संघ का शताब्दी संकल्प: जब इंदौर की बस्तियां बन गईं एक परिवार; हिंदू सम्मेलन और समरसता भोज, अहिल्या की नगरी में सामाजिक एकता का शंखनाद
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर शहर में हिंदुत्व और समरसता का अनूठा उत्सव
हजारों हाथ और एक साथ भोजन, जाति के बंधनों को तोड़ता अवर्णनीय नजारा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कहते थे कि हिंदू समाज को संगठित करना किसी के विरोध में नहीं, बल्कि राष्ट्र को सर्वांगीण उन्नति के शिखर पर पहुंचाने के लिए है। संगठन ही शक्ति है और समरसता ही हमारा आधार है।
यही बात कल 11 जनवरी के ऐतिहासिक रविवार को देवी अहित्या की नगरी में साकार हुई। जब शहर की करीब 300 बस्तियों में हिंदू सम्मेलन का यादगार और सफल आयोजन किया गया। इन सम्मेलनों में हजारों लोग जुटे। हिंदुत्व पर चर्चा के साथ देशभक्ति और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।
जब सम्मेलन में विद्वान वक्ता ‘पंच परिवर्तन’ यानी सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण, नागरिक कर्त्तव्य और स्वदेशी का संदेश और इस पर बल दे रहे थे तो मौजूद हजारों लोग तन्मयता से इसे आत्मसात भी कर रहे थे। मंच पर विराजे साधु-संतों की उपस्थिति ने राष्ट्रीय एकता और मानवता के आध्यात्मिक पहलुओं को और गहरा कर दिया। साधु-संत राष्ट्रीय एकता, मानवता से लोगों को परिचित करवा रहे थे।
समरसता भोज ने कभी न भूलने वाला संदेश दिया
समापन पर समरसता भोज ने कभी न भूलने वाला संदेश दिया और संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत की उस बात को भी बल दिया कि हिंदुत्व का अर्थ केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक संस्कृति और जीने का तरीका भी है, जो सबको साथ लेकर चलने और विविधता में एकता देखने की प्रेरणा देता है। हम सब एक हैं, क्योंकि हम भारत की मिट्टी की संतान हैं।
रात होने तक चला भोजन का दौर
आलम यह था कि शहर में कई इलाकों में निर्धारित समय के बाद रात होने तक भी भोजन का दौर चलता रहा। कोई न तो बड़ा था, न छोटा, न पदाधिकारी था, न अधिकारी- एक साथ सब जिस आत्मीयता से समरसता भोजन में जीम रहे थे, वह दृश्य दुर्लभ और अनूठा ही था। सैकड़ों स्थानों पर हजारों हाथ जब एक साथ भोजन ग्रहण कर रहे थे, तब यह भोज ही नहीं था, बल्कि ऊंच-नीच के भेदभाव को जड़मूल से समाप्त करने का एक सामूहिक संकल्प भी था।
स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन
से एक दिन पहले आयोजन
महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस (12 जनवरी) आज हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मना रहे हैं। उन्हीं स्वामी विवेकानंद ने 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदुत्व की उदारता को विश्व पटल पर रखते हुए कहा था- मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति, दोनों का पाठ पढ़ाया है। स्वामीजी ने कहा था कि हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन से एक दिन पहले आयोजित हिंदू सम्मेलन ने उनके सपने को भी साकार कर दिया। हिंदू सम्मेलन विवेकानंद के इसी विचार को जमीन पर उतारने का एक प्रयास कहा जा सकता है। शहर में हजारों लोग जाति और वर्ग के बंधन तोड़कर एक साथ भोजन कर रहे थे, तो लग रहा था मानों स्वामी विवेकानंद का ‘स्वप्निल भारत’ साक्षात् उतर आया हो।
हर शख्स के चेहरे पर था गर्व का भाव
देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने हिंदुत्व को केवल एक धर्म नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति बताया था। उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व कोई पंथ या संप्रदाय नहीं है, बल्कि यह वह जीवन दृष्टि है, जो मानव आत्मा को स्वतंत्र रखती है और उसे सत्य की खोज के लिए प्रेरित करती है। शहर में हुए हिंदू सम्मेलनों में उपस्थित हर शख्स के चेहरे पर गर्व का भाव इसी को दर्शा रहा था। इस आयोजन के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी साबित किया कि हिंदुत्व केवल अपने लिए नहीं जीता, बल्कि वह पूरी मानवता के उत्थान और विश्व कल्याण के लिए जीवित है।
अपनी जड़ों और संस्कृति से मजबूती से जुड़ा शहर
जब बात इंदौर की हो, तो जुबान पर सबसे पहले ‘पोहा-जलेबी’ का स्वाद और ‘सफाई में नंबर 1’ शहर का गौरव आता है। रविवार की सुबह शहर ने अलग ही इतिहास रचा। ‘हिंदू सम्मेलनों’ ने यह साबित कर दिया कि यह शहर आधुनिकता का आवरण ओढ़ते जाने के साथ ही अपनी जड़ों और संस्कृति से कितना मजबूती से जुड़ा है और जुड़ रहा है। हिंदुत्व और ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा के सबसे प्रमुख विचारकों में से एक संघ के सरसंघचालक रहे माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, यानी ‘गुरुजी’ भी कहते थे कि भारत का राष्ट्रवाद ‘भौगोलिक’ नहीं बल्कि ‘सांस्कृतिक’ है। राष्ट्र केवल एक भू-भाग नहीं होता, बल्कि एक जीवन दर्शन और संस्कृति होती है। हिंदुत्व इसी प्राचीन भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का पर्याय है।
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