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देशभर में किरकिरी होने के बाद हुई प्रशासनिक सर्जरी: जहरीले पानी से मौत का तांडव जारी, गम और दहशत का माहौल

Khulasa First

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संवाददाता

03 जनवरी 2026, 4:11 pm
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देशभर में किरकिरी होने के बाद हुई प्रशासनिक सर्जरी

दूषित पानी का कहर: भागीरथपुरा में 16 मौतें, 30 साल पुरानी ‘सड़ी लाश’ कांड की डरावनी यादें हो गई ताज़ा

निगमायुक्त, अपर आयुक्त के साथ ही प्रभारी अधीक्षण यंत्री को हटाया गया

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।

भागीरथपुरा में ड्रेनेजयुक्त गंदा व दूषित पानी पीने के बाद अब तक करीब सोलह लोगों की मौत हो गई है। यह मामला देशभर में सुर्खियों मेंे आने के बाद प्रदेश सरकार ने बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करते हुए नगर निगम के आयुक्त,

अपर आयुक्त और नर्मदा प्रोजेक्ट के प्रभारी अधीक्षण यंत्री को हटाने की कार्रवाई की है।

देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के भागीरथपुरा में ड्रेनेजयुक्त गंदे व दूषित पानी से होने वाली मौतों की गूंज देशभर में सुर्खियों में छाई हुई है। इसके चलते ही विपक्षी दलों के नेता भी सक्रिय हो गए। भागीरथपुरा घटना पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी, भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के बयान सार्वजनिक होने के बाद यह तय माना जा रहा था कि इस मामले में सरकार लगातार घिरती जा रही है। इसके चलते अब अफसरों पर सख्त एक्शन लिया जा सकता है।

भागीरथपुरा की घटना में सबसे बड़ा नाटकीय घटनाक्रम प्रदेश सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान के बाद आया। जब दिल्ली के एक पत्रकार ने कैलाश विजयवर्गीय से भागीरथपुरा मामले में सवाल किया तो विजयवर्गीय ने जबाब में कह दिया कि बेकार के सवाल मत पूछो घंटा हुआ है।

मंत्री का यह बयान देशभर के मीडिया में सुर्खियो में छा गया। इसके बाद विपक्षी दलों ने प्रदेश सरकार की घेराबंदी शुरू कर दी। विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री तक को इस मामले में निशाना बनाना शुरू कर दिया। इससे यह मामला देशभर की सुर्खियों में छा गया। इसके बाद सरकार का यह एक्शन जरूरी हो गया था।

तीन नए अफसर पदस्थ
प्रदेश सरकार ने भागीरथपुरा मामले में बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करते हुए यहां तीन नए आईएएस अफसरों को अपर आयुक्त बनाकर पदस्थापना के आदेश जारी किए हैं। इसके साथ ही जो पद खाली हैं, उनको भी जल्द भरने के निर्देश मुख्य सचिव को दिए गए हैं।

इसके अलावा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सभी अफसरों को निर्देश दिए हैं कि अधिकारी जनप्रतिनिधि से समन्वय बनाकर कार्य करे। किसी भी हालत में प्रदेश में अन्य कहीं इस तरह की घटना दोहराई नहीं जानी चाहिए।

महापौर की जीत
महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने भागीरथपुरा मामले में निगम अफसरों को जिम्मेदार बताकर कार्रवाई की बात कही थी। महापौर ने खुलकर कहा था कि अफसर पूरी तरह मनमानी कर रहे हैं। वह मेरी बात सुनते नहीं हैं। इसके चलते इस सिस्टम में मैं काम नहीं कर सकता हूं।

महापौर की इस तल्ख बात को मुख्यमंत्री ने समझा और भागीरथपुरा की घटना के लिए जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कर उनको इंदौर से हटा दिया। इससे महापौर की मंशा पूर्ण हो गई।

ज्ञात रहे कि महापौर के साथ अब तक कार्य करने वाले पांच निगमायुक्त बदले जा चुके हैं। हर बार महापौर और निगमायुक्त के बीच समन्वय नहीं बनने की बात का खुलासा होने के बाद निगमायुक्त को हटाया जाता है।

भाजपा की कलह
भाजपा की अंदरूनी कलह भी सामने आई। इस घटना के बहाने भाजपा जनप्रतिनिधियों ने जनता के समक्ष अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए यह प्रमाणित कर दिया था कि अफसर सहयोग नहीं कर रहे हैं। अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनते।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी विकास कार्यों की बैठक में मुख्यमंत्री से कह चुके थे कि अफसर उनके नाम से धमकाते हैं। इससे पहले संपत्तियों की जांच के मामले में भी जनप्रतिनिधियों ने अफसरों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कराया था। तब निगमायुक्त के खिलाफ नारेबाजी भी थाने में हुई थी।

भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से 16 लोगों की मौत के बाद पूरा शहर ही नहीं, बल्कि प्रदेशभर में आक्रोश की लहर फैल गई है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की मौत ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह कोई साधारण हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, अनदेखी और गैर-जिम्मेदार सिस्टम का खौफनाक नतीजा है। इस घटना ने इंदौर के इतिहास की उस डरावनी याद को फिर जिंदा कर दिया है, जब करीब तीन दशक पहले लोग ‘सड़ी-गली लाश’से दूषित पानी पीने को मजबूर हो गए थे।

भागीरथपुरा में हालात इतने भयावह हैं कि हर गली, हर घर में दहशत पसरी हुई है। दूषित पानी के कारण एक के बाद एक मौतें हुईं, कई लोग अब भी अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। क्षेत्र में पानी की बदबू, उल्टी-दस्त और तेज बुखार की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं, लेकिन जिम्मेदार अफसर आंख मूंदे बैठे रहे। जब तक प्रशासन हरकत में आता, तब तक 16 परिवारों के घरों में मातम पसर चुका था। इंदौर आज भी भूल नहीं पाया है। करीब 30 साल पहले सुभाष चौक और आसपास के इलाकों में अचानक घर-घर गंदा पानी सप्लाई होने लगा था। लोग एक के बाद एक बीमार पड़ने लगे। किसी को पेट दर्द, किसी को उल्टी-दस्त, तो किसी को तेज बुखार हो रहा था। हर घर में मरीज थे, लेकिन बीमारी की असली वजह किसी को समझ नहीं आ रही थी। पूर्व विधायक और भाजपा के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन के अनुसार, जब मामले की गंभीरता को देखते हुए पानी की टंकी की जांच की गई और उसका ढक्कन हटाया गया, तो अंदर का दृश्य देखकर सभी के होश उड़ गए। टंकी के भीतर मानव कंकाल तैर रहा था। उसी टंकी से पूरे इलाके में पानी की सप्लाई हो रही थी। लोग अनजाने में ‘सड़ी-गली लाश’ से दूषित पानी पी रहे थे और रोजमर्रा के कामों में उसका उपयोग कर रहे थे। उस समय यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि इतनी भयावह लापरवाही के बावजूद किसी की जान नहीं गई। लेकिन इस बार भागीरथपुरा में हालात कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हुए। यहां पानी की हालत शौचालय के पानी जैसी बताई जा रही है, जिसने सीधे तौर पर 16 लोगों की जान ले ली। यह फर्क साफ दिखाता है कि हालात कितने बिगड़ चुके हैं और लापरवाही कितनी जानलेवा हो चुकी है। इस भीषण त्रासदी के बाद कांग्रेस ने सरकार और नगर प्रशासन को घेरते हुए सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यह मौतें प्राकृतिक नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई ‘प्रशासनिक हत्या’ हैं।

सवाल उठ रहे हैं कि आखिर समय रहते पानी की जांच क्यों नहीं हुई, शिकायतों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया और जब हालात बिगड़ रहे थे, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे। भागीरथपुरा की ताजा त्रासदी और सुभाष चौक का पुराना कांड एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं पानी की शुद्धता और सप्लाई में जरा सी भी चूक मौत का कारण बन सकती है। यह घटनाएं प्रशासन के लिए सख्त चेतावनी हैं।

अगर अब भी सिस्टम नहीं सुधरा, जवाबदेही तय नहीं हुई और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो इंदौर में ऐसे काले अध्याय बार-बार लिखे जाते रहेंगे, और हर बार इसकी कीमत आम जनता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।

13 हजार से अधिक घरों का सर्वे, 310 मरीज भर्ती

सूचना मिलते ही नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग एवं जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की। 13,444 घरों का सर्वे कर 310 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया, जिनमें से 235 मरीज स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। 24 घंटे डॉक्टरों की ड्यूटी, 10 एंबुलेंस की तैनाती, नि:शुल्क उपचार के लिए अस्पतालों में बेड आरक्षित किए। विशेषज्ञ टीम मौके पर भेजी गई तथा 24×7 कॉल सेंटर और सहायता डेस्क भी सक्रिय किए गए। 1600 से अधिक जल नमूनों की जांच की गई। मुख्यमंत्री ने नगर निगम की कार्रवाई को अपर्याप्त बताते हुए कहा जनस्वास्थ्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और लापरवाही किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। नगर निगम आयुक्त दिलीप यादव को हटाकर मंत्रालय में पदस्थ करने के निर्देश दिए। वहीं अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया एवं प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया।

जो हो गया सो हो गया… पानी गंदा होता, तो लोग पीते ही नहीं

भागीरथपुरा में ड्रेनेजयुक्त पानी से मौत के मामले में पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय का कहना है, जो होना था सो हो गया। पानी गंदा नहीं था, अन्यथा लोग पीते ही नहीं। उनके दावे को पानी की रिपोर्ट झूठा साबित कर रही है। आकाश विजयवर्गीय ने भागीरथपुरा में पत्रकारो से कहा मौत के लिए गंदे पानी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पानी गंदा होता तो लोग पीते ही नहीं। स्थिति में अब सुधार है। लोग अस्पतालों से डिस्चार्ज हो रहे हैं। मरीजों में संक्रमण के लक्षण मिलते ही प्रारंभिक इलाज किया जा रहा है। जरूरत पर अस्पताल में भर्ती भी कराया जा रहा है। विजयवर्गीय के इस बयान पर सियासी बवाल मच गया है। प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, मंत्री सभी गंदे पानी की बात स्वीकार कर रहे है। ऐसे में पूर्व विधायक का बयान सुर्खियों में है। विजयवर्गीय ने कहा मुझे जानकारी दी गई है 2003 में भागीरथपुरा थाना बना था जबकि ड्रेनेज लाइन 1997 में डली थी। पूरे इंदौर में ड्रेनेज चोक होता है व गंदा पानी आता है, यहां पर पानी गंदा नहीं आया था। 60 प्रतिशत वार्ड में ड्रेनेज, सडक़ और नर्मदा का काम करवा दिया है। जब भी शिकायत आती है, निराकरण करते हैं। हमारा फोकस है पहले लोग स्वस्थ हों।

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