौटा दिया।

वसूली नोटिस पर वसूली अधिकारी से ही लिखवाया सीएम का आश्वासन: 
किसान नेता आनंद ठाकुर ने बकायदा वसूली नोटिस पर अपने जवाब में वसूली अधिकारी से ही लिखवाया कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 22 नवंबर 2022 को भोपाल में आयोजित भारतीय किसान संघ की गर्जना रैली प्रदर्शन में आश्वस्त किया था कि डिफाल्टर बैंक खाते वाले किसानों से ब्याज नहीं लिया जाएगा।

आयोजन में डिफाल्टर किसानों के कर्ज के ब्याज की माफी का वादा किया था, इसलिए किसान ब्याज की राशि जमा नहीं करना चाहते। बता दें कि भाकिसं के प्रांतीय पदाधिकारी आनंद ठाकुर भी इस रैली में शामिल थे। तीन से चार बरस में आनंद के खाते की राशि पर 3 लाख 26 हजार रुपये का ब्याज चढ़ गया है, साथ में दो खातों की मूल कर्ज राशि 4 लाख रुपये अलग है। प्रदेश में ऐसे लाखों किसान हैं। ये सारे किसान लालच में आकर सत्तालोलुप राजनेताओं की भ्रष्ट राजनीति के शिकार हुए हैं। सत्ता षड्यंत्रों के मारे किसानों की अब खूब दुर्गति हो रही है।

नौ माह पहले तक डिफॉल्टर किसानों की संख्या थी 33 लाख
करीब नौ माह पहले ऐसे किसानों की संख्या 33 लाख से अधिक बताई जा रही थी । यह संख्या दो वर्ष पूर्व जुलाई 2020 में करीब 23 लाख थी यानी 26 माह में सालाना 5 लाख बैंक खाते एनपीए की भेंट चढ़ गए। बैंकिंग से जुड़े जानकार बताते हैं कि प्रदेश में किसानों के अल्पावधि कर्ज के करीब एक करोड़ खाते हैं, जिसमें से 33 लाख खाते डिफॉल्टर हैं।

इस हिसाब से मप्र में हर तीसरा किसान बैंक या सहकारी समितियों का डिफॉल्टर है। डूबत खाते यानी एनपीए में गई बैंक की कर्ज राशि लगभग 20 हजार करोड़ रुपये हो गई है। चुनाव नजदीक हैं इसलिए किसान बकाया कर्ज और ब्याज अदा करने के मूड में नहीं हैं, इसलिए डिफॉल्टर खातों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है।

इससे चिंतित सरकार डिफ‌ॉल्टर हुए किसानों के बैंक खाते नियमित कराने के उपाय ढूंढ रही है। इसे लेकर बैंक, वित्त विभाग और कृषि विभाग के बीच कई दौर की बातचीत हुई है। बताया जा रहा है कि डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिये कुछ राशि सीधे किसानों के खातों में डाल दी जाए। इसमें खातों की उचित रिस्ट्रक्चरिंग करना शामिल है।

सरकारी वादाखिलाफी से न घर के रहे न घाट के
वजह वही है, मूल कर्ज से ज्यादा ब्याज माथे आ गया है। आसमान से टपके खजूर में अटके किसान सरकारी वादाखिलाफी से न घर के रहे न घाट के। ऐसा इसलिए कि डेढ़ साल की कांग्रेस सरकार और अब तक करीब ढाई बरस की बीजेपी सरकार में लाखों किसानों का न कर्ज और न ही ब्याज माफ हुआ है।

सत्तालोलुप राजनेताओं ने ऐसा खेल खेला कि किसान मूल धन और इस पर चढ़ गए लाखों के ब्याज के दलदल में धंसता चला गया। इसकी कीमत किसान के साथ साथ वित्तीय संस्थानों को चुकानी पड़ रही है। दरअसल राजनेताओं के चक्रव्यूह में फंसकर किसानों ने समय पर कर्ज अदायगी नहीं की। नतीजे में 4 वर्षों में कर्ज की राशि का ब्याज इतना हो गया कि कर्ज अदायगी के लिए छोटे मध्यम किसान को घर जमीन बेचना पड़े।

दोनों दलों की ठगी के शिकार हुए किसान
इस सबसे परे इन दोनों दलों की षड्यंत्र की राजनीति के शिकार किसान अब कुछ ज्यादा ही ठगा महसूस कर रहे हैं। कारण यह है कि कर्ज 2 लाख का था, जिसका सूद मूलधन के बराबर या उससे ज्यादा हो गया है। इसका भुगतान करने में किसान असमर्थ हैं। सरकार तो सरकार है, वसूली तो करेगी इसलिए बैंक और सहकारिता समितियां /सोसायटी वसूली के फरमान जारी कर रही हैं।

कांग्रेस और बीजेपी के बीच धर्म संकट के मारे अधर में लटके किसान अब गुस्से में हैं। वसूली वालों को वे उल्टे पांव लौटा रहे हैं। भाजपा सरकार की परेशानियां भी स्पष्ट हैं। सरकारी खजाना खाली हैं। ब्याज की राशि कहां से दें। बार-बार उधार लिया जा रहा लाखों करोड़ रुपये का खर्च खुले हाथों से हो रहा है। कहां हो रहा है, क्यों और कौन कर रहा है यह रहस्य है।

खजाने की एक बड़ी राशि एक शहर के रंग रोगन और मेहमाननवाजी के नाम पर खर्च की जा रही है। इससे साफ होता है कि कांग्रेस द्वारा की गई किसान कर्जमाफी मौजूदा भाजपा सरकार के लिए अपरोक्ष चुनावी मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। इसकी वजह है कर्ज माफ होने के इंतजार में किसानों का लगातार कर्ज डिफाल्टर होते चले जाना।

कर्ज माफी से साफ इंकार कर दिया
कांग्रेस को घर तक छोड़कर आने के बाद बीजेपी ने मप्र में सरकार बनाई और कर्ज माफी से साफ इंकार कर दिया। इस पर भी किसानों में कोई हलचल नहीं हुई। कोई गुस्सा नहीं, न ही कोई विरोध का स्वर सुनाई दिया। किसानों में बीजेपी के खिलाफ कितनी नाराजगी बढ़ी और औंधे मुंह गिरी कांग्रेस सरकार से कितनी हमदर्दी हुई यह बीते डेढ़ दो साल में हुए छोटे बड़े चुनावों के नतीजों से जाहिर होता है।

बीस हजार करोड़ रुपए से अधिक एनपीए में गए
कर्ज जमा नहीं करने से वित्तीय संस्थाओं का बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक डूबत खाते में यानी एनपीए में चले गए। साल 2022 की शुरुआत में विधानसभा से लेकर मीडिया तक में यह विषय बहस के केंद्र में रहा। उस समय की जानकारी में बताया गया कि करीब 33 लाख किसानों के खातों का पैसा डूबत खाते में है। मतलब इतने किसान कर्ज अदा नहीं कर सके हैं। कांग्रेस सरकार के कालखंड में जरूर करीब 25 लाख किसानों की ऋण माफी हुई थी। कांग्रेस ने ऋण माफी का वादा किया था।

उल्लेखनीय है कि फ्री कल्चर के ब्रह्मास्त्र से सत्ता पाने की ललक में किसानों की 2 लाख रुपये तक की सहकारी व बैंकिंग कर्जमाफी का वादा कर कांग्रेस ने गिरते पड़ते अस्थिर सरकार बना ली थी। खजाना खाली होने और अपने ही अंतर्कलह से जूझती हिचकोले खाती कांग्रेस सरकार चाहकर भी सभी किसानों के कर्ज माफ नहीं कर सकी।

उसकी सरकार पहले चरण में तकरीबन 21 लाख किसानों को कर्ज से मुक्त कर पाई। मप्र में कांग्रेस की सरकार होने से केंद्र में बैठी विरोधी दल की सरकार से कोई मदद नहीं मिली, जिससे यह काम ज्यादा कठिन होता चला गया।

इस पर अपने ही भ्रष्ट, अनियंत्रित व अहंकारी नेताओं के किए धरे को संभालते-संभालते अंततः कांग्रेस की सत्ता ढेर हो गई। इस कारण सात लाख किसानों की कर्ज माफी का दूसरा चरण अधूरा ही रह गया। इसमें सात लाख में से 2 लाख किसान ही सौभाग्यशाली रहे जिनका कर्ज माफ हो सका, क्योंकि बीजेपी ने कांग्रेस के बिकाऊ कहे जाने वाले विधायकों के साथ कांग्रेस सरकार को धराशायी कर दिया था।

मजेदार यह है कि कर्ज माफ कर रही भाजपा द्वारा कांग्रेस सरकार गिराने के बावजूद कर्ज और इसके ब्याज की मार से जूझते किसानों ने कभी भी बीजेपी को न कोसा न ही समय समय पर हुए चुनावों में कोई सबक सिखाया।

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