इन मौतों के पहले तो इंदौर प्रशासन जनता पर फूल बरसा रहा था...!
KHULASA FIRST
संवाददाता

नवीन रांगीयाल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महाराज दिक्कत तो यह है कि हमारी पत्रकारिता उस बिंदु से शुरू होती है, जहां से मौत के आंकड़े गिनने की शुरुआत होती हैं। उसके पहले नगर, समाज में सबकुछ ठीक होता है- कहीं कोई दिक्कत नहीं होती है। उसके पहले तो लोग मखमल की सड़कों पर चल रहे थे और रथों पर सवारी कर रहे थे- और प्रशासन जनता पर फूल बरसा रहा था। अपनी जिंदगी को दुरुस्त करने की आस में जो आम लोग मंत्री, महापौर और मुख्यमंत्रियों को वोट देने के लिए कतारों में लगे थे- हूरें उन्हें भर- भरकर जाम परोस रही थीं।
किंतु हम भूल गए कि वो हम ही थे जो इंदौर को स्वच्छता का अवॉर्ड मिलने पर चार कॉलम का फोटो लगाकर जोर- जोर से तालियां बजाकर छाती चौड़ी कर रहे थे। वो भी उन लोगों के लिए जो स्वच्छता जांचने आई टीमों को इंदौर का मखमली हिस्सा दिखाकर छप्पन और सराफा के स्वाद में उलझाते रहे।
वो हम ही हैं, जिन्हें पता नहीं है कि एबी रोड के अलावा शहर में कितनी गंदी, बदबूदार और दमघोंटू गलियां हैं। वो हम ही थे जो अब अखबारों और वेबसाइट्स में चेंबर, ड्रेनेज की दिक्कतों और गंदे बहते नालों की खबरें लगाने से कतराने लगे हैं। अब तो ये खबरें अखबारों में फीलर भी नहीं बनती।
पत्रकार और अफसरशाही साथ-साथ सोती है और साथ में ही जागती है। हमारी पत्रकारिता भी प्रशासन के नुमाइंदों के साथ तभी जागती हैं- जब अस्पतालों से आम लोगों की मौतों के रूझान आने लगते हैं। जब हर घर के आंगन में अंतिम संस्कार के जलते कंडे का धुंआ हमारी आंखों में किरकिरी करता है।
जब ज्यादातर घरों से रोने-सुबकने की आवाजें आती हैं। फिर एक दिन अखबार अचानक से चीख उठते हैं। पन्ने काले कर दिए जाते हैं। संपादकीय क्षमताएं भड़क उठती हैं। मासूम बच्चे और ज्यादा मासूम लगने लगते हैं।
नता बेचारी- सी लगने लगती है। तब बेवाएं याद आती हैं। तब याद आता है कि बेटों के सिर से बाप का साया उठ गया है। मांएं रोती नजर आती हैं। तब याद आता है औरतें सुबक रही हैं।
वरना, उसके पहले तो हमारी पत्रकारिता और हम भी झूला झूलते हैं- ठेले से उठाकर फोकट की मटर खा लेते हैं और मामा से गजक मांग लेते हैं- उसके पहले तो हम भी वीडियो पर वही बेशर्म हंसी हंसते हैं जो मंत्री जी हंस रहे थे। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी लापरवाही किसी अखबार में नहीं छपती क्योंकि हम ही तो उन खबरों और अखबारों के रहनुमा हैं।
जिस हिंदी भाषी स्वाभिमानी पत्रकार की मंत्री जी को लगाई फटकार पर हम ‘वाह’ कर उठे हैं— माफ कीजिए वो स्वाभिमान हमारे खून में नहीं है। मैं पूरा आश्वस्त हूं- और दावे के साथ कह सकता हूं कि अनुराग द्वारी की जगह कोई इंदौरी पत्रकार होता तो उसी ‘घंटा’ की गूंज पर हीही कर उठता।
कुछ घंटे रूक जाए। तारीख बदल जाएगी और घटना भी। आपको याद भी नहीं रहेगा कि भागीरथ में फेले जहर से कितने लोग मरे थे। उसके लिए पुराने अखबार खंगालने पड़ेंगे। जैसे हमें यह भी याद नहीं कि बावड़ी में गिरकर कितने मरे थे।
जैसे हमें यह याद नहीं कि सरवटे पर गिरी इमारत के मलबे में कितने लोग दबकर मरे थे। एमवाय में किस तारीख पर बच्चों को चूहों ने कुतर दिया था और जहरीली सीरप से कितने बच्चे दुनिया से चल बसे।
फिलहाल आलेख पढ़िए और अपने व्हाट्सएप पर कोई नया लतीफा खोजकर हंसिए और इंस्टाग्राम पर कोई अश्लील रील देख लीजिए। नए वर्ष की शुभकामनाएं।
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