डायल-100 पर भ्रष्टाचार के आरोप: हाई कोर्ट में खुली परतें; वाहन, ईंधन, स्टाफ और रिस्पांस टाइम हर स्तर पर गड़बड़ी का दावा, राज्य शासन से जवाब तलब
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आम जनता की सुरक्षा के लिए प्रदेशभर में शुरू की गई आपातकालीन सेवा डायल-100 सवालों के घेरे में है। इस सेवा के संचालन में भ्रष्टाचार और गंभीर अनियमितताओं के आरोपों को लेकर याचिकाकर्ता विक्रमलाल राजोरिया और अजय बसवार द्वारा हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर हाई कोर्ट ने राज्य शासन और संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया है।
याचिका में बताए गए डाटा और तथ्यों ने पुलिस प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि डायल-100 जैसी अत्यंत संवेदनशील सेवा को जिस उद्देश्य से शुरू किया गया था, वह जमीनी स्तर पर पूरा नहीं हो रहा। इसके पीछे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक भ्रष्टाचार को जिम्मेदार बताया गया है।
हाई कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में माना कि मामला केवल सेवा की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी धन के दुरुपयोग की गंभीर आशंका भी नजर आती है।
याचिका में प्रस्तुत डाटा के मुताबिक डायल-100 के तहत जिन पीसीआर वाहनों को 24 घंटे सड़कों पर सक्रिय रहना चाहिए, उनमें से कई वाहन कागजों में तो चालू दिखाए गए, लेकिन वास्तव में वे या तो खराब हालत में या पूरी तरह खड़े पाए गए। इसके बावजूद इन वाहनों के नाम पर ईंधन, मेंटेनेंस और अन्य मदों में भुगतान लगातार होता रहा। कुछ जिलों में तो एक ही वाहन को अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात दिखाया गया।
जीपीएस रिकॉर्ड व फ्यूल बिलों में अंतर
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कई पीसीआर वाहनों के लिए निर्धारित दूरी से अधिक डीजल खपत दर्शाई गई। जीपीएस रिकॉर्ड और फ्यूल बिलों में स्पष्ट असमानता पाई गई।
कई मामलों में ऐसे वाहनों के भी ईंधन बिल पास किए गए, जो संबंधित दिन फील्ड में निकले ही नहीं थे। इस तरह डायल-100 में सबसे बड़ा खेल ईंधन खर्च के नाम पर किया गया।
एंट्री रजिस्टर में भी भारी गड़बड़
मानव संसाधन यानी स्टाफ से जुड़े मामलों में भी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख याचिका में किया गया है। डाटा के अनुसार डायल-100 में ड्राइवर, कम्युनिकेशन स्टाफ और रिस्पांस कर्मियों की संख्या कागजों में अधिक दर्शाई गई।
कई कर्मचारियों की उपस्थिति रजिस्टर में तो नियमित एंट्री मिली, लेकिन मौके पर उनकी मौजूदगी नहीं पाई गई। कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति की ड्यूटी दो अलग-अलग स्थानों पर दिखाए जाने का भी खुलासा हुआ है।
रिस्पांस टाइम के आंकड़े भ्रामक
डायल-100 की कार्यक्षमता का सबसे अहम पैमाना माना जाने वाला रिस्पांस टाइम भी संदेह के घेरे में है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सिस्टम में कॉल रिस्पांस टाइम जानबूझकर कम दर्शाया गया, ताकि प्रदर्शन बेहतर दिखे, जबकि वास्तव में कई आपात कॉल पर पुलिस वाहन काफी देर से पहुंचा। इस तरह न केवल आंकड़ों में हेराफेरी हुई, बल्कि जनता को यह भ्रम भी दिया गया कि सेवा बेहतर तरीके से संचालित हो रही है।
समाधान बगैर निपटा दी शिकायतें
शिकायत निवारण तंत्र को लेकर भी याचिकाकर्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं। डायल-100 से जुड़ी सैकड़ों शिकायतों को रिकॉर्ड में तो निपटाया हुआ दिखाया गया, लेकिन शिकायतकर्ताओं को वास्तविक समाधान नहीं मिला। न तो स्वतंत्र ऑडिट की ठोस व्यवस्था सामने आई और न ही किसी तीसरे पक्ष द्वारा नियमित जांच। इनको कहना है कि शिकायतों को दबाने के लिए केवल कागजी खानापूर्ति की गई।
निजी एजेंसियों को मनमाना भुगतान
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि डायल-100 संचालन से जुड़ी निजी एजेंसियों को भारी भुगतान किया गया, लेकिन उसके बदले दी गई सेवाओं का भौतिक सत्यापन नहीं हुआ। परफॉर्मेंस आधारित जुर्माना या पेनल्टी लगाने की व्यवस्था होते हुए भी या तो उसे लागू नहीं किया गया या फिर केवल फाइलों तक सीमित रही।
डेटा में मैनुअल हेरफेर
याचिका में तकनीकी स्तर पर भी कई खामियों का खुलासा किया गया है। जीपीएस, कॉल लॉग और रिस्पांस डेटा पूरी तरह इंटीग्रेटेड नहीं होने से मैनुअल हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती है। याचिका में आरोप है कि इसी तकनीकी कमजोरी का फायदा उठाकर डेटा में हेरफेर किया गया।
आमजन को कोर्ट से उम्मीद
हाई कोर्ट ने इन सभी बिंदुओं को गंभीर मानते हुए राज्य शासन, गृह विभाग, पुलिस मुख्यालय और डायल-100 से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है। कोर्ट जानना चाहती है कि अब तक इन आरोपों पर क्या कार्रवाई की गई और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
इस पूरे मामले ने सरकार और पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आम जनता की निगाहें अब हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें यह तय होगा कि डायल -100 में हुए कथित भ्रष्टाचार पर केवल जवाब आएगा या फिर जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई भी होगी।
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