बेहरम सिस्टम ने लिए होनहार मेडिकल छात्र अंतरिक्ष के प्राण
KHULASA FIRST
संवाददाता

मनोहर भंडारी रिटायर्ड प्रोफेसर खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
1997 तक एमबीबीएस का फर्स्ट ईयर डेढ़ वर्ष (18 माह) का होता था और उसमें केवल दो विषय—एनाटॉमी और फिज़ियोलॉजी पढ़ाए जाते थे। यह समयावधि पूर्णतः युक्तिसंगत थी, क्योंकि 12वीं तक का पाठ्यक्रम और एमबीबीएस का पाठ्यक्रम ज़मीन-आसमान का अंतर रखता है। फर्स्ट ईयर के मेडिकल छात्र वस्तुतः नर्सरी के बच्चों की तरह होते हैं नई दुनिया, नई भाषा, जीवन-मृत्यु से जुड़ी शिक्षा।
12वीं तक चार घंटे का स्कूल और एमबीबीएस में सुबह 9 से शाम 5 बजे तक का कठोर शैक्षणिक अनुशासन। एकाएक अत्यंत भारी-भरकम पाठ्यक्रम, मोटी-मोटी किताबें, और मानसिक दबाव। सन 1997 के बाद तीसरा विषय बायोकेमिस्ट्री जोड़ दिया गया साथ ही समयावधि 12 माह कर दी गई।
ज्ञान-विस्फोट के कारण तीनों विषयों की पुस्तकों की मोटाई लगभग दोगुनी हो गई, जबकि समय दो-तिहाई ही रह गया। यह शैक्षणिक सुधार नहीं, नीति-निर्धारकों की निर्लज्ज, नासमझ और अमानवीय बेहयाई थी।
यहीं से मेडिकल छात्रों का जीवन लगातार तनावग्रस्त होना शुरू हुआ। मैंने 1998 से ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को लगातार पत्र लिखने आरंभ किए, परंतु वर्षों उत्तर नहीं मिला। मेरा सीधा प्रश्न था—देश के किन चिकित्सा शिक्षाविदों और विचारकों ने फर्स्ट ईयर अवधि घटाने की सिफ़ारिश की थी? उत्तर शून्य रहा।
ईश्वर की कृपा से मैं मप्र के सर्वश्रेष्ठ मेडिकल कॉलेज में पदस्थ था, जहां सर्वाधिक प्रतिभाशाली विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। जब वहां के छात्र भी पढ़ाई के असहनीय बोझ से टूटने लगे, तो अन्य कॉलेजों की स्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
एयर-कंडीशंड कमरों में बैठी मोटी चमड़ी वाली एमसीआई को मेरे पत्रों से कोई फर्क नहीं पड़ना था। 2008 में अपनी कॉलोनी के राज्य परिवहन से सेवानिवृत्त अधिकारी तथा पशु-श्वान प्रशिक्षण विशेषज्ञ अनिमेष चतुर्वेदी से परिचय हुआ।
उनके घर मेडिकल छात्र आते-जाते रहते थे। जब मैंने उन्हें एमसीआई को लिखे अपने पत्रों के बारे में बताया, तो उन्होंने कहा मैं लॉ ग्रेजुएट हूं, आपका पत्र ड्राफ्ट करूंगा। उनके द्वारा तैयार पत्र का उत्तर तुरंत आया। एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष ने लिखा फर्स्ट ईयर 15 माह करने पर विचार किया जा रहा है।
दुर्भाग्य यह इन मोटी चमड़ी वालों ने ठोस बदलाव नहीं किया। उल्टे, एक पूरा माह तथाकथित फाउंडेशन कोर्स की औपचारिक खानापूर्ति में बर्बाद कर दिया जाता है। नेशनल मेडिकल कमीशन से भी किसी संवेदनशील सुधार की कोई आशा नहीं।
वर्षों से लिख रहा हूं फर्स्ट ईयर में बाबा आदम के ज़माने की प्रैक्टिकल एक्सरसाइज़ेज़ बंद की जाएं, जिनका परीक्षा के बाद पूरे चिकित्सकीय जीवन में कोई उपयोग नहीं रहता। मेरी बात कभी नहीं सुनी गई। अंततः 17 नवंबर 2025 को अधिवक्ता के माध्यम से डिमांड ऑफ जस्टिस का विधिक नोटिस देना पड़ा।
यदि इन बकवास और अप्रासंगिक एक्सरसाइज़ेज़ को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया जाए, तो छात्रों को भारी मानसिक राहत मिल सकती है। मेरा स्पष्ट सुझाव है प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में एक सक्षम स्टूडेंट्स वेलफेयर कमेटी और समाधान प्रकोष्ठ अनिवार्य रूप से गठित हो, जहां विद्यार्थियों की हर समस्या और शिकायत का समाधान सहानुभूति, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि से किया जाए।
साथ ही सप्ताह में कम से कम एक बार, एक घंटे, मनोचिकित्सक कॉलेज में ही फर्स्ट ईयर छात्रों के लिए उपलब्ध हो ताकि अंतरिक्ष जैसे होनहार छात्र निराशा, हताशा और आत्मघात जैसे अमानवीय चक्रव्यूह में फंसने से पहले ही बचाए जा सकें। (लेखक सेवानिवृत्त प्राध्यापक एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर)
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