आईएएस वर्मा की सोच को आंबेडकर भी धिक्कार रहे होंगे..!
महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट । मध्य प्रदेश में अजाक्स के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा का हालिया बयान सिर्फ शब्दों की जुगाली नहीं, बल्कि उस जहरीली मानसिकता का
Khulasa First
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट।
मध्य प्रदेश में अजाक्स के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा का हालिया बयान सिर्फ शब्दों की जुगाली नहीं, बल्कि उस जहरीली मानसिकता का प्रतिबिंब है, जो समाज को लगातार जातीय खांचों में बांटने की कोशिश कर रही है।
उनका यह कहना कि, ‘जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान नहीं देगा, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए, न सिर्फ अपरिपक्व और हास्यास्पद है, बल्कि खतरनाक, गैरज़िम्मेदाराना और पूरी तरह संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
विडंबना देखिए कि जिस व्यक्ति को देश ने शिक्षा, अवसर और संविधान की बदौलत सर्वोच्च नौकरशाही पद दिया, वही व्यक्ति आज जातिगत अहंकार और सामाजिक प्रतिशोध की मानसिकता को महीन तरीके से बढ़ावा दे रहा है।
यह सिर्फ दुखद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चेतावनी है।
विवाह कोई सामाजिक व्यापार नहीं-न दान, न प्रतिदान। यह किसी जातीय स्वीकृति या सामाजिक ‘ट्रॉफी’ का प्रमाणपत्र भी नहीं। सनातन परंपराओं के अनुसार यह तो दो आत्माओं का सात जन्मों का सात्विक मिलन है। वर्मा का बयान बताता है कि ऊंची कुर्सियां सोच को जरूरी नहीं ऊंचा बना दें। कई बार सोच और भी संकीर्ण, प्रतिशोधी और कड़वाहट से भरी हो जाती है।
सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि आज आरक्षण सामाजिक न्याय की व्यवस्था कम और राजनीतिक सौदेबाज़ी का हथियार अधिक बन चुका है। देश के जिम्मेदारों ने इसे समान अवसर और ऐतिहासिक सुधार की प्रक्रिया बनाने के बजाय, जातीय ठेकेदारी और वोटबैंक की रणनीति में बदल दिया है।
संसद से लेकर गांव की चौपाल तक, बहस का उद्देश्य समाज को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि यह तय करना रह गया है कि किस वर्ग को कितना खुश रखकर सत्ता की कुर्सी सुरक्षित की जा सके। जब नीतियां न्याय नहीं बल्कि राजनीति की सुविधा के हिसाब से तय होने लगें, तो समाज आगे नहीं बढ़ता, वह वहीं जड़ हो जाता है, जहां जाति उसकी दिशा तय करती है।
आरक्षण को कुछ लोगों ने सामाजिक न्याय की जगह सम्मान या बदले की राजनीति में बदलने की कोशिश की है। जबकि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई और समान अवसरों के लिए लागू किया था, न कि किसी जातीय समूह से ‘स्वीकृति’ लेने का साधन बनाने के लिए।
शायद यदि अंबेडकर आज होते तो इस बयान पर हंसते भी और दुखी भी होते। हंसते इस बात पर कि ऐसी सोच आज भी जिंदा है, और दुखी इस बात पर कि संविधान के इतने वर्षों बाद भी मानसिकता अब भी जड़, संकीर्ण और दंभ से भरी हुई है। सबसे खतरनाक यह नहीं कि वर्मा ने यह कहा, असली खतरा यह है कि कुछ लोग इसे तालियां बजाकर सही ठहरा रहे हैं। जब भीड़ किसी गलत विचार के पीछे खड़ी हो जाती है, तो वह विचार बहस का हिस्सा नहीं रहता-वह ज़हर बन जाता है। और इतिहास गवाह है कि ज़हर जितना फैलता है, समाज उतना टूटता है।
भारत की पहचान जातियों की दीवारें नहीं, बल्कि विविधता, संवाद, संवैधानिक मूल्य और सामाजिक समरसता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे कुछ लोग समाज को जोड़ने के बजाय उसे और अधिक विभाजित करने, भड़काने और वैमनस्य बढ़ाने में लगे हैं।
आज सवाल यह नहीं कि संतोष वर्मा क्या सोचते हैं, सवाल यह है कि क्या देश ऐसी सोच को स्वीकार करने को तैयार है? यदि भारत को संवेदनशील, समावेशी और प्रगतिशील बनाना है, तो वर्मा जैसी जहरीली मानसिकताओं और ऐसे वक्तव्यों का विरोध करना ही होगा। क्योंकि, समाज की चुप्पी सिर्फ स्वीकार नहीं होती, वह भविष्य के विषैले विचारों की अगली पीढ़ी के लिए खाद भी बन जाती है।
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