मौतों के आंकड़े पर भ्रम, मुआवजा लेने से परिजनों ने कर दिया इंकार: बैठक में भिड़े प्रशासन जनप्रतिनिधि
KHULASA FIRST
संवाददाता

चेक देने पहुंचे मंत्री रहवासियों के विरोध के बाद लौटे, दावे के विपरीत रोज बढ़ रहे मरीज
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा में दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों को लेकर स्थिति अब भी गंभीर और भ्रमपूर्ण बनी हुई है। एक ओर प्रशासन हालात पर नियंत्रण का दावा कर रहा है, दूसरी ओर मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मौत के आंकड़े, मुआवजे और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर जनता का आक्रोश खुलकर सामने आ रहा है।
मौत की वास्तविक संख्या को लेकर असमंजस की स्थिति है। स्थानीय लोगों का कहना है लगभग 16 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि प्रशासन केवल पांच मौतों को ही दूषित पानी से जुड़ा मान रहा है। इसी आधार पर मुआवजे की प्रक्रिया भी सीमित रखी गई है। निगम और स्वास्थ्य विभाग भले ही स्थिति के नियंत्रण में होने की बात कह रहे हों, लेकिन हकीकत है हर दिन 10 से अधिक नए मरीज अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं। यह आंकड़ा प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर रहा है।
परिजनों ने ठुकराए चेक
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशानुसार मृतकों के परिजनों को रेड क्रॉस निधि से दो-दो लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की शुरुआत की गई। इसी क्रम में नगरीय प्रशासन मंत्री और क्षेत्रीय विधायक कैलाश विजयवर्गीय पार्षद के साथ दोपहिया वाहन पर सवार होकर पीड़ित परिवारों के घर पहुंचे।
चेक देने लगे तो पीड़ित परिजनों ने इनकार कर दिया। एक पांच महीने के मासूम की मां ने भावुक होकर कहा ‘हमें पैसा नहीं चाहिए, हमारा बेटा लौटा दो।‘ परिजनों के इस विरोध और भावनात्मक प्रतिक्रिया के बाद मंत्री और अधिकारी बिना कुछ कहे लौट गए।
21 टीमें कर रहीं सर्वे, 338 नए रोगी
स्वास्थ्य विभाग भागीरथपुरा में व्यापक सर्वे और जागरूकता अभियान चला रहा है। सीएमएचओ डॉ. माधवप्रसाद हसानी के अनुसार 21 टीमों का गठन किया है, जिनमें डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, आशा कार्यकर्ता और एएनएम शामिल हैं। टीमें घर-घर उबला पानी पीने और बाहर का भोजन न करने की सलाह दे रही हैं।
शुक्रवार को 1714 घरों का सर्वे हुआ, जिसमें 8571 लोगों की जांच हुई। 338 नए रोगी सामने आए, जिन्हें प्राथमिक उपचार दिया गया। अब तक 272 मरीज अस्पतालों में भर्ती किए जा चुके हैं, जिनमें से 71 को डिस्चार्ज किया जा चुका है। फिलहाल 201 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं और 32 मरीज आईसीयू में उपचाररत हैं।
अधिकारियों पर मनमानी के आरोप
दूषित पानी की घटना को लेकर मुख्यमंत्री के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने अधिकारियों की बैठक ली, जिसमें विधायक, महापौर और पार्षद भी मौजूद रहे। बैठक में जनप्रतिनिधियों ने खुलकर प्रशासन पर मनमानी और उपेक्षा के आरोप लगाए। विधायकों ने कहा कि जिले के अधिकारी न तो फोन उठाते हैं और न ही जनप्रतिनिधियों की बात सुनते हैं। जब हजारों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनदेखी हो रही है, तो आम जनता की सुनवाई कैसे होगी।
महापौर की भूमिका पर उठे सवाल
जनप्रतिनिधियों ने इसे शर्मनाक स्थिति बताते हुए कहा कि यदि वे जनता के हित में संघर्ष नहीं कर पा रहे हैं, तो ऐसे पंगु जनप्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से इस्तीफा दे देना चाहिए। शहर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव, जो स्वयं कानूनविद हैं, से अपेक्षा जताई गई कि वे महापौर परिषद की बैठक बुलाकर ऐसे अधिकारियों के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजें।
राजनीतिक तुलना और आरोप
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया प्रवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी ने कहा कि वर्ष 1999 में जब कैलाश विजयवर्गीय नगर निगम के महापौर थे और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे, तब दोनों अलग-अलग दलों से होने के बावजूद अधिकारी नगर निगम के नियमों के
अनुसार काम करने को मजबूर थे। उन्होंने आरोप लगाया कि आज सत्ता की पकड़ प्रशासन पर कमजोर हो चुकी है, जिसके चलते अधिकारियों की मनमानी बढ़ गई है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
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