कुत्तों का आतंक या व्यवस्था में दोष: कुत्तों की आड़ में आखिर कब तक भ्रष्टाचार
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉग बाइट भागीरथपुरा जैसे हादसे का इंतजार कर रहे हैं क्या जिम्मेदार?
इंदौर में एबीसी का टेंडर जिस एजेंसी के पास है, वह एनिमल वेलफेयर बोर्ड से मान्यता प्राप्त नहीं
सालभर में 50 हजार से ज्यादा लोगों को काट चुके हैं आवारा कुत्ते, कोई निदान नहीं
कोर्ट में हुई कुत्तों की पैरवी के बाद हालात और बदतर, निगम के वश की नहीं रही बात
नए साल के पहले महीने में ही 5 हजार से ज्यादा डॉग बाइट के मामले, कुत्ताप्रेमी भी चिंतित
नगर निगम की नसबंदी प्रक्रिया पर कोर्ट को ही भरोसा नहीं, इतने शेल्टर होम भी नहीं, जहां कुत्ते रखे जा सकें
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर अब कुत्तों की कुत्तई कब तक भुगतेगा? क्या जिम्मेदार कुत्तों के काटने के मामले में भी भागीरथपुरा जैसे हादसे का इंतजार कर रहे हैं? जैसे भागीरथपुरा में गंदा पानी पीने से एक के बाद एक लाशें गिरीं, वैसी ही आपदा क्या कुत्ते काटे के मामले में होगी, तब तंत्र जागेगा?
आखिर कब तक ये शहर आवारा कुत्तों के आतंक को झेलेगा? नगर निगम इस आतंक से निपट नहीं पा रहा। उसके पास कुत्तों की कुत्तई से निपटने के इंतजामात नाकाफी साबित हो रहे हैं। कोर्ट भी निगम पर भरोसा नहीं कर रहा। कुत्ताप्रेमी अलग नहीं मान रहे। ऐसे में इंदौर में कुत्तों के आतंक से निपटने का इलाज क्या है?
आखिर इन आवारा कुत्तों का इलाज क्या है? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं। कुत्तों पर सख्ती पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचता है। कुत्तों पर नरमी बरतने पर आम आदमी की जान पर बन आ रही है। तो फिर जनसामान्य कहां से मुक्ति पाए? कुत्तों के मामलों में मानवीय पहलुओं का तो नितांत ही अभाव है।
इसकी मौत के तो इंतजाम सब तलाश रहे हैं, लेकिन वह इंसानों के बीच जी सके, इसके लिए कहीं कोई सोच ही नहीं। नतीजा ये है कि इंसान के इस सबसे पुराने व विश्वसनीय साथी की सांसों को नियम-कायदों के बीच बांधने के नाकाम इंतजाम किए जा रहे हैं। मूल समस्या के समाधान पर कहीं कोई चिंतन-मंथन दूर तक नहीं।
मा ना कि समस्या गंभीर है, लेकिन इसके लिए सिर्फ कुत्ते ही जिम्मेदार हैं? पीने को जल व खाने को अन्न इस प्राणी की प्राथमिक जरूरत हैं, लेकिन ये काम करने की जगह कुत्तों की आड़ में क्या-क्या गड़बड़झाला हो रहा है, इसका भी खुलासा वक्त रहते होना ही चाहिए। दोषी सिर्फ कुत्ते हैं या इनकी आड़ में ‘कुत्तई' करने वाला तंत्र? न्याय के लिए अब देश में इस दिशा में भी काम होना चाहिए, ताकि कुत्तों को लेकर मचे शोर के बीच ये साफ हो कि आखिर चूक कहां हो रही है।
इंदौर में बिना मान्यता वाले एनजीओ को कुत्तों से निपटने का ठेका
कुत्तों के काटे का देश में शोर तो बहुत है, लेकिन इस समस्या के स्थायी निदान को लेकर ठोस काम सिर्फ कागज पर है। कुत्तों से निजात पाने के इंतजाम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े हुए हैं। ये प्राणी बोल तो सकता नहीं कि उसके नाम पर कैसे भ्रष्टाचार हो रहा है।
लिहाजा इंदौर जैसे शहर में जिम्मेदार ये बताने से भी नहीं हिचकते कि अब तक 2 लाख से ज्यादा कुत्तों की नसबंदी कर दी गई है। कोर्ट ने ही इन आंकड़ों को सिरे से खारिज़ कर दिया। अब इतना ही समझ लें कि एक नसबंदी पर करीब 1200 रुपए दिए जाते हैं।
इससे साफ हो जाता है कि कुत्तों के काटे के शोर के बीच जिम्मेदार कैसी ‘चांदी काट' रहे हैं। देश के सबसे साफ-सुथरे शहर इंदौर में तो कुत्तों की ‘सफाई' का ठेका जिस एनजीओ को दिया गया है, बताते हैं उसके पास एनिमल वेलफेयर बोर्ड की मान्यता ही नहीं।
बावजूद इसके ये एनजीओ इंदौर में कुत्तों से होने वाली समस्याओं से ठाठ से निपट रहा है। ये एनजीओ आंध्रप्रदेश का बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसे अब तक 5 करोड़ रुपए का भुगतान हो चुका है और अभी भी नगर निगम पर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया हैं।
काटने की घटना गिनते हैं या वैक्सीन की संख्या?
एक कुत्ते के काटने पर पांच वैक्सीन लगते हैं। एम्स का कहना है कि वह वैक्सीन गिनते हैं, कुत्तों के काटने के मामले नहीं। इस तरह से भारत में डॉग बाइट का आंकड़ा वास्तविकता से कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ दिखता है।
देश में हर साल साढ़े 13 लाख लोग तंबाकू से मरते हैं। 20 लाख लोग प्रदूषण से और 30 लाख हृदयाघात से जान गंवाते हैं। सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के हिसाब से पिछले साल रैबीज से देश में कुल 54 लोगों की मौत हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छपी एक खबर के आधार पर अनुच्छेद 142 में स्वत: संज्ञान लिया है। जिस मामले में पहले से ही संसद द्वारा बनाया गया कानून मौजूद हो और कानून में स्पष्ट हो, वहां कोर्ट 142 का उपयोग कर सकता है? कुत्तों के मामले में सांसद ने एबीसी रूल्स बनाए हैं।
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं इन नियमों को स्वीकार किया था। ऐसे में वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला संसद के अधिकारों का अतिक्रमण है। यह बात अभिषेक मनु सिंघवी ने सुनवाई के दौरान भी कही।
सरसंघचालक भागवत भी बेतुके नियमों के खिलाफ
अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कुत्तों को शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया था। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी इस निर्णय का विरोध किया था। उन्होंने नसबंदी और वैक्सीनेशन की बात कही थी। अमेरिका में 70% कुत्ते शेल्टर में हैं, लेकिन फिर भी डॉग बाइट के 47 लाख मामले हर साल सामने आते हैं।
इसके उलट भारत में 140 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या में डॉग बाइट के केवल 38 लाख मामले सामने आए। एआईआईएमएस दिल्ली द्वारा दिए गए आरटीआई के जवाब में कहा गया है कि भारत में डॉग बाइट डाटा कलेक्शन की उचित व्यवस्था नहीं है।
करोड़ों में तैयार होंगे शेल्टर होम, निगम के पास है इतनी रकम?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, बस स्टैंड व रेलवे स्टेशन से कुत्ते उठाने की बात कही है। देश में कुत्तों का एक भी शेल्टर नहीं है। ऐसे में शेल्टर बनाने और उसे चलाने में एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च होगा। पहले से ही खस्ताहाल नगर निगमों के लिए इसका खर्च उठाना संभव नहीं है।
विधि विश्वविद्यालय की तरफ से वरिष्ठ वकील के वेणुगोपाल पेश हुए और उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि कोर्ट के वर्तमान आदेश के हिसाब से एक करोड़ 54 लाख कुत्तों के लिए शेल्टर बनाना और उसमें उनके भोजन का बंदोबस्त करना होगा।
इसमें लगभग 30 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष लगेंगे। इंदौर नगर निगम के पास तो कोई शेल्टर नहीं है। बावजूद इसके उसने कुत्ते उठाने शुरू कर दिए। ये कुत्ते कहां गए, इसकी जानकारी किसी भी अधिकारी को नहीं है।
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