गणतंत्र की जयकार के साथ संविधान और कर्तव्यों की चिंता भी है जरूरी
KHULASA FIRST
संवाददाता

आलोक मेहता वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारतीय सन्दर्भ में गणतंत्र का उल्लेख रामराज्य के रूप में होता है। आदर्श गणतंत्र जहां सबको आगे बढ़ने और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार हो। ऐसा गणतंत्र जिसमें पंच परमेश्वर माने जाते हों। गणतंत्र, जिसमें निर्धनतम व्यक्ति को भी न्याय मिलने का विश्वास हो।
गणतंत्र जिसमें जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन व्यवस्था चलकर सामाजिक-आर्थिक हितों की रक्षा करें। भारत के ग्राम पंचायतों की सक्रियता और सफलता की तुलना दुनिया का कोई लोकतान्त्रिक देश से नहीं हो सकती।
पिछले वर्षों के दौरान भारतीय गणतंत्र फला फूला है। बड़े-बड़े राजनीतिक तूफान झेलने के बावजूद इसकी जड़ें कमजोर नहीं हुई है। अब हम 77वां गणतंत्र दिवस गौरव के साथ मना रहे हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति की धुरी है– राजनीतिक पार्टियां। हाल के वर्षों में निहित स्वार्थों ने कुछ पार्टियों की मीठी खीर में खटास ला दी है। इस स्थिति में पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी में नए अध्यक्ष का चुनाव बहुत सुनियोजित ढंग से संपन्न हुआ।
कहीं कोई टकराव–कड़वाहट नहीं दिखाई दी। निश्चित रूप से अटल आडवाणी राजनाथ सिंह नितिन गडकरी और अमित शाह के मुकाबले नितिन नवीन कमजोर नेता कहे जा सकते हैं, लेकिन संगठन को शक्तिशाली बनाने के लिए शांत स्वाभाव वाले कुशाभाऊ ठाकरे या शंकर दयाल शर्मा जैसे नेताओं का अनुगमन भी लाभदायक हो सकता है।
राजनीतिक समीक्षकों और पार्टीजनों ने यह बात जोरों से उठाई कि नितिन नवीन आगामी विधान सभाओं के चुनाव जितवाने में कितने सफल होंगे? गणतंत्र में चुनाव का महत्व है, लेकिन चुनाव जीतना ही लक्ष्य नहीं हो सकता। 1998 में भाजपा के अध्यक्ष बनने के बाद एक इंटरव्यू के दौरान कुशाभाऊ ठाकरे ने मुझसे कहा था कि राजनीति एक मिशन है।
राजनीतिक दल केवल चुनाव जीतने या पद पाने के लिए नहीं होनी चाहिए। संगठन को समाज और राष्ट्र के हितों के लिए मजबूत करना हमारा लक्ष्य रहना चाहिए। ” इस दृष्टि से नवीनजी की भी बड़ी चुनौती संगठन को सही ढंग से आगे प्रभावशाली बनाये रखने की होगी।
खासकर सत्ता में आने पर राजनीतिक दलों कई के नेता कार्यकर्ता कुछ अहंकार और कुछ पदों और लाभ की जोड़ तोड़ में लग जाते हैं। जनता के अलावा उनकी अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं। इसी वजह से धीरे धीरे राज्यों में कांग्रेस की शक्ति कमजोर हुई है।
गणतंत्र में मीठे फल सब खाना चाहते है, लेकिन फल फूल देने वाले पेड़ों की चिंता कम लोगों को रहती है। लोकतंत्र पर गौरव करने वाले कुछ पार्टियों के नेता अपने संगठन के स्वरुप को ही अलोकतांत्रिक बनाते जा रहे हैं। संविधान, नियम कानून, चुनाव आयोग के मानदंडों के रहते हुए राजनीतिक दलों को ही खोखला किया जा रहा है।
हाल के वर्षों में तो यह देखने को मिल रहा है कि कुछ नेता अपनी ही पार्टी के समकक्ष नेताओ को नीचे दिखाने, हरवाने, उनके बारे में अफवाहें फैैलाने का काम करने लगते हैं। अपने परिजन या प्रिय जनों को सत्ता में महत्वपूर्ण कुर्सी नहीं मिलने पर बगावत कर देते हैं।
विचारधारा का नाम लिया जाता है , लेकिन बिल्कुल विपरीत विचार वाले दल के साथ समझौता कर लेते हैं। कार्यकर्ता और जनता कि भावना से कोई मतलब नहीं रहता।
यों यह बात नई नहीं है। बहुत से लोग आजकल वर्तमान स्थिति में निराश होकर चिंता व्यक्त करते हैं। उनके लिए मैं एक पत्र की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ। पत्र में लिखा था ” मैं शिद्धत से महसूस कर रहा हूँ कि कांग्रेस मंत्रिमंडल बहुत अक्षम तरीके से काम कर रहे हैं।
हमने जनता के मन में जो जगह बनाई थी, वह आधार खिसक रहा है। राजनेताओं का चरित्र अवसरवादी हो रहा है। उनके दिमाग में पार्टी के झगड़ों का फितूर है। वे इस व्यक्ति या उस गट को कुचलने की सोच में लगे रहते हैं। ”यह पत्र आज के कांग्रेसी का नहीं है।
यह पत्र महात्मा गाँधी ने 28 अप्रैल 1938 को लिखा और नेहरू को भेजा था, जब राज्यों में अंतरिम देशी सरकारें बानी थी। फिर नवम्बर 1938 में गांधीजी ने अपने अख़बार हरिजन में लिखा–“यदि कांग्रेस में गलत तत्वों की सफाई नहीं होती तो इसकी शक्ति ख़त्म हो जाएगी ”मई 1939 में गाँधी सेवा संघ के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए महात्माजी ने बहुत दुखी मन से कहा था ” मैं समूची कांग्रेस पार्टी का दाह संस्कार कर देना अच्छा समझूंगा, बजाय इसके कि इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को सहना पड़े।
” शायद उस समय के नेताओं पर गाँधीजी की बातों का असर हुआ होगा, लेकिन क्या आज वही या अन्य पार्टियां भी उस विचार आदर्श से काम कर रही हैं? केवल फोटो लगाने या मूर्ति लगाकर पूजा करने से पार्टी, सरकार या देश का कल्याण हो सकता है?
लोकतंत्र में असहमतियों को सुनने-समझने और गल्तियों को सुधारते हुए पार्टी, सरकार और समाज के हितों की रक्षा हो सकती है। राजनीतिक व्यवस्था सँभालने वालों को आत्म निरीक्षण कर अपने दलगत ढांचे में लोकतान्त्रिक बदलाव का संकल्प गणतंत्र दिवस के पर्व पर करना चाहिए।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए उन्माद नहीं सही मुद्दों और समाज को जागरूक एवं शिक्षित करने की जरुरत होती है। इन दिनों तो प्रतिपक्ष के नेता गलत जानकारी और भय का वातावरण बनाकर जनता को भ्रमित करते दिख रहे हैं।
संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था” बिना चरित्र और बिना विनम्रता के शिक्षित राजनीतिक व्यक्ति जानवर से ज्यादा खतरनाक है। यह समाज के लिए अभिशाप होगा।
”दुःख तब होता है जब गलत व्यक्ति चुने जाने पर कुछ नेता जनता को दोषी ठहराने लगते हैं। वास्तव में उन्हें अपने काम, पार्टी को सही दिशा के साथ जनता के बीच सक्रिय रखना होगा। तभी उन्हें लोकतंत्र के पर्व को मनाने का लाभ मिलेगा।
गणतंत्र की गौरव गाथा की जयकार करते हुए भारतीय संविधान निर्माताओं के लक्ष्यों और भावनाओं का स्मरण भी होना चाहिए। संविधान को अंतिम रुप दिए जाने के बाद 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने कहा था” यदि चुनकर आए लोग योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे।
यदि उनमें इन गुणों का अभाव रहा तो संविधान देश की कोई मदद नहीं कर सकता। आख़िरकार संविधान एक मशीन की तरह निर्जीव है। इसमें प्राणों का संचार उन व्यक्तियों पर निर्भर है , जो इस पर नियंत्रण कर चलाते हैं। देश का हित सर्वोपरी रख ईमानदार लोग ही यह काम कर सकेंगे।”
गणतंत्र की शक्ति से ही दुनिया के कई लोकतान्त्रिक देशों के मुकाबले भारत की राजनीतिक शक्ति में बढ़ोतरी हुई है। सामान्य आंतरिक आलोचना – विरोध भले ही हो, रुस, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान जैसे सम्पन्न शक्तिशाली देश भारत के लोकतंत्र और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना कर अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका मान रहे हैं।
संसद को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा दी जाती है। 1952 से 2025 तक की संसद में सांसदों की अहम् भूमिका से सामाजिक आर्थिक बदलाव हुए हैं। इसलिए संसद के हंगामों, सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर संसद का अवमूल्यन उचित नहीं है।
असली खतरा बाहरी आतंकी हमले, नक्सल संगठनों और उनको समर्थन देने वाले कथित शिक्षित लेकिन विदेशी फंडिंग पर पलने वाले अर्बन नक्सल तथा कट्टरपंथी संगठनों से है। संविधान प्रदत्त अधिकारों की दुहाई और न्याय व्यवस्था की कमजोरी का लाभ उठाकर ऐसे तत्व समाज में हिंसा और अराजकता फ़ैलाने की कोशिश करते हैं।
इससे भी महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि अमेरिका या यूरोपीय देशों के लोकतान्त्रिक अधिकारों से तुलना करने और उनकी अर्थ व्यवस्था से प्रतियोगिता करने वाले नेता और संगठन संविधान पर अमल के लिए आवश्यक कर्तव्यों के पालन और उनके लिए व्यापक जागरूकता के साथ निभाने के लिए कितने प्रयास करते हैं?
संसद द्वारा पारित कानूनों को नहीं स्वीकारने की घोषणा करने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती । राहुल गांधी और उनके अराजक रास्तों के समर्थकों ने सम्पूर्ण समाज में अनावश्यक भ्रम पैदा करने के अभियान चला रखे हैं।
कांग्रेस सहित कई दलों के अपने संविधान में मद्य निषेध और सादगीपूर्ण जीवन की अनिवार्यता लिखी है, लेकिन कितने नेता उनका पालन कर रहे हैं? कर्तव्य नहीं स्वीकारने की पराकाष्ठा यह है कि संविधान की शपथ लिए हुए मुख्यमंत्री सड़क पर धरना – आंदोलन और संसद द्वारा पारित कानून के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के जरिये जनमत संग्रह तक की शर्मनाक मांग करने लगे हैं? दुनिया के किस देश में राज्यों में बैठे सत्ताधारी क्या इस हद तक अपनी ही राष्ट्रीय सरकार और नीतियों का विरोध करते हैं?
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