‘घंटा’ पत्रकार के बाद ‘घंटा’ प्रशासन: मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बाद अटल बिहारी विवि परिषद के सदस्य डॉ. मुकेश मिश्रा का विवादित ‘घंटा’ बयान
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट,भोपाल।
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘घंटा’ शब्द सियासी बहस का केंद्र बन गया है। सरकार में वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विवादित बयान के बाद अब अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय की कार्य परिषद के सदस्य एवं दंतोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा का सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में है।
डॉ. मिश्रा ने भोपाल की प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस और यातायात प्रबंधन पर तीखी टिप्पणी करते हुए जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, उसने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के ‘घंटा’ वाले बयान से शुरू हुआ विवाद अभी थमा भी नहीं था कि, इसी कड़ी में डॉ. मुकेश मिश्रा का सोशल मीडिया पोस्ट सामने आ गया। उन्होंने अपनी पोस्ट में राजधानी की प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है।
डॉ. मिश्रा ने लिखा-’घंटा! जी हां! यहां अफसर, पुलिस प्रशासन, यातायात व्यवस्था सब घंटा ही है! वो भी फोकट में…! हरि नारायण चारी मिश्रा (पुलिस कमिश्नर, भोपाल) भरोसे राजधानी भोपाल…!’ इसके बाद उन्होंने यह भी जोड़ा- ‘ये पोस्ट भी घंटा ही है…!’
डॉ. मिश्रा का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब राजधानी भोपाल में यातायात अव्यवस्था, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर आमजन में पहले से ही असंतोष देखा जा रहा है। हालांकि, जिस भाषा और लहजे में यह टिप्पणी की गई है, उसे लेकर यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थान से जुड़े पदाधिकारी को सार्वजनिक मंच पर इस तरह की अभद्र और कटु भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
सूत्रों के अनुसार, डॉ. मिश्रा की इस टिप्पणी को मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के हालिया बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि , फिलहाल न तो प्रशासनिक स्तर पर और न ही विश्वविद्यालय की ओर से इस बयान को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है।
मंत्री विजयवर्गीय ने क्या कहा था?
गौरतलब है कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में कथित तौर पर जहरीला पानी पीने से 10 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के बीमार होने की घटना को लेकर एक टीवी चैनल के संवाददाता ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल किया था।
इस पर मंत्री नाराज हो गए और संवाददाता से कहा-’क्या फोकट सवाल पूछते हो… घंटा!’ इसी बयान के बाद ‘घंटा’ शब्द प्रदेश की राजनीति में विवाद का रूप ले चुका है, जो अब सत्ता, प्रशासन और मर्यादा, तीनों पर सवाल खड़े कर रहा है।
वरिष्ठता बनाम नेतृत्व, सत्ता के भीतर की असहजता
मप्र की राजनीति में इन दिनों सत्ता के भीतर वरिष्ठता और नेतृत्व को लेकर एक अंदरूनी असहजता की चर्चा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय लंबे समय तक संगठन और सरकार में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। उनका अनुभव, राजनीतिक पकड़ और प्रशासनिक समझ निर्विवाद मानी जाती है।
इसके विपरीत, डॉ. मोहन यादव अपेक्षाकृत नए चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री पद पर आए हैं और अपनी स्वतंत्र कार्यशैली स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। विजयवर्गीय के हालिया बयान सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पर निशाना नहीं साधते, लेकिन उनके शब्दों और लहजे में प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर असंतोष साफ झलकता है।
उनके बयानों को नेतृत्व के प्रति परोक्ष असहमति के रूप में देखा जा रहा है। उनके व्यवहार से लगता है कि आंतरिक रूप से वे डॉ. मोहन यादव को बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
विजयवर्गीय के विवादित बयान
कैबिनेट गठन के बाद विजयवर्गीय ने कहा था कि, ‘सरकार अनुभव से चलती है, केवल कुर्सी से नहीं।’ इस बयान को मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया।
विभिन्न मंचों से उन्होंने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष जताया। चूंकि कानून-व्यवस्था और प्रशासन सीधे मुख्यमंत्री के अधीन आते हैं, इसलिए इन टिप्पणियों को मुख्यमंत्री पर परोक्ष सवाल माना गया।
हाल ही में इंदौर में जहरीला पानी पीने से मौतों के मामले में सवाल पूछने पर पत्रकार से ‘फोकट सवाल… घंटा!’ जैसी टिप्पणी ने सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए।
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