लोगों की जान की कीमत पर किया जा रहा विकास स्वीकार्य नहीं: शहर की पहचान पर एक बदनुमा दाग भागीरथपुरा में दूषित पेयजल कांड
KHULASA FIRST
संवाददाता

रामनाथ मुटकुळे वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दूषित पेयजल कांड ने स्वच्छता में सिरमौर शहर इंदौर की पहचान पर एक बदनुमा दाग लगा दिया है। देशभर में ही नहीं विदेशों में भी स्वच्छता को लेकर विशेष ख्याति अर्जित कर चुके इंदौर पर दूषित पेयजल से हुई मौतों ने ऐसी कालिख पोती है, जिसे आने वाले भविष्य में मिटा पाना किसी भी हालत में मुमकिन नहीं है। इंदौर के भागीरथपुरा की गरीब बस्ती में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की नाकामी ने ऐसा जख्म दिया है, जो आसानी से भर नहीं सकेगा।
इं दौर शहर की गरीब बस्ती भागीरथपुरा में दूषित पेयजल कांड ने कम से कम 15 जिंदगियों को असमय मौत की नींद सुला दिया। इसमें जवान, बूढ़े और यहां तक कि बच्चे भी शामिल हैं। इसमें प्रशासन की लापरवाही सामने आई, तो वहीं जनप्रतिनिधियों की बेशर्मी ने इन जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।
इंदौर को सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा मिलने के बाद अब इसे हरा-भरा बनाने के साथ ही स्मार्ट सिटी बनाने को लेकर भी प्रयास जारी हैं। इंदौर को स्मार्ट और मेट्रो सिटी बनाने को लेकर जहां जोर-शोर से काम किया जा रहा है, वहीं इस विकास से होने वाली बर्बादी और आने वाले संकट को दरकिनार कर शहरवासियों को एक अनजाने अंधेरे की ओर ढकेला जा रहा है।
महाराजा तुकोजीराव होलकर के साथ इंदौर शहर का मास्टर प्लान बनाने वाले सर पैट्रिक गिडीस।
यह अनजाना अंधेरा आने वाले गंभीर संकट को इंगित कर रहा है, जो दूषित पेयजल कांड के रूप में फिलहाल कम मात्रा में सामने आया है। अगर यह भयावह रूप लेकर सामने आएगा, तो इंदौरवासियों की जान को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। जिस तरह से इंदौर में आंखें मूंदकर विकास किया जा रहा है, उससे आने वाले समय में ऐसे हादसे और बड़े स्वरूप में सामने आएंगे, इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है।
बिना किसी नियोजन के शहर में विकास के नाम पर प्रशासन की मनमानी जारी है। चाहे जहां सड़क खोदना, नाले बंद करना, बंद नालों पर खेल खिलवाना, ड्रेनेज लाइनों के नाम पर खुदाई करना, ये सभी कार्य शहर में धड़ल्ले से जारी हैं। वहीं मेट्रो के नाम पर भी निर्माण किए जा रहे हैं।
शहर में विकास करना यहां तक तो ठीक हैं, लेकिन इन विकास कार्यों से जनता कितनी परेशान हो रही है, इस बात से जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को कोई लेना-देना नहीं है। राजवाड़ा शहर की जान है और शहर के लिए चारों ओर से आवागमन का प्रमुख केंद्र है।
राजवाड़ा के आसपास के सारे मार्ग खुदे पड़े हैं। कहीं भी जिम्मेदारी से और शीघ्रता से निर्माण कार्य पूर्ण नहीं किया जा रहा है। जूनी इंदौर में चल रहा काम काफी लंबे समय से चल रहा है। यहां का मार्ग भी बंद पड़ा है।
इससे जनता परेशान हो रही है। जनता की परेशानी से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को कुछ लेना-देना नहीं है। लोग परेशान होते हैं, तो होते रहें, किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं है। यही हाल पेयजल सप्लाय को लेकर भी है। जनता को शुद्ध पानी मिल रहा है कि नहीं इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है।
किसी भी विकास कार्य को शुरू करने से पहले यह भी देखा जाना चाहिए कि इस कार्य से जनता कितनी परेशान होगी। इस परेशानी के लिए क्या किया जा सकता है। जनता की परेशानियों को दूर करने के लिए अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाओं का इंतजाम भी किया जाना चाहिए, लेकिन इन बातों से किसी का कोई सरोकार नहीं है।
1918 में होलकर शासकों के लिए स्कॉटिश योजनाकार सर पैट्रिक गिडीस ने इंदौर का मास्टर प्लान बनाया था, जिसे ‹दरबार ऑफ इंदौर› नामक पुस्तक में संकलित किया गया था। इसमें सिर्फ इमारतों का नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और सामाजिक पहलुओं पर आधारित सुनियोजित विकास का खाका था, जिसमें रेलवे लाइन (इंदौर-मनमाड़) और शहर की संरचना के लिए दूरदर्शी विचार शामिल थे, जो आज भी प्रासंगिक है।
इंदौर स्टेट के तत्कालीन महाराजा तुकोजीराव होलकर ने दूरदर्शिता दिखाते हुए शहर की नियोजित बसाहट को लेकर सर पैट्रिक गिडीस से मास्टर प्लान बनवाया था। इसे ध्यान में रखते हुए शहर में कई विकास कार्य किए गए थे। शहर के विकास के लिए अपनी रिपोर्ट में गिडीस ने केवल भौतिक संरचनाओं पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि शहर में रहने वाले लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवनशैली को भी अपने प्लान का हिस्सा बनाया। उन्होंने इंदौर-मनमाड़ रेलवे लाइन की परियोजना का भी खाका तैयार किया था, हालांकि यह पूरी नहीं हो पाई।
उनकी योजना में शहर के भविष्य के विकास के लिए ऐसे विचार थे, जो आज भी प्रासंगिक हैं और विभिन्न कार्यशालाओं में उन पर चर्चा होती है। वह शहर की योजना बनाते समय वहां के निवासियों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को बहुत महत्व देते थे। पैट्रिक गिडीस की रिपोर्ट इंदौर के लिए एक दूरदर्शी, सामाजिक-आर्थिक रूप से जागरूक और समग्र विकास योजना थी, जिसे शहर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। ऐसे में शहर के विकास का खाका खींचते समय यह रिपोर्ट कैसे बनी, इसका अध्ययन भी किया जाना चाहिए।
इंदौर इससे पहले भी महामारी का तीन बार शिकार हो चुका है। 1881, 1897 और 1901 से 1911 के बीच इंदौर में महामारी फैली थी। 1881 में जो बीमारी आई थी, उसके कारण 109 लोग बीमार हुए थे। इनमें से 52 की मौत हो गई। 1897 में ग्रंथिक ज्वर की बीमारी फैली।
उसका खौफ व असर बहुत कुछ कोरोना जैसा ही था। बीमारी फैलने के बाद होलकर स्टेट ने सख्त आदेश जारी किया था, जिसमें लोगों के लिए कड़ी हिदायतें थीं। उस समय स्टेट सर्जन की तरफ से बालकृष्ण आत्माराम गुप्ते ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए थे। शहर में 1901 से 1911 के बीच कई बीमारियां फैलीं।
1903 के बाद कई बार बाजार, स्कूल, कॉलेज, दफ्तर बंद हो गए। 1901 में इंदौर की आबादी करीब 87 हजार थी, जो 1911 में 44 हजार 947 रह गई। इन 10 सालों में करीब साढ़े 22 हजार लोगों की मौत हुई थी। इतने ही पलायन कर गए थे।
यह इंदौर के इतिहास का सबसे बड़ा पलायन था। लगातार महामारी फैलने के बाद शहर में साफ-सफाई को लेकर विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं और महामारी न फैल इस पर विशेष ध्यान दिया गया था।
शहर का विकास बहुत जरूरी है, लेकिन यह किसी भी हालत में शहरवासियों की जान की कीमत पर नहीं हो सकता है, इस बात का ध्यान सभी को रखना चाहिए। विकास के नाम पर शहरवासी परेशान होते रहें, ऐसा किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए। सुव्यवस्थित और सुनियोजित विकास ही शहरवासियों के लिए सुखद हो सकता है। विकास को लेकर शहरवासियों में अगर दुखद यादें भरी होंगी, तो वह विकास इतिहास में काले अक्षरों में अंकित होगा।
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