स्वच्छता के मुखौटे का कड़वा सच: ब्रांडिंग के फेर में ‘बलि’ चढ़ती जिंदगी; संवेदना तक प्रदूषित
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
स्वच्छता को अपनी पहचान और गर्व बनाने वाले इस शहर को किसकी नजर लग गई? भागीरथपुरा की गलियों में छाया मातम अब पूरे देश का दु:ख बन गया है। सवाल उठ रहे हैं, यह केवल हादसा नहीं वरन प्रशासनिक लापरवाही और सत्ता के अहंकार का मिला-जुला नतीजा भी है। गंदे पानी से 15 लोग मौत के मुंह में धकेल दिए गए। हाई कोर्ट में चार मौतों की जानकारी दी गई है।
आरोप-प्रत्यारोप की गंदी नालियां सोशल मीडिया से लेकर सब जगह बजबजाती बह रही हैं, अवसरवादी लोग, पार्टियां और कड़कड़ाती ठंड में मौतों की चिता पर हाथ सेंकने से भी बाज नहीं आ रहे। गंदे पानी से मौतों के कारण इंदौर की देश में फजीहत हुई।
अब नगर निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया को हटाकर डॉ. मोहन यादव सरकार ने तीन नए अपर आयुक्त नियुक्त कर दिए हैं। जमकर किरकिरी हुई तो राज्य सरकार जाग्रत हुई। मामला हाई कोर्ट में है। अगली सुनवाई 6 जनवरी को होना है।
कोई इस बात से इनकार नहीं करेगा लगातार आठ बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा जीतने वाले देवी अहिल्या के इस शहर में दूषित अथवा गंदे पानी के सेवन से मौत का कलंक इस शहर के माथे से कभी नहीं धुल पाएगा। घटना यह भी दर्शाती है यह न केवल प्रशासनिक विफलता है बल्कि शहर के उस गौरव पर भी काला दाग है जो अब देश के अन्य राज्यों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहा है।
देशभर में इस बात की चर्चा है क्या विडंबना है जो शहर देश में सफाई का ‘रोल मॉडल’ है, वहां लोग बुनियादी जरूरत यानी शुद्ध पेयजल के अभाव में जान गंवा रहे हैं। घटनाक्रम के बाद कार्रवाई कहें अथवा आवश्यक प्रशासनिक फेरबदल, जिसमें नगर निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया को हटाकर तीन नए अपर आयुक्तों की नियुक्ति की गई है और प्रभारी अधीक्षण अभियंता को जल वितरण कार्य विभाग के प्रभार से मुक्त कर दिया गया है। यह सब सरकार के ‘डैमेज कंट्रोल’ को दर्शाता है।
क्या यह सिस्टम की विफलता नहीं? आदर्श कहे जाने वाले इंदौर जैसे शहर में, जहां स्मार्ट सिटी और आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की बातें अक्सर बड़े मंचों से होती हैं, वहां सीवेज और पीने के पानी की लाइनों का आपस में मिलकर पानी को जहर में तब्दील कर देना क्या गंभीर तकनीकी और निगरानी संबंधी चूक नहीं? निश्चित ही इससे कोई जिम्मेदार नजरें नहीं चुराएगा। जानकारों की राय है भागीरथपुरा घटनाक्रम स्पष्ट दर्शाता है जमीनी स्तर पर ‘मेंटेनेंस’ की जगह केवल ‘दिखावे’ पर ही पूरा जोर दिया गया।
यह अच्छा संकेत कहा जा सकता है प्रदेश के मुखिया ने अधिकारियों को बदलकर संदेश देने की कोशिश भी की है ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी, लेकिन क्या केवल चेहरे बदलने से समस्या हल हो जाएगी? अब जरूरत हर इलाके में जर्जर पाइप लाइनों के जाल को पूरी तरह बदलने और जल आपूर्ति सिस्टम की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की है।
यह प्रकरण बताता है स्थानीय प्रशासन इस मुद्दे की गंभीरता को पहले स्वीकार करने या सुलझाने में निश्चित ही विफल रहा। शहर के प्रथम नागरिक की बेबसी भी चर्चा में है।
स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर-1 शहर की इस देशव्यापी ‘फजीहत’ ने यह सवाल भी तो खड़ा कर दिया है क्या स्वच्छता के मानक केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित हैं? आपको नहीं लगता सार्वजनिक स्वास्थ्य और शुद्ध पेयजल के बिना ‘स्वच्छता’ का खिताब अधूरा है।
जानकारों का यह कहना इस घटनाक्रम के बाद अधिकारियों का तबादला ‘तात्कालिक उपचार’ है, ‘स्थायी समाधान’ नहीं। इंदौर को अब छवि बचाने के लिए न केवल कागजों पर बल्कि जमीन के भीतर बिछी पाइपलाइनों में भी स्वच्छता सुनिश्चित करनी होगी तभी वह देश के सामने सिर ऊंचा कर खड़ा हो सकेगा।
शहर की गलियों से उठने वाले मातम से हर इंदौरवासी गमगीन है, क्योंकि यह त्रासदी ‘रैकिंग वाली राजनीति’ और ‘जमीनी हकीकत’ के बीच की खाई का खुलासा करती है। पाइप लाइन पर शौचालय का निर्माण और उसमें लीकेज होना कोई एक दिन की गलती नहीं, सालों की लापरवाही है।
तबादले समाधान नहीं, समाधान उस व्यवस्था को पूरी तरह बदलना है, जहां जीवन से ज्यादा ‘शहर की ब्रांडिंग’ को महत्व दिया जाता है और हां, इस त्रासदी के बीच सबसे विचलित करने वाली तस्वीर सत्ता के उस ‘अहंकार’ की रही, जो जवाबदेही के सवालों पर भड़क उठा। जब शहर लाशें गिन रहा था, तब जिम्मेदार मीडिया के तीखे सवालों को ‘फालतू’ करार दे रहे थे। यह पानी ही नहीं, संवेदना का प्रदूषण है।
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