नियमों को ताक पर रखकर सड़कों पर दौड़ रही ‘मौत की बसें: मुनाफे की अंधी दौड़ में यात्रियों की जान दांव पर; अवैध स्लीपर बसों का काला कारोबार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
यात्रियों की जान को खतरे में डालकर मुनाफा कमाने का संगठित खेल वर्षों से चल रहा है। अवैध रूप से तैयार की जा रही स्लीपर बसें सड़कों पर दौड़ रही हैं। सवाल सीधा है- निर्माण ही अवैध है, तो फिटनेस किस आधार पर?
सरकार ने बस बॉडी निर्माण के लिए AIS-052 और AIS-115 जैसे कड़े मानक लागू किए हैं, लेकिन इससे पहले बनी हजारों स्लीपर बसें इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इन असुरक्षित बसों को पूरी तरह डिस्मेंटल कर नए सिरे से निर्माण करना अनिवार्य होगा? सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि स्लीपर कोच बसें वैधानिक हैं या अवैधानिक, क्योंकि मौजूदा नियमों में इसका सीधा प्रावधान आज भी नहीं है।
एक संकल्प पत्र से खुला अवैध रास्ता: पर्यटक स्थलों के लिए केवल ओमनी बसों में बर्थ का प्रावधान था। इसी का सहारा लेकर तत्कालीन राज्य सरकार ने 24 अप्रैल 2001 को संकल्प पत्र क्रमांक 166 पारित कर डीलक्स बसों में व्हील-बेस के आधार पर 10% सीट कम कर स्लीपर बर्थ लगाने की अनुमति दे दी। यहीं से देशभर में स्लीपर कोच बसों की बाढ़ आ गई।
कानून में नहीं, फिर भी सड़कों पर स्लीपर बसें!: केंद्रीय मोटरयान नियम 1989 के रूल 128 में स्लीपर कोच का कोई प्रावधान नहीं है, न केंद्रीय मोटरयान नियमों में, न ही मध्यप्रदेश मोटरयान नियम 1994 में स्लीपर बसों की स्पष्ट अनुमति है।
इसके बावजूद वर्षों तक पंजीयन और संचालन जारी है। यही कारण है कि महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में राज्य को टैक्स के रूप में अरबों रुपए के नुकसान की आपत्ति दर्ज की गई।
2009 में संकल्प निरस्त, फिर भी कार्रवाई शून्य: ऑडिट आपत्तियों के बाद 31 अक्टूबर 2009 को परिवहन विभाग ने संकल्प पत्र 166 को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही डीलक्स बसों में स्लीपर बर्थ अवैधानिक घोषित हो गया।
अब सख्ती शुरू, लेकिन देर से: केंद्रीय परिवहन मंत्री के निर्देश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सख्ती के बाद अब जाकर स्लीपर बसों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई है। असुरक्षित स्लीपर बसों में अनिवार्य बदलाव के निर्देश जारी किए गए हैं पर सवाल अब भी कायम है कि जब निर्माण ही अवैध था, तो पंजीयन किस नियम के तहत हुआ? यात्रियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि ऐसे सभी पंजीयन निरस्त किए जाएं और नए मानकों के अनुसार दोबारा निर्माण के बाद ही इन्हें सड़क पर उतारा जाए।
किराया सूची में ‘स्लीपर’, कानून में शून्य: बस बॉडी नियमों में स्लीपर बस का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है फिर भी किराया सूची में स्लीपर श्रेणी शामिल है। वहीं डीलक्स बसों में एसी न चलाकर भी यात्रियों से एसी किराया वसूला जा रहा यह सीधे-सीधे यात्रियों से धोखाधड़ी है।
मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में मामला: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद मध्य प्रदेश परिवहन आयुक्त ने पूरे प्रदेश में विशेष जांच अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। कार्रवाई एआईएस-052 और एआईएस-115 के उल्लंघन को लेकर की जा रही है।
स्लीपर बसों पर तत्काल रोक: सीआईआरटी की सख्त सिफारिशें। { ड्राइवर केबिन के अवैध पार्टिशन हटेंगे। { स्लीपर बर्थ के स्लाइडर हटाए जाएंगे। { 10 किलो क्षमता के अग्निशमन यंत्र की अनिवार्य जांच। { चेसिस से अधिक बढ़ी बस बॉडी संचालन से बाहर।
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