संकटों को हरने वाली संकट चतुर्थी: आस्था का ‘तिल’ और श्रद्धा का ‘पर्व’
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
‘तिल बराबर पुण्य, पहाड़ बराबर फल’ तिल चतुर्थी के संदर्भ में यह कहावत बहुत सटीक मानी जाती है। यह कहावत बताती है कि इस पर्व के दिन किया गया एक ‘तिल’ के दाने के बराबर का दान भी पहाड़ जैसी सुख-समृद्धि और अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
इस बार तिल चतुर्थी (संकट चौथ अथवा संकट चतुर्थी) पर्व 6 जनवरी को मनाया जाएगा। तिल चतुर्थी को संकटा चौथ, माघी चौथ, तिलकुटा चौथ, लंबोदर संकष्टी चतुर्थी और वक्रतुंडी चतुर्थी जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है। इस वर्ष की तिल चतुर्थी विशेष योगों के साथ आ रही है।
माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का महत्व अनूठा: ज्योतिषियों और पंडितों की राय है कि हमारी संस्कृति में चतुर्थी का केवल तिथि होना ही मंगलकारी होता है, लेकिन माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का महत्व अनूठा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के मुताबिक तिल चतुर्थी मात्र एक व्रत नहीं, वरन अपनी संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा के लिए एक मां के संकल्प की विजयगाथा भी है।
इस दिन गणेश जी के संकट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम फलदायी होता है। पंचांग के मुताबिक इस बार माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि की शुरुआत 6 जनवरी सुबह 8 बजकर 1 मिनट से होगी और 7 को सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। संकट चतुर्थी का व्रत 6 जनवरी को रखा जाएगा।
जानिए कैसे हुई इसकी शुरुआत
शास्त्रों में उल्लेख है कि इसी दिन भगवान श्रीगणेश ने अपने जीवन के सबसे बड़े संकट को टाल दिया था और वे ‘संकटहर्ता’ कहलाए थे। इसके साथ ही यह भी मान्यता है कि जब देवताओं पर बड़ी विपत्ति आई, तब अपने पिता और भगवान शिव के आदेश पर बालक गणेश ने अपनी बुद्धि और चातुर्य से इसका हल निकाला। और हां, इसी दिन भगवान गणेश ने अपनी माता पार्वती और पिता शिव की परिक्रमा कर यह सिद्ध किया था कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त ब्रह्मांड का सुख निहित है।
चंद्रदेव का अहंकार व भगवान गणेश का श्राप
इस पर्व के साथ एक अन्य रोचक प्रसंग भी है। एक पौराणिक कथा में बताया गया है कि जब भगवान गणेश गजमुख रूप में पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे तब उनका शरीर देकर चंद्रदेव को अपने सौंदर्य का अहंकार हो गया। वे गणेश को देखकर मुस्कराए। इस पर भगवान गणेश ने चंद्रदेव को श्राप दिया था कि आज से जो भी चंद्रदेव का दर्शन करेगा उस पर कलंक लगेगा।
इसके बाद चंद्रदेव ने गणेश से माफी मांगी और माघी चतुर्थी के दिन उनकी कठोर तपस्या की। भगवान गणेश को उन पर दया आई और बोले कि श्राप तो पूरी तरह खत्म नहीं होगा, परंतु तिल चतुर्थी के दिन जो भी उनका यानी चंद्रदेव का पूजन करने के बाद दर्शन करेगा उसके संकट टल जाएंगे। पंडितों का कहना है कि इसी कारण रात में चंद्रदेव को अर्घ्य दिए बगैर तिल चतुर्थी का व्रत पूरा नहीं माना जाता।
तिल के सेवन का महत्व
मान्यता और राय है कि माघ मास में कड़ाके की ठंड के बीच तिल अथवा तिल्ली के सेवन से शरीर को ऊर्जा मिलती है। शास्त्रीय विधान के अनुसार तिल को शनि के दोष दूर करने और राहु-केतु के नकारात्मक असर को कम करने वाला भी माना गया है। पंडितों के अनुसार तिल का दान और प्रसाद इस पर्व के दिन अक्षय पुण्य की प्राप्ति कराता है।
जानिए किस राशि पर क्या असर
ज्योतिषियों के मुताबिक मेष, सिंह और धनु राशि वालों के जातकों के लिए कॅरियर में नए अवसर उत्पन्न होंगे। रुके हुए कार्य बनेंगे। वृषभ, कन्या और मकर राशि वाले जातकों के लिए आर्थिक स्थिरता आने के योग हैं, जबकि मिथुन, तुला और कुंभ राशि वालों के रिश्तों में मधुरता आएगी और उन्हें पुराने विवाद से मुक्ति मिलेगी। वहीं कर्क, वृश्चिक और मीन राशि वाले जातकों के लिए संतान सुख के योग हैं। स्वास्थ्य में सुधार आएगा।
पर्व के दिन यह करना चाहिए
तिल चतुर्थी पर्व के दिन स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें। भगवान गणेश की प्रतिमा को गंगाजल से नहलाएं। सिंदूर, अक्षत और 21 दूर्वा अर्पित करें। तिल और गुड़ से बने ‘तिलकुटा’ का भोग लगाएं। चंद्रमा उदय होने पर चांदी के पात्र में दूध, जल और सफेद तिल मिलाकर अर्घ्य दें।
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